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क्यों अमीर लोग गरीबों पर ज्यादा खर्च करें
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गरीबी
अच्छा पूंजीवाद भारत में असमानता की खाई को कैसे खत्म कर सकता है? वर्ष 2018 में जारी तीन रिपोर्ट कहती हैं कि देश में अति समृद्ध लोगों की तादाद बढ़ रही है। हालांकि यह बात देश की जीवंत अर्थव्यवस्था की ओर भी इशारा करती है, जहां पूंजीवाद के प्रसार को रोकना असंभव है, लेकिन साथ ही रिपोर्ट यह भी कहती है कि हमें सबकी प्रगति और समृद्धि के लिए एक न्यायसंगत और 'नैतिक रूप से सभ्य' दिशा में काम करना चाहिए।
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अमेरिका में इस तरह के काम यानी परोपकारिता का प्रचलन काफी ज्यादा है। वहां बड़े लोग कल्याणकारी कार्यों में काफी आगे रहते हैं। यह तब शुरू हुआ, जब छोटी शुरुआत के बाद लोगों ने तरक्की की और वे अति समृद्ध बने। उनके उद्यम न केवल आकार में बड़े हुए, उनकी संपत्ति भी काफी बढ़ी। मसलन फेसबुक, माइक्रोसॉफ्ट, गूगल,एपल आदि। तो यह बात भारत पर भी लागू होनी चाहिए। ग्लोबोपोलिस यानी वैश्विक आधार पर अपने उद्यम से प्रभावित करने वाले लोग कहीं बड़े होते जा रहे हैं। अमेरिका में कॉरपोरेट सामाजिक दायित्व जैसा कानून नहीं है, लेकिन यह प्रवृत्ति स्वैच्छिक जरूर है। बड़ी अमेरिकी कंपनियां अपने मुनाफे का एक बड़ा हिस्सा सामाजिक कामों में लगाती हैं, जबकि भारतीय कॉरपोरेट्स और धनी लोग ऐसा कम ही करते हैं।
भारत के फ्लिपकार्ट, पेटीएम और ओवाईओ और इसी तरह ज्यादातर टेलीकॉम, आईटी कंपनियों और नॉलेज इकोनॉमीज आधारित उद्यम को पहली पीढ़ी के मेधावी लोगों ने स्थापित किया। ये उन उद्योगों से बिल्कुल अलग हैं, जो खनन, अचल संपत्ति और पहले की तरह प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े रहे हैं। भारत में ये नए तरह का व्यवसाय क्षेत्र है, जिसका सामाजिक दायित्व भी होना चाहिए। जब जबरदस्त लाभ होता है, तो यह कर्तव्य बनता है कि इस लाभ का एक बड़ा हिस्सा सामाजिक सुधारों पर खर्च किया जाए। चर्चा का बिंदु यह है कि अमीर लोग जो ऊंची कमाई कर रहे हैं, उनका समाज के लिए क्या दायित्व है? भारत में 831 ऐसे भारतीय हैं, जिनकी कुल संपत्ति 1000 करोड़ रुपये या इससे ज्यादा है। बर्कले हुरुन इंडिया की रिच लिस्ट-2018 के अनुसार, अगर इन सबकी संपत्ति मिला दें, तो यह 719 अरब डॉलर के बराबर होगी, यानी देश की अप्रैल 2018 की कुल जीडीपी 2,848 अरब डॉलर की चौथाई रकम के बराबर।
हालिया आंकड़े संपत्ति पुनर्वितरण के बारे में बताते हैं कि हमारे यहां गरीबी उन्मूलन की गति नाकाफी है। हमें खुद में सुधारों की जरूरत है, जो नया हो और असरदार भी। इसका मतलब यह नहीं है कि अमीरों से धन लेकर गरीबों को दो या फिर अमीरों को अमीर बनने की सजा दो, बल्कि इसका तात्पर्य यह है कि अति समृद्ध लोगों की एक नई श्रेणी बनाकर उनके लिए सीएसआर रेट को मौजूदा दो फीसदी से ज्यादा किया जाए।
ऑक्सफैम 2018 के सर्वे के अनुसार, भारत में एक फीसदी लोगों के पास 73 फीसदों लोगों के बराबर संपत्ति और धन है। उन्होंने पिछले साल अपने धन में और बढ़ोतरी की। भारत की 67 करोड़ आबादी गरीबी में रहती है, जो देश की लगभग आधी आबादी है, और उनकी संपत्ति मात्र एक फीसदी की दर से बढ़ रही है। ऐसे में क्या हम कल्पना कर सकते हैं कि इन लोगों को गरीबी से बाहर निकालने में कितना लंबा वक्त लगेगा?
बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप की ताजा रिपोर्ट के निष्कर्ष बताते हैं कि 2017 में भारत में 3,22,000 अमीर, 87,000 उच्च संपत्ति वाले और 4,000 अत्यधिक उच्च संपत्ति वाले लोग थे। इसकी तुलना में नाबार्ड की 2018 की रिपोर्ट कहती है कि देश में 48 फीसदी परिवार कृषि पर आधारित हैं, जिनकी औसत बचत पिछले साल कम से कम 6,000 से 12,000 रुपये तक रही। इनमें से केवल 27 फीसदी लोगों ने वित्तीय संपत्ति में निवेश किया। हालांकि जिसने भी निवेश किया, उसे सात फीसदी ब्याज दर से प्रति वर्ष दस हजार रुपये की बचत पर आखिर उससे कितनी कमाई होगी? अब चूंकि नई सामाजिक सच्चाइयों के साथ कानूनों में बदलाव हो रहे हैं, लिहाजा कर सुधारों को ऑक्सफैम, बर्कले और बोस्टन ग्रुप के साथ-साथ हमारे नाबार्ड रिपोर्ट के अनुमानों में कारक होना चाहिए, क्योंकि उदारीकरण और वैश्वीकरण का फायदा पर्याप्त रूप से ऊपर से नीचे तक कभी नहीं पहुंच पाता है।
भारत पहला देश है, जिसने 2014 में सीएसआर को अनिवार्य बनाया। तब सरकार ने तीन साल के औसत लाभ के दो फीसदी को सीएसआर में लगाने का प्रावधान किया था। लेकिन इसे लागू या अनिवार्य करने के साथ इसका पालन नहीं करने वाले को दंडित करने के संबंध में अभी कोई कानून नहीं है। तथ्य यह है कि देश की शीर्ष 500 कंपनियों द्वारा वर्ष 2014 से मार्च 2019 तक सीएसआर के तहत खर्च की जाने वाली रकम 50 हजार करोड़ रुपये होनी चाहिए, यानी हर साल मोटे तौर पर 10 हजार करोड़ रुपये। लेकिन यह व्यावसायिक समुदाय के लाभ की तुलना में कहीं कम और गैर अनुपातिक है। केपीएमजी का एक सर्वे बताता है कि देश की 100 बड़ी कंपनियों में से 52 ने सीएसआर में तय दो फीसदी रकम खर्च ही नहीं की। इसके अलावा कई कंपनियों ने सीएसआर धन की बर्बादी भी की।
हमारे देश में कंपनी के सीईओ और मालिकों का वेतन और भत्ता अधिकतम स्तर से भी ज्यादा होता है। इसमें से सिर्फ 0.5 फीसदी रकम भी व्यक्तिगत सामाजिक जिम्मेदारी के लिए खर्च की जाए, तो यह काफी कुछ प्रभाव डाल सकती है। ऐसी ही स्थिति कृषि आय में भी है, छोटे किसानों की हालत खराब है। उनके पास न तो पर्याप्त उपकरण हैं और न पैसे। बहुत कम ऐसे किसान होंगे, जिनके पास 10 हेक्टेयर से ज्यादा जमीन होगी। कृषि में 0.4 फीसदी लोगों के पास ज्यादा खेती की जमीनें हैं और मोटी कमाई है। इनमें से शीर्ष 4.1 फीसदी लोगों पर टैक्स लगाया जाए, तो 25 हजार करोड़ रुपये जमा हो सकते हैं, हालांकि कृषि आय राज्य सरकार का विषय है। गरीबी उन्मूलन की अर्थव्यवस्था की पुनः गणना करने के लिए हमें क्रांतिकारी ढंग से सोचने की जरूरत है। यहां महत्वपूर्ण निर्णय अति समृद्ध माने जाने वाले लोगों (चाहे वे व्यक्तिगत हों या कॉरपोरेट) की आय सीमा निर्धारित करने और सीएसआर खर्च की मौजूदा दो फीसदी की दर को बढ़ाने की है। बढ़ी हुई सीएसआर की राशि को कला, संस्कृति और खेलों के बजाय गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम पर खर्च किया जाना चाहिए।
-लेखिका नीति आयोग की वित्तीय साक्षरता कमेटी की अध्यक्ष हैं