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आसमान छूती औरतें
मरिआना बाबर
Updated Fri, 03 Jul 2015 05:30 PM IST
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यह काफी साल पहले की बात है। डॉ शिरीन माजरी, जो कि अब इमरान खान की पीटीआई (पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ) से जुड़ी हैं, और मैं नई दिल्ली में कनॉट प्लेस में कुछ खरीदारी कर रही थी। तभी एक प्रौढ़ महिला हमारे पास आईं। वह काफी स्मार्ट और पढ़ी-लिखी लग रही थीं। उन्होंने हमसे पूछा, 'ओह! तो आप पाकिस्तान से हैं।
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आपका बुर्का कहां है?' पहले तो शिरीन भौचक्की रह गईं। फिर उन्होंने जवाब दिया, 'दरअसल, पाकिस्तान में तो हम दुपट्टा भी नहीं ओढ़ते, मगर चूंकि हम भारत आ रहे थे, इसलिए यहां के लिए हमने कुछ दुपट्टे रख लिए थे।'
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विदेशियों की यह धारणा नई नहीं है कि पाकिस्तानी की तमाम महिलाएं बुर्का पहनती हैं। अफसोस की बात है कि दुनिया भर का मीडिया अपनी सुविधा के मुताबिक किसी देश से जुड़ी बुरी चीजों को ही 'खबर' मानता है, जबकि उस देश के अच्छे पहलुओं की अनदेखी करता है।
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मगर जब कोई पाकिस्तान आकर यहां की आधुनिक महिला को देखता है, तो उसकी सोच बदलने लगती है। पाकिस्तान में सिंध के शहरी इलाकों में परंपरागत टू-पीस काला बुर्का पहना जाता है। यहां कराची और हैदराबाद वे जगहें हैं, जहां आजादी के बाद आ बसी ज्यादातर उर्दू बोलने वाली आबादी रहती है। ये अप्रवासी महिलाएं ही हैं, जो अब भी काले बुर्के में दिख जाती हैं।
कुछ वैसे ही, जैसे मुस्लिम महिलाएं भारत में मुसलमान बाहुल्य इलाकों में दिख जाती हैं। पाकिस्तान के उत्तरी क्षेत्रों और खैबर पख्तूनवा में बसे मेरे गांव पीर पाई में आज भी ऐसी औरतें हैं, जो सिर से पांव तक सफेद बुर्का पहनती हैं, जिसे 'शटल कॉक' बुर्का कहा जाता है। इसकी वजह यह है कि इस बुर्के में आंखें हाथ से बनी एक जाली से ढकी रहती हैं। यह जाली कुछ वैसी होती है, जैसी हम बैडमिंटन खेलते वक्त उपयोग में लाते हैं।
यहां तक कि कुछ और उत्तर में बढ़ने पर अफगानिस्तान में इसी बुर्के का रंग नीले में बदलने लगता है, जिसे जबरन पहनने का नियम काबुल में अपने शासन के दौरान अफगान तालिबान ने लागू किया था। बहुत से नारीवादियों ने पुरुषों को यह बुर्का पहनाने की बात की, ताकि उन्हें पता चल सके कि इसे पहन कर अपने घर से बाहर काम करना महिलाओं के लिए किस कदर मुश्किल होता है।
बेनजीर भुट्टो से इसी मुद्दे पर मैंने एक बार बात की थी। उन्होंने जो बोला, वह आज भी मेरे जेहन में है। उन्होंने कहा था, 'असल पर्दा तो पुरुष की आंखों में होता है।' हालांकि मेरे गांव में महिलाएं बुर्के के बजाय चादर में ही ज्यादा राहत महसूस करती हैं। यह चादर बलूचिस्तान और पंजाब के कुछ इलाकों में भी ओढ़ी जाती है। पर इबादत के वक्त हर महिला का सिर जरूर ढका होता है।
दिलचस्प बात है कि अब बुर्के का चलन थोड़ा कम हुआ है, इसलिए इस्लाम की नई लहर के तौर पर 'हिजाब' सामने आया है। इसे आधुनिक पाकिस्तानी महिलाओं ने बगैर किसी दबाव के, अपनी इच्छा से अपनाया है। यह फैशनेबल भी है, और इसे लपेटने में कोई हर्ज भी नहीं हैं। इसका इस्लाम से कुछ लेना-देना नहीं है। मगर मुझे हंसी तब आती है, जब मैं पाकिस्तानी महिलाओं को चुस्त पायजामे और टॉप पहने और अपने बालों पर हिजाब लपेटे देखती हूं। दरअसल, पाकिस्तान में अमूमन दुपट्टा, कमीज और सलवार को शालीन वेशभूषा माना जाता है।
अब यह महिलाओं के ऊपर है कि वह दुपट्टे को कंधे पर डालती हैं, या सिर पर ओढ़ती हैं। पाकिस्तान की सेना में महिला डॉक्टर आज भी खाकी साड़ी में दिखती हैं, जो वह विभाजन के पहले से पहनती आई हैं, और फिर भी सुंदर लगती हैं। सच तो यह है कि औरतों के लिए साड़ी से अधिक सुरुचिपूर्ण कोई पोशाक है ही नहीं। इनमें से कुछ अपने सिर को स्कार्फ से ढक लेती हैं, मगर साड़ी के ऊपर चादर तो कोई भी नहीं ओढ़ता।
बांग्लादेश की दोनों बेगमें भी साड़ी के ऊपर छोटी चादर ओढ़ने लगी हैं। भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज दिल्ली में साड़ी और ब्लाउज के ऊपर बगैर आस्तीन की जैकेट पहने दिखती हैं। मुझे खुशी है कि भारत में महिलाओं ने इसे फैशन के तौर पर नहीं अपनाया। जाहिर-सी बात है कि क्या पहनना है, यह निजी मामला है, जिसका सम्मान करना चाहिए। मगर अफसोस है कि ज्यादातर एशियाई महिलाएं एक ओर तो कपड़ों के मामले में पश्चिम की नकल कर रही हैं, वहीं कुछ ऐसी महिलाएं भी हैं, जो खुद को ज्यादा से ज्यादा ढकने में लगी हैं।
अब तो पूरी दुनिया में पाकिस्तान की एक सुपर वीमेन का कार्टून तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। इसे 'बुर्का एवेंजर' नाम दिया गया है। यह बुर्का एवेंजर बुराइयों से लड़ती है और लोगों में जागरूकता फैलाती है। यह बुर्का एवेंजर सिर से पांव तक ढकी है। केवल उसकी आंखें ही दिखाई देती हैं। यह मार्शल आर्ट जानती है और किताबें व कलम ही उसके हथियार हैं। यह कार्टून रचना पॉप गायक ऐरन हारून रशीद की दिमागी उपज है। यह दुष्टों पर कहर बनकर टूटती है, मगर इसकी स्टाइल पाकिस्तानी है।
इसके अलावा आज पाकिस्तान में एक जोशीली महिला फुटबॉल टीम भी है। इस टीम की गोलकीपर सैयदा माहपारा को दुनिया की सबसे खूबसूरत गोलकीपर कहा जाता है। एक बेहद पुराने ख्यालों वाले समाज की उपेक्षा करते हुए खैबर पख्तूनवा में महिला कमांडो नौशेरा एलीट फोर्स ट्रेनिंग स्कूल से ग्रेजुएट कर चुकी हैं। आयशा फारूक पाकिस्तान की पहली महिला लड़ाकू विमान पायलट बन गई हैं।
गौरतलब है कि पाकिस्तानी वायुसेना में लड़ाकू विमान की कुल 19 महिला पायलट हैं। फिर, पाकिस्तान की पहली महिला पर्वतारोही समाइना बेग को कौन भूल सकता है, जो माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई भी कर चुकी हैं! कहने का मतलब है कि चाहे बुर्का हो या न हो, हिजाब हो या न हो, पाकिस्तान की महिलाएं आसमान की ऊंचाइयों को छू रही हैं और उन्हें रोक सके, ऐसा कोई नहीं है।
-लेखिका पाकिस्तान की वरिष्ठ पत्रकार हैं