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काश, केजरीवाल से कुछ सीखा होता
तवलीन सिंह
Updated Sun, 30 Mar 2014 06:22 PM IST
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आम आदमी पार्टी के सरदार में एक खास गुण है, एक अहम हुनर। मीडिया का इस्तेमाल करने में इतने माहिर हैं अरविंद केजरीवाल कि उनसे नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी ने थोड़ी सीख ली होती, तो मुमकिन है कि चुनाव के इस बेरहम मौसम में उनकी परेशानियां थोड़ी कम हो गई होतीं।
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मिसाल के तौर पर देखिए, किस तरह टीवी पत्रकारों को साथ लेकर बनारस गए ट्रेन में केजरीवाल साहिब पिछले सप्ताह अपनी पहली आम सभा करने। रास्ते में इतनी बार उन्होंने पत्रकारों के साथ भेंट की कि सफर भर सुर्खियों में रहे। मीडिया का इस्तेमाल करने में इतनी चतुराई दिखाई है केजरीवाल साहिब ने कि दिल्ली में इन दिनों हम पत्रकार आपस में मजाक करते हैं कि आप के मुखिया छींक मारने के पहले भी इधर-उधर देखकर पक्का करते हैं कि कोई मीडिया वाला आसपास हो। और हम हैं कि अक्सर होते भी हैं।
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उधर हैं नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी, जो अब तक सीख ही नहीं पाए हैं कि मुफ्त में कितना चुनाव प्रचार हो सकता है मीडिया का इस्तेमाल करके। नरेंद्र मोदी से तो वैसे भी अधिकतर मीडिया वाले इतनी नफरत करते हैं कि कभी-कभी ऐसा लगता है, जैसे हम खुद बन गए हों आप के प्रचारक। मोदी लाख बार अपनी तकरीरों में कह चुके हैं कि इस चुनाव में मुख्य मुद्दे हैं विकास और सुशासन, लेकिन हम फिर भी उनके वक्तव्यों का ऐसा विश्लेषण करते हैं, जैसे हम सीआईडी बनकर खोज रहे हों हिंदुत्व के छिपे हुए निशान।
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केजरीवाल साहिब ने पत्रकारों को जेल में डालने की बात की, पर थोड़ा हल्ला करने के बाद हम उनका प्रचार करने में फिर से जुट गए। मोदी के साथ हम उल्टा करते हैं। पिछले सप्ताह केजरीवाल का मजाक करते हुए उन्होंने उनको एके-49 बुलाकर इशारा किया कि वह पाकिस्तान का भला कर रहे हैं, तो मीडिया में इतना हंगामा मचा कि टीवी पर चर्चा का विषय बन गया यह वक्तव्य।
रही बात राहुल गांधी की, तो उनको हम थोड़े उदार नजरिये से देखते हैं, क्योंकि उन्हें हम सेक्यूलर मानते हैं। सेक्यूलर होना बहुत बड़ी बात है अपने इस गरीब, बेहाल देश में, सो हम अक्सर राहुल गांधी की गलतियां माफ कर देते हैं। राहुल ने जोश में आकर कुछ महीने पहले कह डाला कि मुजफ्फरनगर के दंगा पीड़ित मुस्लिम युवा आईएसआई से संपर्क कर रहे हैं। ऐसा कहना गलत था, लेकिन हमने माफ कर दिया राहुल गांधी को, क्योंकि आखिरकार वह 'सेक्यूलर' हैं। मोदी ने अगर ऐसी बात कही होती, तो सोचिए, कितना हंगामा मच जाता!
बिहार में मैं जहां गई, मुझे मुसलमानों ने कहा कि निन्यानबे फीसदी मुस्लिम वोट मोदी को नहीं जाएगा। एक इमाम साहिब से जब मैंने पूछा कि क्या अखिलेश यादव को भी मुजफ्फरनगर के दंगे के बाद ऐसी नजरों से देखा जा रहा है, तब जवाब मिला, 'नहीं, क्योंकि अखिलेश यादव सेक्यूलर हैं। उनके पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और शिवसेना जैसी संस्थाएं नहीं हैं।' मोदी ने थोड़ी समझदारी से मीडिया का इस्तेमाल किया होता, तो कम से कम वह सवाल, जो एम जे अकबर आजकल पूछ रहे हैं, बहुत पहले पूछा गया होता। यानी कई मुसलमानों को फैसला करना होगा कि उनकी लड़ाई मोदी के साथ है या गरीबी के साथ।
बहरहाल, मोदी हम मीडिया वालों की मदद के बिना भी बन सकते हैं प्रधानमंत्री, लेकिन केजरीवाल की चुनावी रणनीति से अगर सीखी होती उन्होंने कुछ तरकीबें, तो शायद उनको केजरीवाल पर सीधा वार करने की जरूरत महसूस नहीं हुई होती। खैर, जो हो गया, सो हो गया। लेकिन इस लोकसभा चुनाव का विश्लेषण जब कभी बैठकर करेंगे इतिहासकार, तो एक बात अवश्य सामने आएगी बड़े अक्षरों में। वह यह कि इस चुनावी दौड़ में जो घोड़ा सबसे कमजोर, सबसे पीछे था, वह प्रचार के मामलों में सबसे आगे निकला।