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मुद्दा: क्या इस साल ठंड में बारिश नहीं होगी, प्रकृति का संतुलन कायम करने की दरकार

Thu, 22 Jan 2026 07:13 AM IST
Pankaj chaturvedi पंकज चतुर्वेदी
Updated Thu, 22 Jan 2026 07:13 AM IST
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सार
ठंड के मौसम में अब तक बारिश का न होना, एक घटना नहीं, बल्कि एक वैश्विक संकट का स्थानीय संकेत है। दिल्ली का वायु गुणवत्ता सूचकांक लगातार ‘बेहद खराब’ और ‘गंभीर’ श्रेणी में बनी हुई है। 
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Will there be no rain this winter? The need to restore the balance of nature
दिसंबर में बारिश की एक भी बूंद नहीं गिरी - फोटो : ANI

विस्तार

लाख जतन करने के बाद भी दिल्ली और उसके 100  वर्ग किलोमीटर के दायरे की हवा प्रदूषण से जकड़ी हुई है और इसके निदान के लिए जिस बरसात का इंतजार है, वह कोई ढाई महीने से नदारद है। उत्तर भारत इस समय जिस तरह की मौसमी विसंगति के दौर से गुजर रहा है, यह भविष्य की भयावहता का गहरा संकेत है। हिमालय की गोदी में बसे आठ राज्य शून्य बरसात और कम बर्फबारी से हैरान हैं।



उत्तराखंड में ऐसा वर्ष 2016 के बाद पहली बार हुआ, जब दिसंबर में बारिश की एक भी बूंद नहीं गिरी। इस वर्ष समूचे उत्तरी भारत में जाड़ा अपनी पूरी ठिठुरन के साथ उपस्थित तो है, लेकिन इसमें वह नमी और सौम्यता गायब है, जो जीवन का आधार होती है। कड़ाके की ठंड के बावजूद आसमान का साफ होना और पहाड़ों का भूरा दिखना केवल मौसम का मिजाज भर नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी ‘मौन आपदा’ है, जिसका प्रभाव आने वाले कई महीनों तक हमारी अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा पर पड़ने वाला है। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक फैले इस पारिस्थितिकी तंत्र में उत्तर का हिमालयी क्षेत्र एक ‘जल मीनार’ की तरह कार्य करता है, लेकिन इस बार मीनारें सूखे की चपेट में हैं।


कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में सर्दी के मौसम में वर्षा का घाटा 95 प्रतिशत से अधिक तक पहुंच गया है। पहाड़ों पर होने वाली इस ‘सूखी ठंड’ का सीधा असर बागवानी पर पड़ रहा है। सेब के बागानों को अपना जीवन चक्र पूरा करने के लिए जिन ‘चिलिंग आवर्स’ की आवश्यकता होती है, वे पर्याप्त नमी और बर्फ के बिना अधूरे हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि नमी की इस कमी के कारण सेब की पैदावार और गुणवत्ता में 20 से 25 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है। मैदानी इलाकों, विशेषकर दिल्ली और इसके आसपास के क्षेत्रों में यह सूखी ठंड एक ‘विषाक्त जाल’ बन गई है।
सामान्यतया सर्दियों की बारिश (मावठ) हवा में मौजूद धूल और धुएं के कणों को साफ कर देती है, लेकिन इस बार बारिश न होने से प्रदूषण के कण जमीन के करीब ही ठहरे हुए हैं। दिल्ली का वायु गुणवत्ता सूचकांक लगातार ‘बेहद खराब’ और ‘गंभीर’ श्रेणी में बना हुआ है। नमी रहित यह ठंडी हवा शरीर से प्राकृतिक पानी सोख लेती है, जिससे न केवल त्वचा और आंखों से जुड़े रोग बढ़ रहे हैं, बल्कि अस्पतालों में श्वसन और हृदय संबंधी रोगियों की संख्या में भी 30 से 40 प्रतिशत का उछाल देखा गया है।

कृषि प्रधान भारत के लिए पश्चिमी विक्षोभ का कमजोर पड़ना किसी बड़े झटके से कम नहीं है। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रबी की फसल, विशेषकर गेहूं, इस समय नाजुक दौर में है। प्रकृति की ओर से मिलने वाली बारिश के अभाव में किसानों को बार-बार सिंचाई का सहारा लेना पड़ रहा है, जिससे खेती की लागत बढ़ रही है। यदि तापमान में इसी तरह उतार-चढ़ाव बना रहा और नमी नहीं लौटी, तो गेहूं के दाने समय से पहले पक कर छोटे रह सकते हैं, जो देश के अन्न भंडार के लिए चिंता का विषय है।

बरसात न होने से कश्मीर में झेलम जैसी सदानीरा नदी सूख रही है और राज्य के कई पनबिजली संयंत्र अपनी क्षमता का 40 फीसदी उत्पादन ही कर पा रहे हैं। इस तरह के मौसम से हिमाचली राज्यों के जंगलों में कई जगहों पर आग की घटनाएं समय से पहले और बड़ी संख्या में देखने को मिल सकती हैं और इसका सीधा असर जंगली जीवों और इन्सानों के बीच टकराव के रूप में दिखाई पड़ रहा है।
हिमालयी क्षेत्रों में इस वर्ष सर्दियों के दौरान बारिश और पर्याप्त बर्फबारी न होने से बागवानी पर भी असर पड़ रहा है। नैनीताल जिले के रामगढ़, सूपी, सतबुंगा, धानाचूली सहित फलपट्टी क्षेत्र में बड़ी संख्या में फलदार वृक्षों पर बेमौसम फल और फूल आ गए। आमतौर पर यह मौसम पेड़ों के लिए डॉरमेसी (शीतविराम) अवस्था का होता है, जब ठंड, बारिश व बर्फबारी के चलते पेड़ सुप्तावस्था में रहते हैं। लेकिन अभी जाड़े में न तो बरसात हुई न ही बर्फ गिरी, सो मिट्टी में नमी कम हो गई। इस जैविक संतुलन के बिगड़ने से पौधों का फेनोलॉजिकल कैलेंडर प्रभावित हुआ है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें, तो अल-नीनो का बढ़ता प्रभाव और जलवायु परिवर्तन के कारण बदलते वायुमंडलीय दबाव ने ‘पश्चिमी विक्षोभ’ की धार कुंद कर दी है। यह एक वैश्विक संकट का स्थानीय स्वरूप है। समझना होगा कि बर्फ का पर्याप्त मात्रा में न गिरना और बादलों का न बरसना केवल एक वर्ष की घटना नहीं है, बल्कि यह प्रकृति की एक गंभीर चेतावनी है। अब समय आ गया है कि हमारी नीतियों में जल संरक्षण और जलवायु अनुकूल कृषि को सर्वोपरि रखा जाए। प्रकृति अपना संतुलन खो रही है, और यदि मानवीय हस्तक्षेप ने इसे सुधारने की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए, तो ये ‘सूखे जाड़े’ भविष्य की स्थायी पहचान बन सकते हैं।

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