हादसे का इंतजार क्यों
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भारतीय नौकरशाही के बारे में कहा जाता है कि कल्पनाशीलता के मोर्चे पर उसकी सोच लचर है। उसे भावी घटनाओं-दुर्घटनाओं की गहराई या असर का अंदेशा-अंदाजा लगाने का गहरा प्रशिक्षण शायद ही दिया जाता है। इसीलिए बचाव पर यहां कम ध्यान देने की परंपरा रही है। इसलिए आप पूरे देश में जहां भी सड़क, पुल या ओवरब्रिज बनते दिखते हैं, वहां अफरातफरी, ट्रैफिक जाम और अव्यवस्था का आलम कुछ ज्यादा ही नजर आता है। भारतीय समाज भी स्वीकार कर चुका है कि विकास के ऐसे कार्यों के लिए उसे परेशानी झेलनी ही होगी। जब तक पुल बन नहीं जाता, सड़क तैयार नहीं हो जाती, निर्माणाधीन साइट पर बदहाली बनी रहती है। इसी बदहाली के बीच लापरवाही भी छिपी रहती है और हादसे उसकी ताक में रहते हैं।
हालांकि हाल के दो दशकों में दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन ने सलीके से काम करने का उदाहरण पेश किया है। लेकिन दुर्भाग्यवश उससे सीख नहीं ली गई। दिल्ली में जमीन के नीचे मेट्रो ट्रैक और स्टेशन बनाते वक्त दो दशक पहले मेट्रो अधिकारियों ने भरसक कोशिश की थी कि लोगों को कम से कम परेशानी हो। केंद्रीय सचिवालय से विश्वविद्यालय के बीच ट्रैक बनाने वाले कोरिया के इंजीनियर उन दिनों शाम को ट्रैफिक संभालने खुद सड़कों पर उतर आते थे। तब मेट्रो की इस कार्यशैली की बड़ी तारीफ हुई थी। बेशक बाद में 12 जुलाई 2009 को दिल्ली-फरीदाबाद मेट्रो खंड पर जमरूदपुर में हादसा हुआ था, जिसमें छह लोगों की मौत हुई थी। इससे आहत होकर मेट्रो मैन के रूप में विख्यात दिल्ली मेट्रो रेल काॅरपोरेशन के प्रमुख श्रीधरन ने इस्तीफा दे दिया था।
वाराणसी में जिस पुल का बीम चढ़ाते वक्त हादसा हुआ, उसे उत्तर प्रदेश का सेतु निगम बना रहा है। सेतु निगम उत्तर प्रदेश के दूसरे विभागों जैसा बदनाम नहीं रहा है। गंभीर भ्रष्टाचार के आरोपों के दौर में भी उत्तर प्रदेश राज्य सेतु निगम की साख रही है। उसकी ख्याति उसके द्वारा देश ही नहीं, दुनिया में बनाए गए मजबूत रेलवे, नदी या सड़क पुल के साथ ही ओवरब्रिज भी हैं। 1973 में इस निगम की शुरुआत हुई थी। तब महज पचास लाख रूपये की लागत से निगम ने काम शुरू किया था, जो अब बढ़कर पंद्रह सौ करोड़ तक पहुंच गया है। सेतु निगम की साख ही है कि उसने पूरी तरह से खुद के दम पर पूंजी जुटाकर उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में गंगा नदी पर चोपन में न सिर्फ रिकॉर्ड समय में पुल बनाया, बल्कि उसके टोल के जरिये कमाई से कर्ज भी चुका दिया।
उत्तर प्रदेश का संभवत: य़ह अकेला सरकारी निगम है, जो फायदे में है और हर साल राज्य सरकार को लाभांश भी देता है। वाराणसी के हादसे के लिए जिम्मेदार लोगों को दंड मिलना चाहिए। साथ में यह भी होना चाहिए कि निर्माण कार्य के दौरान सलीका और व्यवस्था बनाए रखने के लिए भी निर्माण तंत्र को न सिर्फ प्रशिक्षित किया जाना चाहिए, बल्कि इसके लिए आचार संहिता भी बननी चाहिए। तभी जाकर ऐसे हादसों को रोका जा सकता है।