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नेम प्लेट से नदारद आधी दुनिया
विवेक शुक्ला
Updated Mon, 07 Mar 2016 07:15 PM IST
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विवेक शुक्ला
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हालांकि अब घर बनाने के लिए आम तौर पर पति-पत्नी मिलकर कर्ज लेते हैं, फिर भी नेम प्लेट से पत्नी दूर रहती है। कहने को महिलाओं को घर की लक्ष्मी कहते हैं। हां, यह भी लोग कहते हुए नहीं थकते कि मां, बहन, बेटी, पत्नी वगैरह के सहयोग के बिना घर नहीं बन सकता। लेकिन अफसोस कि समाज को उन्हें नेम प्लेट पर जगह देने से परहेज है। कोई माने या न माने, पर नेम प्लेट में घर की गृहिणी के लिए जगह नहीं है। कम से कम हमारे अध्ययन का तो यही नतीजा है।
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नेम प्लेट में महिलाएं कहां तक पहुंचीं, यह जानने के लिए हमने राष्ट्रीय राजधानी के राजौरी गार्डन, विवेक विहार, आईपी एक्सटेंशन और न्यू राजेंद्र नगर के 160 घरों और फ्लैटों के बाहर लगी नेम प्लेट को देखा। इस मिशन के दौरान कई चौंकाने वाले, तो कुछ नए तथ्य सामने आए। गौरतलब है कि इन सभी कॉलोनियों में समृद्ध और पढ़े-लिखे लोग रहते हैं।
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हमें 160 घरों में सिर्फ 23 घरों के बाहर लगी नेम प्लेट में महिलाओं के नाम दिखे। इन 23 में से आठ राजेंद्र नगर में, तीन-तीन विवेक विहार और राजौरी गार्डन में और नौ आईपी एक्सटेंशन में थे। इनमें भी 11 नेम प्लेट में महिलाओं के नाम घर के पुरुष सदस्यों के नामों के साथ थे। इन्हीं 11 में से पांच महिलाओं के नामों के आगे डॉ. लिखा था। यानी कि वह मेडिकल पेशे से संबंध रखती हैं। हो सकता है कि किसी ने किसी अन्य विषय में पी.एचडी की डिग्री ली हो। तो माना जाए कि जिन लोगों ने अपने घर की महिला सदस्यों के नाम डॉक्टर न होने के बावजूद नेम प्लेट में रखे, वे वास्तव में अलग तरह के लोग हैं। बेशक वे आदरणीय, प्रात:स्मरणीय हैं।
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सिर्फ पांच नेम प्लेटों पर केवल औरतों के नाम दिखे। इन परिवारों के लिए आप क्या कहेंगे? बेशक बाकी से अलग। इनमें से दो विवेक विहार और तीन आईपी एक्सटेंशन में हैं। हालांकि पता चला कि बहुत से घरों के स्वामियों के निधन के बाद नेम प्लेट बदल दी जाती है। दिवंगत इंसान का नाम लंबे समय तक नेम प्लेट पर नहीं रखा जाता। उसे अशुभ माना जाता है। उसके स्थान पर उस शख्स की पत्नी का नाम आ जाता है। यह भी विडंबना ही है कि औरत को नेम प्लेट पर जगह तब मिलती है, जब उसका जीवनसाथी नहीं रहता।
अपने अभियान का श्रीगणेश करने से पहले हमें लगा था कि देश और समाज बदल गया है। इसलिए कम से 30-40 फीसदी नेम प्लेटों पर तो महिलाएं पहुंच ही गई होंगी। राष्ट्रीय राजधानी की मशहूर रीयल एस्टेट फर्म के सीईओ ने बताया कि हमें कई फ्लैटों के मालिक घर के बाहर नेम प्लेट लगाने के लिए भी कहते हैं। लेकिन ज्यादातर नेम प्लेट पर पुरुष सदस्य का ही नाम रहता है। हालांकि अब फ्लैट तो आमतौर पर संयुक्त रूप से लोन लेकर ही लिए जाते हैं।
नेम प्लेटों पर अंग्रेजी का असर साफ है। हिंदी इसके सामने दूर-दूर तक नहीं दिखती। सिर्फ 11 घरों के बाहर नेमप्लेट हिंदी में दिखीं, बाकी सब अंग्रेजी में थीं। और तो और, उन घरों के बाहर भी हिंदी की नेम प्लेट नहीं दिखी, जो हिंदी की रोटी खाते हैं। हालांकि मराठी-हिंदी के लेखक माधव जोशी ने कहा कि मध्य प्रदेश शायद एकमात्र ऐसा राज्य होगा, जहां लगभग सौ फीसदी नेम प्लेट हिंदी में हैं। लेकिन दिल्ली तो मध्य प्रदेश से काफी दूर है।