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समुदाय: लोहे को जीवन से जोड़तीं स्त्रियां, लाभ की कड़ियों को तोड़ रहा है मशीनीकरण
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कृषि औजार
- फोटो :
सोशल मीडिया
विस्तार
कृषि हमारे देश का एक महत्वपूर्ण व्यवसाय है। कृषि के लिए औजारों की उपयोगिता स्वयंसिद्ध है। किसानों को ये औजार लोहार प्रदान करते हैं। लोहार प्राचीन काल से ही लोहे की धातु को अलग-अलग आकार देकर औजार गढ़ते आ रहे हैं। लेकिन गड़िया लोहारों का समुदाय आज भी गुमनामी के अंधेरे में है। वे अपने काम में पारंपरिक ज्ञान के साथ वैज्ञानिक तरीके का इस्तेमाल करते रहे हैं, वह भी बिना कभी स्कूल गए। इस समुदाय की महिलाएं भी पुरुषों के बराबर इस काम को आगे बढ़ाने में अपनी भागीदारी निभा रही हैं।
राजस्थान में अजमेर-जयपुर हाई-वे के किनारे पारसोली गांव में गड़िया लोहारों का एक गांव घोर गरीबी में जीवन-यापन कर रहा है। इसी कस्बे की 60 वर्षीय डाली गड़िया लोहार कहती हैं, 'हमें नहीं पता कि स्कूल कैसा दिखता है? हमने पंद्रह साल की उम्र में काम करना शुरू कर दिया था। हम अपने माता-पिता के साथ बैलगाड़ी में बैठकर लोहे का सामान बेचने एक गांव से दूसरे गांव जाते थे। जमाना बदल गया है, लेकिन हमारे हालात नहीं बदले।' ये लोहार मूल रूप से मेवाड़ के थे और शासकों के लिए हथियार बनाते थे। जब महाराणा प्रताप ने अपना राज्य खो दिया, तो लोहारों ने भी खानाबदोशों की तरह जीने की कसम खाई।
जीवन-यापन के लिए वे सामान बनाकर बैलगाड़ी पर उसे गांव-गांव बेचते रहे। इस बैलगाड़ी की वजह से उन्हें गड़िया लोहार कहा जाने लगा। लोहारों के इस समुदाय में महिलाएं धातु को औजार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। पुरुष जहां अंगारों को गर्म करके लोहे पर प्रहार करता है, वहीं महिला पहले अंगारों को पंखा करती हैं और फिर पुरुष के साथ मिलकर धातु को आकार देने में मदद करती हैं। यह कड़ी मेहनत और बहुत कठिन प्रक्रिया है। ये महिलाएं बचपन से ही इस काम को सीखती हैं। महिलाएं सामान बनाने के अलावा गांव-गांव, मेला-दर-मेला जाकर भी अपना उत्पाद बेचती हैं। वे चिमटा, छलनी, दांतली (हाथ की आरी), कुल्हाड़ी, हंसिया और कुदाल बनाती हैं। सामान बनाने के लिए लोहा और कोयला शहर से खरीदती हैं।
इनमें से अधिकांश का शिक्षा से कोई संबंध नहीं है, लेकिन पिछले एक दशक से एक ही जगह पर बसने के कारण अब उनके बच्चे पास के एक सरकारी स्कूल में जाते हैं। उनके काम में कई खतरे भी शामिल हैं। न केवल धधकती आग के सामने उन्हें घंटों बैठना पड़ता है, बल्कि औजार बनाने के दौरान चोट लगने की भी काफी आशंका रहती है। कड़ी मेहनत के बावजूद इन महिलाओं की कोई निश्चित दैनिक आय नहीं है। बड़े पैमाने पर मशीनीकरण ने उन्हें लाभ से वंचित कर दिया है। अब मशीन से बने आधुनिक औजार मौजूद हैं, जो बहुत सस्ते दामों पर मिल जाते हैं। ऐसे में इनके बनाए औजारों को भला कोई क्यों खरीदेगा।
अब वे सड़क किनारे बैठकर ताले, जंजीर, रसोई के चाकू, घंटियां, चम्मच, चूहेदानी आदि बेचती हैं, जिनसे उन्हें बहुत कम मुनाफा होता है। कमला गड़िया लोहार कहती हैं, हम 20,000 रुपये का सामान खरीदते हैं, पर हमारी कुल कमाई सिर्फ 2,000 रुपये होती है। इस मंहगाई के दौर में महीने में दो-तीन हजार रुपये की कमाई से क्या हो सकता है!
संतोष गड़िया लोहार की भी यही कहानी है। वह कहती हैं, 'हम एक सामान से पांच से दस रुपये ही कमाते हैं। हम कुछ सामान खुद बनाते हैं, और कुछ बेचने के लिए बाजार से खरीदते हैं। मशीनीकरण से हमारा पारिवारिक व्यवसाय प्रभावित हुआ है।' मेले हस्तशिल्प के प्रचार-प्रसार के महत्वपूर्ण स्थल हैं, पर इन लोहारों के लिए यह लाभप्रद नहीं है। पुष्कर मेला भी अब इनके लिए लाभदायक नहीं रहा है। मेले के आयोजक उनसे प्रति फुट किराये के रूप मे 3,000 रुपये लेते हैं, फिर उन्हें मेले में स्थायी जगह नहीं मिलती है। सामान बिके या न बिके, किराया तो देना ही पड़ता है। यही कहानी क्षेत्र के दूसरे प्रमुख मेले 'अजमेर शरीफ में उर्स मेले' की है।
गड़िया लोहार समुदाय की ये मेहनती महिलाएं उस दिन का इंतजार कर रही हैं, जब उनके बनाए सामान एक बार फिर से लोकप्रिय होंगे और वे अच्छी कीमत पर बिकने लगेंगे। (चरखा फीचर)