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आपदा का इंतजार क्यों

वरुण गांधी Updated Wed, 05 Sep 2018 06:59 PM IST
केरल बाढ़
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केरल की अनूठी भौगोलिक बनावट-उद्दाम अरब सागर और पश्चिमी घाट के बीच तटवर्ती मैदानों और बेलनाकार पहाड़ियों से बना यह राज्य, कई प्राकृतिक खतरों से घिरा है, जिसमें भूस्खलन, बाढ़ और तटीय क्षरण आम हैं। इंसानी दखल के चलते खासकर बाढ़ की घटनाएं बढ़ी हैं। हालिया जलप्रलय से दस लाख से ज्यादा लोग विस्थापित हुए हैं, जिन्हें तीन हजार से ज्यादा राहत शिविरों में रखा गया है। बाढ़ से करीब 21,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है।
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माधव गाडगिल की अगुवाई वाले पश्चिमी घाट विशेषज्ञ पारिस्थितिकी पैनल ने पश्चिमी घाट में करीब 14 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में तीन पारिस्थितिक संवेदनशील क्षेत्र बनाने की सिफारिश की थी और इनमें निर्माण व खनन गतिविधियों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने को कहा था। राज्य सरकार ने रिपोर्ट खारिज कर दी।

भारत प्राकृतिक आपदाओं की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र है। इसका लगभग 70 फीसदी भू-भाग सुनामी और चक्रवात की दृष्टि से संवेदनशील है, 60 फीसदी भूभाग भूकंप संभावित है, और 12 फीसदी बाढ़ग्रस्त है। शहरी भारत में हाल के वर्षों में बीम, खंभे और ईंट की दीवारों के फ्रेम वाली बहुमंजिला इमारतें बहुतायत में बनी हैं। पार्किंग स्पेस के मद्देनजर बुनियादी मजबूती से समझौता करके बनाई गई इन इमारतों में भारी लागत के बावजूद फौरन रेट्रोफिटिंग (पुरानी इमारतों या ढांचे में जरूरत के अनुसार नई चीजें जोड़ना) किए जाने की जरूरत है। अधिकांश भारतीय घर पत्थर या कच्ची/पक्की ईंटों की चिनाई करके तैयार दीवारों से बने होते हैं, फिर भी शायद ही किसी सिविल इंजीनियरिंग स्नातक पाठ्यक्रम में इन सामग्रियों पर विचार किया जाता है। इसके बजाय सारा जोर आरसीसी (रीइंफोर्स सीमेंट कंकरीट) पर है। आईआईटी रूड़की समेत देश के चंद विश्वविद्यालयों में ही भूकंप इंजीनियरिंग को विशेषज्ञ कोर्स के रूप में पढ़ाया जाता है, जिससे रेट्रोफिटिंग के लिए प्रशिक्षित सिविल इंजीनियरिंग मैनपावर की भारी कमी है। आपदा प्रबंधन अभी शुरुआती अवस्था में ही है। नेपाल के भूकंप को भारत की भूकंप चेतावनी प्रणाली 'एक्सेलेरोग्राफ' ने बमुश्किल ही दर्ज किया।
 
हालात का सामना करने के लिए विकसित राज्य भी कुछ नहीं कर रहे हैं- गृह मंत्रालय ने अप्रैल, 2003 में आपदाओं से निपटने के लिए सीआईएसएफ और आईटीबीपी से चार बटालियनों को अलग करके विशेषज्ञ टीमें बनाने का प्रस्ताव दिया था, जिसके लिए केरल को एक राज्य स्तरीय प्रशिक्षण संस्थान और पुलिस स्तर की बटालियनों की पहचान करना था; राज्य ने अभी तक इस अनुरोध का जवाब नहीं दिया है। यहां तक कि बीते साल के ओखी तूफान के बाद छह सौ से अधिक सदस्यों वाली एक विशेष टीम बनाने के लिए केंद्र सरकार द्वारा पहले चरण में तीस करोड़ रुपये की मंजूरी के साथ एक प्रस्ताव दिया गया था- यह प्रस्ताव भी अब तक राज्य सरकार की मंजूरी का इंतजार कर रहा है।

हम हर साल आने वाली आपदाओं की भविष्यवाणी कर पाने में भी बहुत पीछे हैं। केदारनाथ त्रासदी के कई वर्षों बाद आज भी उत्तराखंड में शायद ही चंद डॉपलर रडार होंगे, जो बादल फटने और भारी बारिश की चेतावनी (तीन से छह घंटे पहले) देते हैं। पर्याप्त संख्या में हेलीपैड की बात तो जाने दीजिए, सुरक्षित क्षेत्रों के नक्शे या बाढ़ संभावित क्षेत्रों में निर्माण के बारे में दिशा-निर्देश भी मुश्किल से मिलते हैं। पहाड़ों में बड़े बांध मंजूर किए जाते हैं और नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी (एनडीएमए) खामोश रहता है।
 
भारत के पांच हजार बांधों में से अभी तक केवल दो सौ बांधों के लिए ही कुछ राज्यों ने आपातकालीन कार्ययोजना तैयार की है, बाकी 4,800 यों ही छोड़ दिए गए हैं। केरल में अच्छा काम करने के बावजूद, यह हकीकत है कि नेशनल डिजास्टर रिस्पांस फोर्स (एनडीआरएफ) की क्षमता प्रशिक्षित कर्मचारियों, प्रशिक्षण, बुनियादी ढांचे और उपकरणों की कमी से बाधित है। जैसा कि कैग ने कहा है, प्रमुख शहरों के लिए खतरे का मूल्यांकन और समाधान जैसी परियोजनाओं में एनडीएमए का प्रदर्शन बदतर स्थिति में है।

हमें भारत में आपदा राहत के मानदंडों में भी बदलाव करने की जरूरत है। हर राज्य और जिले में श्रम और निर्माण की अलग-अलग लागत होती है, जिससे राहत की एक समान राशि का वितरण सही नहीं है। मौजूदा आपदा मानदंड राज्यों के बीच अंतर नहीं करते हैं - बुंदेलखंड में भी आपदा राहत के लिए प्रति इकाई वही राशि दी जाती है, जो गोवा में। आमतौर पर, आपदा के बाद, राजस्व अधिकारी प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करने और राहत के वास्ते लोगों की पहचान करने के लिए जिम्मेदार होते हैं; यह राहत का दुरुपयोग होने और भ्रष्टाचार के लिए मौका देता है। इसके अलावा, कोई भी आपदा राहत आमतौर पर अनाधिकृत क्षेत्र में रहने वाले किसी भी शख्स को वंचित रखेगी। इस तरह के मापदंड केवल छोटे और बड़े किसानों पर केंद्रित होने से बंटाईदारों और खेतिहर मजदूरों की भी उपेक्षा कर देते हैं।
 
नियोजित तरीके से बसाए गए शहर आपदाओं का सामना कर सकते हैं- जापान को देखें, तो वह हमेशा आसानी से भूकंप का सामना कर लेता है। भारतीय आपदा संसाधन नेटवर्क को सूचना और उपकरण जुटाने के लिए संस्थागत रूप से काम करने का जिम्मा दिया जाना चाहिए। देश को एक मजबूत आपदा प्रबंधन एजेंसी की जरूरत है। आपदा से निपटने की तैयारी में तात्कालिक आकस्मिकता को पूरा करने के साथ ही इंसानी स्वभाव को समझते हुए सुविचारित दीर्घकालिक पुनर्वास रणनीति को लागू करने पर ध्यान दिया जाना चाहिए। ऐसे सुधारों के अभाव में, आपदा की स्थिति में सिर्फ सेना और अर्धसैनिक बल ही सबसे पहले प्रतिक्रिया करने वाले बने रहेंगे और राज्य राहत का रोना रोते रहेंगे। शायद, प्राकृतिक आपदा से आपात स्थिति पैदा होने पर उसका सामना करने के बजाय पहले से बेहतर तैयारी रखने का यही सही समय है।

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