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वर्ल्ड फोटोग्राफी डे: मौन की मुखर अभिव्यक्ति, तकनीक ने उन्नत की है छायांकन की विधा

Rajesh Kumar Vyas राजेश कुमार व्यास
Updated Sat, 19 Aug 2023 07:02 AM IST
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सार
तकनीक की दृष्टि से बेहद संपन्न डिजिटल हुई फोटोग्राफी आज हमारे तमाम कला स्वरूपों का प्रमुख आधार बनती जा रही है।
 
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World Photography Day Digital technology advanced art of photography
वर्ल्ड फोटोग्राफी डे (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : Pixabay

विस्तार

छायांकन (फोटोग्राफी) मौन की मुखर अभिव्यक्ति है। यह वह कला है, जिसमें जो कुछ दिख रहा है, वही महत्वपूर्ण नहीं होता, बल्कि दृश्य के भीतर निहित सौंदर्य की वह दीठ अधिक महत्वपूर्ण होती है, जिसमें अर्थ की अनंत संभावनाएं निहित होती हैं। यही वह कला है, जिसमें अंतर्मन की संवेदना के जरिये छायाकार बहुत बार दृश्य में निहित सौंदर्य को कई गुना अधिक सघनता से अपने तईं व्यंजित करता है। ...और तब यथार्थ दृश्य के बजाय कैमरे की आंख का संवेदन रूपांतरण हो जाता है। भले यह कहा जाए कि कैमरा यथार्थ का सादृश्य ही तो दिखाता है, परंतु उसे बरतने वाला यदि कलाकार है, तो वह औचक दृश्य में निहित उस अदृश्य के सौंदर्य से भी साक्षात करा देता है, जो नंगी आंखें चाहकर भी देख नहीं पाती हैं। इसीलिए छायांकन कला दृश्य संवेदना में अनुभव का संसार लगती है। छाया-प्रकाश की कला सर्जना।



बहरहाल, यह छायांकन कला ही है, जिसमें विस्तृत दृश्य को भी एक छोटे से आयतन में उसकी तमाम बारीकियों के साथ प्रस्तुत किया जा सकता है, तो लघुतम को भी दोगुने-तिगुने और उससे भी बड़े वृहद आकार में सहज दिखाया जा सकता है। असल मे छायांकन यथार्थ में निहित तमाम दृश्य संभावनाओं का छायाकार की संवेदना-अनुभूति का रूपांतरण है। छायांकन के सृजन स्रोतों पर जाएंगे, तो संस्कृति, परंपरा, इतिहास को वहां ध्वनित होते पाएंगे। इसके अलावा, क्षण जो बीत गया है, उसकी स्मृतियां भी वहां झिलमिलाती नजर आएंगी। अतीत और वर्तमान वहां एक साथ दिप-दिपाते हैं। और हां, बहुत से स्तरों पर अनुभूति की आत्मीयता में भाव संवेदना के अनंत की तलाश भी कहीं है, तो छायांकन कला में ही है।


छायांकन कलाओं के संसार में प्रवेश करने पर सदा ही यह अनुभूत किया गया है कि चीजें स्थिर रहें, मौन रहें, तो उदासी, सन्नाटा पसरता है, पर छायांकन से उनमें ध्वनित होने की अनुभूतियां पैदा की जाएं, तो वह ऐसा राग बन जाता है, जिससे हर कोई अनुराग करता है। इसीलिए कहें, तो छायांकन कला छायाकार के अंतर्मन के विचारों, दर्शन का स्थूल स्वरूपों में एक तरह से कला-प्रगटीकरण है।

कहते हंै, जर्मनी के ज्योतिर्विद और वैज्ञानिक जॉन हरसेल ने 1839 ईस्वी में अपने एक मित्र को लिखे पत्र में पहले-पहल फोटोग्राफी शब्द का इस्तेमाल किया था। उससे पहले 1826 में फ्रांसीसी आविष्कारक निप्से ने विश्व का पहला फोटोग्राफ बनाया था। छायांकन कृति देखकर तभी पेरिस में चित्रकार-प्राध्यापक पॉलदेलारोष ने यह कहा था कि चित्रकला आज से मर गई है। पर संयोग देखिए, तकनीक की दृष्टि से बेहद संपन्न डिजिटल हुई फोटोग्राफी आज हमारे तमाम कला स्वरूपों का प्रमुख आधार बनती जा रही है।

असल में छायांकन कहन की दृश्य कला है। इसमें तकनीक ही महत्वपूर्ण नहीं है, छायाकार की छायांकन दीठ खास महत्व रखती है। कल्पनाशीलता के साथ घटना, दृश्य का वहां दर्शाव जो होता है! ऐसा करने पर लगता है, दृश्य को पकड़ते हुए कई बार छायाकार उस निःसंग को भी पकड़ता है, जिसमें मौन भी बोलने लगता है और तब हजारों-हजार शब्दों में जो नहीं कह सकते, वह एक छायाचित्र कह देता है।

छायांकन देखने को संस्कारित करने की दृश्य-छंद कला है। भारतीय फिल्मों के भीष्म पितामह कहे जाने वाले दादा साहब फाल्के कैमरे से सिरजी दुनिया के प्रति इतने ज्यादा जुनूनी थे कि उन्हें इसके लिए अपनी एक आंख तक गंवानी पड़ी थी। द ग्रोथ ऑफ द प्लांट के अंतर्गत मटर बोने और उसके बाद उसके क्षण-क्षण में बढ़ते समय को उन्होंने छायांकन में अद्भुत ढंग से जिया है। फिल्मों में अभी जो स्पेशल इफेक्ट हम देखते हैं, उसके जनक यही दादा साहब फाल्के ही रहे हैं।

सत्यजित राय के साथ भी यही था। उन्होंने साधारण विषयों, दृश्यों के भी सूक्ष्म ब्योरों के इतने कलात्मक रूप चलचित्रों में सिरजे हैं कि अचरज होता है, कैसे यह संभव हुआ होगा। उन्होंने हिमालय की जो कलाकृतियां सिरजी हैं, उनमें क्षण-क्षण में हिमालय पर पड़ती सूर्य की लालिमा, धूप, छांव, अंधकार और प्रकाश से जुड़े दृश्यों का अद्भुत लोक रंग-रेखाओं से रचा गया है।

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