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तकनीकी: क्या एआई किसी की आत्मकथा लिख पाएगा, भावनात्मक मोर्चे पर तर्कसंगत नहीं हैं उम्मीदें

Shyoraj Singh Bechain श्यौराज सिंह बेचैन
Updated Thu, 07 Nov 2024 07:21 AM IST
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सार
मशीन कई तरह के काम कर सकती है, लेकिन भावनाएं, एहसास और इन्सानी खयालात की उससे उम्मीद करना तर्कसंगत नहीं है।
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Will AI be able to write someone's autobiography? Expectations on  emotional front are not rational
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस(एआई) - फोटो : Freepik

विस्तार

पिछले महीने गोवा विश्वविद्यालय के द्विदिवसीय अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में 'मुख्यधारा और दलित साहित्य' पर बीज वक्तव्य देने, सत्र की अध्यक्षता करने और बतौर ‘विजिटिंग प्रोफेसर' साहित्य, पत्रकारिता, आत्मकथा और कविता आदि प्रमुख विधाओं पर आठ व्याख्यान रिकॉर्ड कराने का सतत संयोग बना। सेमिनार में डॉ. शरण कुमार लिंबाले ने दिलचस्प संयोग साझा किया, 1986 में मैं मराठी साहित्य की परीक्षा दे रहा था।



प्रश्न ‘अक्करमासी’ (आत्मकथा) पर पूछे गए, लेकिन जब परिणाम आया, तो मेरे अंक सबसे कम थे। मैंने परीक्षा नियंत्रक से जिरह की, ‘मेरी आत्मकथा पर मुझसे अच्छा और कोई कैसे लिख सकता है। मैंने तो वह भी लिखा है, जो आत्मकथा लिखते हुए छूट गया था।’ तो इसका जवाब मिला कि पाठ से इतर जानकारी मूल्याकंन का हिस्सा नहीं हो सकती। ‘अक्करमासी' के प्रकाशन को चालीस साल पूरे हो गए, परंतु दूसरी आत्मकथा मशीन तो क्या, इन्सान भी नहीं लिख पाए।


तो क्या मौलिकता के बरक्स कृत्रिम मेधा साहित्यिक उत्पादन के खाली स्थान भर देगी? पाठक और श्रोताओं की प्रश्नाकुलता स्वाभाविक थी। यह विमर्श ऐसे समय में हो रहा था, जब अमेरिकी वैज्ञानिक जॉन होपफील्ड और ब्रिटिश कनैडियन जैफ्री हिंटन को संयुक्त रूप से मशीन लर्निंग या कृत्रिम मेधा के क्षेत्र में योगदान के लिए 2024 का नोबेल पुरस्कार देने की घोषणा हुई। स्वाभाविक तौर पर दावे किए जाने लगे कि एआई बौद्धिक क्षमता में इन्सान को मात दे सकती है। साहित्यिक विमर्श के क्षेत्र में भी इस बहस ने जगह ले ली। एक पक्ष ने इसे ‘मशीनी क्रांति' कहा, तो दूसरे पक्ष ने इसे भ्रांतिपूर्ण खतरा माना। पर तकनीकि क्रांति के भावी योगदानों की संभावनाओं और हमारी निर्भरताओं को तार्किक व वस्तुगत ढंग से झुठलाया नहीं जा सकता। मानवीय ज्ञान के विकास की यात्राएं समय सापेक्ष चमत्कार जैसी भी हुआ करती हैं।
ऐसे में यह प्रश्न भी उठा, कि 'गैर-दलित, परकाया प्रवेश कर दलित साहित्य क्यों नहीं लिख सकते?' जब मशीन से मनुष्य की कहानी लिखने की उम्मीद की जा रही है, तो इन्सान से नाउम्मीदी क्यों? जब विषय के तौर पर प्रोग्रामिंग के परिणामस्वरूप मशीन लिख सकती है, तो दलित लेखक व गैर-दलित अन्योन्याश्रित विषयक साहित्य क्यों नहीं लिख सकते? अन्यथा इन पंक्तियों के लेखक को ‘जिंदगी को ढूंढते हुए' आत्मकथा लिखने की जरूरत क्या थी? बीती सदी के अस्सी-नब्बे के दशक में जब भारत में कंप्यूटर आ रहा था, तो ये आशंकाएं भी उभर रही थीं, कि एक कंप्यूटर सौ हाथों का काम छीन लेगा। लेकिन कंप्यूटर से भी रोजगार उत्पन्न हुए। ज्ञान-कौशल से संपन्न दो-तीन पीढ़ियां आ गईं। हां, जिन बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं दी गई, उन्हें तकनीक प्रदत्त गुणवत्तापूर्ण जिंदगी भी सुलभ नहीं हुई। उनके लिए अवसर कम हुए और एआई की आमद से भी ऐसी ही आशंकाए उत्पन्न हो रही हैं।

भावनाएं, एहसास और इन्सानी खयालात की मशीन से उम्मीद करना तर्कसंगत नहीं है। मशीन का प्रेम इजहार, इन्सान की प्रेमाभिव्यक्ति की जगह नहीं ले सकता। पश्चिमी देशों में चर्चा है कि मशीन सेकंडों-मिनटों में कविता-कहानी लिख सकती है, जबकि इन्सान लिखने-सोचने में अधिक समय लेता है। यहां तो कोई आत्मपरक कहानी दशकों तक स्मृतियों में पड़ी रहकर कागज पर उतरती है। कहानीकार डेविड मीन्स ने सही कहा है, ‘एआई यंत्र मेरी बिल्ली पर कहानी नहीं लिख सकता, क्योंकि उसकी यादें मेरी कल्पना के ‘क्लाउड’ में बसती हैं।’ यहां प्रसंगवश हम सह-संवेदना को परखने की चेष्टा करते हैं। दस अक्तूबर को इन पंक्तियों का लेखक पूना में ‘मैपल पॉड’ के संस्थापक-निदेशक आयुष सिंह के निवास पर ठहरा था। यह फ्लैट प्रथम तल पर था और आगे करीब साठ मीटर के आंगन में घास, फूल खिल रहे थे। आयुष ने बेली, मेची और चैचे नामक तीन बिल्लियां पाली हैं। हमने दरवाजा खोला और बिल्लियों को खेलने-कूदने के लिए आजाद कर दिया। करीब एक घंटे बाद आयुष ने पूछा, ‘चैचे कहां है? यहां तो दो ही दिख रही हैं, वह नीचे गिर गई होगी, उसे बाज या चील उठा ले गई होगी, अथवा नीचे गिरते ही कोई व्यक्ति उठाकर ले गया होगा। वह पंद्रह हजार की बिक जाएगी। वह मेरे लैपटॉप से सटकर ही बैठती थी। उसे मैं अपने बिस्तर में सुलाता था, उसे अब नींद कैसे आएगी?’

आयुष को बिल्लियां पालने का शौक ब्रिटेन की चेस्टर यूनिवर्सिटी में पढाई के समय से है। हमें लगा, यह तो अनजाने ही बड़ी गलती हो गई। नींद तो ‘बिल्ली-प्रेमी’आयुष के साथ-साथ मेरी भी उड़ गई, क्योंकि मैंने ही उन्हें आजाद करने का गुनाह किया। आयुष की फीलिंग्स कहानी का एक-एक वाक्य ऐसे रच रही थी, जैसे इन्सानी लगाव का भाव समा रहा हो। आयुष की एक कहानी ‘अंधेरे में लड़की’ 2017 में ‘हंस’ में भी छपी थी। यों मशीन, जानवर, इन्सान और संवेदना सब को नई-नई परिभाषाओं की दरकार थी।

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