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लक्ष्मियों से क्यों रूठ जाती है लक्ष्मी
मनीषा सिंह
Updated Wed, 22 Oct 2014 08:55 PM IST
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भारतीय परंपरा में स्त्री को लक्ष्मी-स्वरूपा कहा जाता रहा है। प्राचीन संदर्भों में स्त्री के लक्ष्मी-स्वरूपा होने का एक विचित्र आशय यह था कि वह संपत्तियों में भी गिनी जाती थी। पर आधुनिक संदर्भों में एक स्त्री घर की लक्ष्मी तब और ज्यादा कहलाती है, जब वह परिवार के लिए चार पैसे कमाकर लाती है। मगर हमारे पुरुष प्रधान समाज की एक मनोग्रंथि इस गृहलक्ष्मी को लक्ष्मी यानी धन अर्जित करने से रोक रही है।
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इसकी कई मिसालें हैं कि कैसे समाज कामकाजी महिलाओं के साथ भेदभाव बरतता है। एक उदाहरण कंप्यूटर कंपनी माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ सत्य नडेला का है, जिन्होंने हाल ही में कंप्यूटर उद्योग से जुड़ी महिलाओं की वेतनवृद्धि से जुड़े मसले पर दार्शनिक अंदाज में टिप्पणी की थी कि कामकाजी महिलाओं को वेतन बढ़ोतरी की मांग उठाने के बजाय कर्मफल पर भरोसा करना चाहिए। हालांकि चौतरफा आलोचना होने के बाद नडेला ने अपने बयान पर माफी मांग ली, लेकिन एक अमेरिकी कंपनी की भारतीय इकाई-कैटलिस्ट इंडिया ने आईटी उद्योग में पुरुष कर्मचारियों के मुकाबले महिलाओं के वेतन में विसंगति के ठोस आंकड़े पेश कर मामला साफ कर दिया। इस कंपनी के मुताबिक, भारतीय आईटी कंपनियों में 12 साल की नौकरी में पुरुष और महिला कर्मचारी के वेतन में औसतन 3.8 लाख रुपये सालाना का अंतर आ जाता है।
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कामकाजी महिलाओं के साथ हमारा समाज जैसा बर्ताव कर रहा है, उनमें वेतन विसंगति तो बहुत छोटा मामला जान पड़ता है। पता चल रहा है कि पिछले दस वर्षों में देश के कामकाजी माहौल से करीब चार करोड़ महिलाएं ओझल हो गई हैं। इसका फायदा पुरुष कर्मचारियों को हुआ है। उनकी मजदूरी बढ़ गई है। यानी लक्ष्मी महिलाओं से रूठकर पुरुषों के पाले में चली गई है। शहरों और गांवों के कामकाजी माहौल में महिलाओं की बढ़ती अनुपस्थिति की वजहें अलग-अलग हैं। गांवों-कस्बों में मजदूर वर्ग की महिलाओं ने एक सकारात्मक वजह से भी काम छोड़ा है। वहां 15-25 आयु वर्ग की महिलाएं शिक्षा हासिल कर अच्छा करियर बनाने पर ज्यादा जोर दे रही हैं। मगर दूसरा कारण महिलाओं के खिलाफ हिंसा और यौन शोषण जैसी घटनाओं का बढ़ना है, जिसने न चाहते हुए भी महिलाओं को कामकाजी क्षेत्रों से वापस खींचा है।
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ऐसे में सवाल यह है कि क्या हमारा समाज और हमारे योजनाकार कामकाजी परिदृश्य में ऐसा कोई बदलाव पैदा कर सकेंगे, जिससे महिलाओं को लक्ष्मी कहलाने का वास्तविक गौरव हासिल हो सके। कुछ वाणिज्यिक संस्थाओं (जैसे कि क्रिसिल) का आकलन है कि अगले पांच-छह वर्षों में देश के एक करोड़ 20 लाख लोग अपनी नौकरी छोड़कर जीवन-यापन के लिए खेती की तरफ लौट सकते हैं। इससे देश की कृषि व्यवस्था को लाभ होगा, यह कहना मुश्किल है, क्योंकि ये लाखों-करोड़ों लोग पारिवारिक बंटवारे के चलते पहले से आकार में छोटे हो गए खेतों पर और अधिक दबाव पैदा करेंगे। इसलिए जरूरी है कि महिलाओं को रोजगार से जोड़े रखने वाले प्रयास किए जाएं और उनकी सक्रिय भागीदारी कायम रखी जाए।