कामना और लोभ के बिना

शिवकुमार गोयल Updated Thu, 19 Sep 2013 08:13 PM IST
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एक बार प्रजापति दक्ष, भारद्वाज, वशिष्ठ, विश्वामित्र आदि ऋषि भगवान ब्रह्माजी के पास सत्संग के लिए पहुंचे। उन्होंने ब्रह्माजी से पूछा, भगवन, लोक-परलोक के कल्याण का सरल साधन बताने की कृपा करें।
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ब्रह्माजी ने कहा, महर्षियो, समस्त संग्रह का अंत है विनाश। उत्थान का अंत है पतन। संयोग का अंत है, वियोग और जीवन का अंत है, मृत्यु। केवल ज्ञान ही ऐसा तत्व है, जिसका विनाश नहीं होता। इसलिए सांसारिक वस्तुओं का मोह त्यागकर ज्ञान की उपासना करना ही मानव का कर्तव्य है।
जो व्यक्ति पंच भौतिक देह का अभिमान त्याग देता है, ज्ञान और भक्ति में चित्त लगाता है, उसके लोक-परलोक, दोनों कल्याणकारी बन जाते हैं। जो संपूर्ण प्राणियों में समान भाव रखता है, लोभ और कामना से रहित है, वह ज्ञानी ही परम गति को प्राप्त होता है। गृहस्थ को सद्पुरुषों के आचरण का तथा सत्य, अहिंसा, संतोष आदि नियमों का पालन करना चाहिए।
संन्यासी के कर्तव्य बताते हुए ब्रह्माजी ने कहा, साधु संन्यासी को तनिक भी संग्रह नहीं करना चाहिए। उसे जिह्वा के स्वाद का परित्याग कर भिक्षा से अपना जीवन निर्वाह करना चाहिए। अहंकार से दूर रहकर इंद्रियों पर उसे पूर्ण संयम रखना चाहिए। समस्त प्रकार की आसक्तियों से दूर रहकर उसे भगवान की भक्ति और प्राणियों के सुख के लिए तत्पर रहना चाहिए।

ऋषियों की जिज्ञासा का समाधान हो गया।
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