{"_id":"47d34596-7c3f-11e2-9052-d4ae52bc57c2","slug":"will-get-food-security","type":"story","status":"publish","title_hn":"क्या मिल पाएगी खाद्य सुरक्षा?","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया ","slug":"opinion"}}
क्या मिल पाएगी खाद्य सुरक्षा?
शंकर अय्यर
Updated Fri, 22 Feb 2013 02:31 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
सरकार ने संप्रग की दूसरी पारी की सबसे महत्वाकांक्षी परियोजना राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक (एनएफएसबी) को लागू करने की पूरी तैयारी कर ली है। विधेयक में हर व्यक्ति को सात किलोग्राम (या संशोधन की स्थिति में पांच किलोग्राम) खाद्यान्न हर महीने देने की योजना है।
विज्ञापन
इसके तहत 75 फीसदी ग्रामीण और 50 फीसदी शहरी आबादी को तीन रुपये प्रति किलो की दर से गेहूं और दो रुपये प्रति किलो की दर से चावल दिया जाएगा। इस तरह करीब 67 फीसदी आबादी इस योजना के दायरे में आ जाएगी। पर इसे केवल 67 फीसदी आबादी तक ही क्यों सीमित किया जाएगा, इसकी स्पष्ट व्याख्या नहीं है। ऐसा लगता है कि देश की चतुर राजनीति में कुछ लोगों को कुछ रियायतें देना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि वोट जुटाने के लिए अन्य को इससे रोकना भी जरूरी है।
विज्ञापन
खाद्य सुरक्षा के विचार को लेकर कोई विवाद नहीं हो सकता। भूख से निपटने के मामले में 88 देशों की सूची में भारत का 66वां स्थान है। हमारी स्थिति कैमरून, नाइजीरिया और सूडान से भी बदतर है। तकरीबन 40 करोड़ से अधिक आबादी को रोजाना दो वक्त का खाना नसीब नहीं होता।
विज्ञापन
हमारे यहां के 43 फीसदी बच्चों का वजन सामान्य से कम है और कुपोषण से चलते पांच साल से कम उम्र के 200 से ज्यादा बच्चे हर घंटे मौत के मुंह में समा जाते हैं। पर सवाल यह नहीं है कि क्या सरकार को इस कानून को लागू करना चाहिए, बल्कि यह है कि वह इसे किस तरह लागू करेगी? दरअसल सरकार ने एक ऐसा विधेयक तैयार किया है, जो एक दवा से हर मर्ज को दूर करने की कोशिश है।
हमारे यहां योजनाओं के विफल होने के अनेक उदाहरण हैं। एक प्रयास से अनेक लक्ष्य साधने का एकमात्र नतीजा कई तरह की विफलताएं हैं। खाद्य सुरक्षा योजना के साथ अनेक सवाल जुड़े हुए हैं, जिनके जवाब हमें तलाशने ही होंगे। जैसे, क्या भारत इस योजना की जरूरतों को पूरा करने लायक उत्पादन बरकरार रख सकता है? एनएफएसबी के लिए सरकार को कम से कम 6.1 करोड़ टन खाद्यान्न खरीदने की जरूरत होगी।
इसके अलावा मौजूदा तीन करोड़ टन के बफर स्टॉक, खुले बाजार में होने वाली बिक्री और अन्य कल्याणकारी योजनाओं के लिए आवश्यक खाद्यान्न जरूरतें अलग हैं। देश की 60 फीसदी कृषि मॉनसून पर आधारित है, ऐसे में उच्च उत्पादन एक चुनौती है। सूखे की स्थिति में देश आयात करने के लिए बाध्य हो सकता है। चूंकि भारत सबसे बड़े उपभोक्ताओं में शामिल है, ऐसे में वैश्विक बाजार में उसके प्रवेश से कीमतों में उछाल आएगा।
बिना निवेश के कृषि में क्या उच्च उत्पादन हासिल किया जा सकता है? भारत सबसे कम पैदावार वाले देशों में शामिल है। हमारे यहां धान की पैदावार तकरीबन 3,300 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है, जो चीन के 6,548 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर और बांग्लादेश के 4,279 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की तुलना में कम है। गेहूं की पैदावार 2,839 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है, जो चीन (4,749) और फ्रांस (6,877) से कम है।
सरकारी खरीद के लिए क्या राज्यों के पास पर्याप्त अतिरिक्त खाद्यान्न है? सच यह है कि कुछ राज्यों के पास ही बेचने योग्य अतिरिक्त खाद्यान्न है। चावल की 70 फीसदी खरीद पंजाब, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश और उत्तर प्रदेश से, जबकि गेहूं की 80 फीसदी खरीद पंजाब, हरियाणा और मध्य प्रदेश से होती है। क्षेत्रवार और विकेंद्रीकृत खरीद की अपनी दिक्कतें हैं। ऐसे में निजी मंडियों और मध्यवर्ग का क्या होगा? वास्तव में 25 करोड़ टन उत्पादन का केवल एक-तिहाई अतिरिक्त बिक्री योग्य खाद्यान्न के रूप में मौजूद रहता है। इस तरह ज्यादा सरकारी खरीद का असर महंगाई है।
मौजूदा भंडारण क्षमता तकरीबन सात करोड़ टन की है। एनएफएसबी के बाद सरकार को तकरीबन 10 करोड़ टन के भंडारण की जरूरत होगी। वह भी तब, जबकि चूहे इस भंडार से अपना पेट न भरें। क्या सरकार इसके लिए तैयार है? सार्वजनिक वितरण प्रणाली में चावल की लीकेज 1994 के 19 फीसदी से बढ़कर 2005 में 40 फीसदी और इसी अवधि में गेहूं की लीकेज 41 फीसदी से बढ़कर 73 फीसदी हो गई। इसे रोकने के लिए सरकार के पास क्या उपाय हैं? इसी तरह, अगर किसी दुकान से 1,000 कार्डधारक जुड़े हुए हैं, तो उसकी हर महीने की आय 15,000 रुपये के आसपास होने का अनुमान है, जिसमें खाली बोरे की बिक्री शामिल है। ऐसे में क्या चोरी नहीं होगी?
क्या बजट यह बोझ झेल पाएगा? आधिकारिक अनुमानों के मुताबिक, खाद्य सुरक्षा विधेयक की लागत 1.10 लाख करोड़ रुपये है। हालांकि कृषि लागत एवं मूल्य आयोग का अनुमान है कि एनएफएसबी की लागत तीन साल के दौरान तकरीबन 6.82 लाख करोड़ रुपये की होगी। यह सालाना दो लाख करोड़ रुपये से कुछ अधिक है। अगर अन्य योजनाएं खत्म नहीं की जा रही हैं, तो इससे राजकोषीय घाटा बढ़ेगा।
राजनीतिक सुरक्षा की चाहत क्या खाद्य असुरक्षा को बढ़ावा देगी? तय कीमतों पर उच्च सरकारी खरीद निजी खरीद को बाजार से बाहर कर सकती है। बिना प्रतिस्पर्धात्मक कीमतों के ज्यादा उत्पादन के लिए किसान क्यों प्रोत्साहित होंगे?
आखिरकार, यहां सवाल नैतिक जोखिम का है। इस योजना की मुखालफत करने वालों में से एक, केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार का एक हालिया अवलोकन आश्चर्यजनक है, जिसमें उन्होंने कहा है कि मनरेगा की दो दिन की मजदूरी एक महीने के खाद्यान्न की खरीद के लिए पर्याप्त है और लोग बेकार में बैठे रहना ज्यादा पसंद करते हैं।
(एक्सीडेंटल इंडिया के लेखक और अर्थशास्त्र की राजनीति के जानकार)