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किसानों की आय में इतना फर्क क्यों

Mon, 13 Aug 2018 06:52 PM IST
सौमित्र चटर्जी
सौमित्र चटर्जी Updated Mon, 13 Aug 2018 06:52 PM IST
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Why so much difference between farmers' income
किसान

भारतीय किसानों को बहुत कम राजस्व मिलता है। कम राजस्व मिलने का कारण यह है कि या तो किसान अनुत्पादक हैं या उन्हें अपने उत्पादों की कम कीमत मिलती है। उत्पादकता जहां खेती के तकनीकी पहलुओं से संबंधित है, वहीं मूल्य प्राप्ति कृषि अर्थव्यवस्था की स्थिति पर निर्भर करती है, जो बेहतर आर्थिक नीति से दुरुस्त की जा सकती है।


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इकोनोमिक ऐंड पॉलिटिकल वीकली (2012) में प्रकाशित रमेश चंद के लेख डेवलपमेंट पॉलिसी ऐंड एग्रीकल्चर मार्केट्स के अनुसार, किसानों को मिलने वाले राजस्व और उपभोक्ताओं द्वारा चुकाई जाने वाली कीमतों के बीच बहुत अधिक अंतर के लिए प्राय: बिचौलियों को दोषी ठहराया जाता है। दो आम आरोप जो लगाए जाते हैं, वे यह कि उपभोक्ता तक पहुंचने से पहले मध्यस्थता की कई परतें इन दोनों के अंतर को बढ़ाती हैं, और बिचौलिये वस्तु की गुणवत्ता में कुछ जोड़े बगैर ही मुनाफा कमाते हैं। बेशक इस बात में कुछ सच्चाई हो सकती है, लेकिन बिना गंभीर पड़ताल के इसकी सच्चाई जानना मुश्किल है।

आर्थिक सिद्धांत बिचौलियों को अक्षमता का पर्याय नहीं, बल्कि वह इन्हें अर्थव्यवस्था के पहिये को चिकनाई प्रदान करने वाला मानता है। मैथ्यू ग्रांट और मेरिडिथ स्टार्ट्ज के ताजा अध्ययन ने दिखाया है कि दीर्घकालीन आपूर्ति शृंखला में कुछ खास स्थितियों के तहत कई बिचौलिये प्रतिस्पर्धा को प्रेरित करके उपभोक्ताओं को फायदा पहुंचाते हैं। किसान के पास खेती और अन्य गतिविधियों के लिए सीमित समय ही होता है। जैसा कि मैंने पंजाब और बिहार के इलाकों में दौरे के दौरान पाया, समय एक बड़ी बाधा है, जो किसानों को अपने उत्पादों की बिक्री करने से रोकता है, जिससे बिचौलियों को पनपने का मौका मिलता है।

इसके अलावा परिवहन और विपणन के लिए खास कौशल की जरूरत होती है, जो किसानों में नहीं भी हो सकता। भंडारण की कमी और उत्पादों के एक समय बाद नष्ट हो जाने के कारण जोखिम बढ़ता है। ऋण बाजार (क्रेडिट मार्केट) के अभाव में न केवल किसान बिचौलियों से उधार लेते हैं, बल्कि बिचौलिये भी एक-दूसरे से उधार लेते हैं। ये कारक वास्तव में खुदरा उपभोक्ता मूल्य और किसानों को मिलने वाले राजस्व के बीच अंतर को बढ़ाते हैं। आम तौर पर कीमतों में अंतर परिवहन लागत, प्रसंस्करण लागत और किराये के चलते होता है।
 
वर्तमान भारतीय संदर्भ में यह स्पष्ट नहीं है कि परिकलित अंतर का कितना हिस्सा शुद्ध किराया है। इसे समझने के लिए ज्यादा शोध की जरूरत है। वैध लागत से किराये को अलग करने के लिए आपूर्ति शृंखला के साथ विभिन्न बिंदुओं पर उच्च आवृत्ति मूल्य डेटा की आवश्यकता होती है-जो मेरे मौजूदा अध्ययन का विषय है। श्रम विभाजन के नजरिये से देखें, तो बिचौलिये समस्या के स्रोत नहीं हो सकते। वे बस अपनी सेवाओं और उसके जोखिम के लिए मामूली मूल्य कमा सकते हैं। इसलिए उन्हें बाहर होने के लिए बाध्य करने पर कृषि आपूर्ति शृंखला बाधित हो सकती है, जैसा बांग्लादेश में हुआ।

यह एक आम गलतफहमी है कि बेहतर बाजारों के साथ एक ही फसल उपजाने वाले किसानों को देश भर में उनके उत्पादों का एक जैसा मूल्य मिलेगा। किसी क्षेत्र में एक वस्तु के मूल्य में वृद्धि अतिरिक्त मांग का संकेत करती है। इसके बाद आपूर्तिकर्ता उस क्षेत्र में कीमतों में कमी करने के लिए आपूर्ति बढ़ाते हैं। हालांकि वस्तुओं का परिवहन महंगा होता है और वह इतना अधिक होता है कि अच्छे बाजारों में भी परिवहन लागत के चलते कीमतों में अंतर बना रहता है। इकोनोमिक सर्वे ऑफ इंडिया (2015-16) के मुताबिक, भारत में वस्तुओं के उच्चतम और न्यूनतम मूल्य का अनुपात अमेरिका की तुलना में लगभग तीन गुना होता है। भारतीय बाजारों में हमें वस्तुओं की विविधता और उनकी गुणवत्ता के बारे में जागरूक रहने की जरूरत है, जबकि इसकी प्रायः उपेक्षा की जाती है। अमेरिका के विपरीत भारत में वस्तुओं की कीमत बताते हुए उसकी विविधता और गुणवत्ता के बारे में नहीं बताया जाता। जबकि अमेरिका की तुलना में भारतीय कृषि उत्पादों की विविधता और गुणवत्ता ज्यादा व्यापक है।

अलग-अलग जगहों में एक ही वस्तु की कीमत अलग-अलग होने के कई कारक होते हैं-जैसे-परिवहन लागत, नियामक बाधाएं, बिचौलियों और खुदरा बिक्रेताओं की स्थानीय बाजार में ताकत-जो वस्तुओं के स्वतंत्र आवागमन को रोकते हैं। चूंकि ये कारक किसानों को उच्च कीमत पाने और उपभोक्ताओं को कम कीमत पर खाद्य वस्तु खरीदने से रोकते हैं, इसलिए कुल मिलाकर ये लोककल्याण को कम करते हैं। चुनौती यह पता करने की है कि कौन-सी सीमा किसानों के लिए प्रतिकुल परिणाम लाती है।
 
वर्ष 2017 में मैंने देवेश कपूर के साथ एक लेख लिखा था-भारतीय कृषि की छह पहेलियां, जिसमें हमने निम्न निष्कर्ष दिए थे- पहला, भारत में स्थानीय मूल्य भिन्नता न केवल उच्च है, बल्कि पिछले दशक में बहुत स्थिर रही है। इन दस वर्षों में नई सड़कों के निर्माण में भारी निवेश ने परिवहन लागत घटा दी है। मोबाइल फोन के विस्तार ने किसानों को कीमतों की जानकारी भी बढ़ाई है। फिर भी मूल्यों में अंतर अब भी उच्च बना हुआ है, जो दर्शाता है कि परिवहन लागत घटने और सूचनाओं के विस्तार से स्थानीय मूल्यों में भिन्नता पर बहुत कम असर पड़ा है। दूसरी बात, हमने पाया कि कीमतों में समग्र अंतर का 37 फीसदी समय, क्षेत्रीय भिन्नता और फसलों की स्थानीय गुणवत्ता, किस्म, स्थानीय बाजार की ताकत और मिट्टी की गुणवत्ता जैसे विशिष्ट कारकों के कारण है। कीमतों में स्थानीय भिन्नता का 20 फीसदी वैश्विक मांग में उतार-चढ़ाव के कारण है और चार फीसदी क्षेत्रीय बारिश में अंतर के कारण। प्रत्येक सूक्ष्म-घटक के सापेक्ष योगदान को समझने के लिए और अधिक शोध की आवश्यकता है।

अपने शोध में मैंने भारतीय मंडियों की बाजार शक्ति में स्थानिक विषमता को उजागर किया है। मैंने पाया कि जिन क्षेत्रों में ज्यादा मंडियां हैं, वहां के किसानों को औसतन ज्यादा मूल्य मिलता है। नीति-निर्माण के लिए उपभोक्ता मूल्य व किसान को मिलने वाले मूल्य के अंतर के साथ-साथ क्षेत्रीय मूल्य अंतर को समझना महत्वपूर्ण है।
 
-लेखक कैंब्रिज विश्वविद्यालय में फैकल्टी ऑफ इकोनॉमिक्स में पोस्ट डॉक्टरल रिसर्च एसोसिएट हैं।

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