{"_id":"49a80be79c601e330fe4f5bfae7189b4","slug":"why-should-antipathy","type":"story","status":"publish","title_hn":"घृणा का कोई रंग क्यों हो","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया ","slug":"opinion"}}
घृणा का कोई रंग क्यों हो
Updated Wed, 24 Jul 2013 07:57 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
दिल्ली विश्वविद्यालय के विधि संकाय में नाइजीरियाई मूल के एक छात्र की पीड़ा कई सवाल खड़े करती है। वह बताता है कि मुझे हिंदी समझ में नहीं आती, मगर जब कोई ‘काला’ कहकर हिकारत से बुलाता है, तो मैं समझ जाता हूं। उसे अपने सहपाठियों या प्रोफेसरों से कोई शिकायत नहीं है, मगर शेष दिल्ली के लोगों का व्यवहार देखकर उसे लगता है कि काश, वह अपने मुल्क में ही रुक गया होता।
विज्ञापन
राजधानी के नामचीन विश्वविद्यालय के इस छात्र की आपबीती सप्ताह भर पहले बंगलूरु से आई एक खबर की याद ताजा करती है, जहां लगभग एक दशक से रह रहे अफ्रीकी मूल के एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर को नस्लीय हमले का शिकार होना पड़ा था।
विज्ञापन
बहरहाल, यह किसी एक की पीड़ा नहीं है, और न ही ऐसे मामले दिल्ली या बंगलूरु तक सीमित हैं। अनधिकृत आंकड़ों के मुताबिक, मुंबई में रहनेवाले लगभग पांच हजार अफ्रीकियों को इसी किस्म का भेदभाव झेलना पड़ता है।
विज्ञापन
पिछले साल मुंबई में पढ़ रहे एक अश्वेत छात्र ने अपना दुखद अनुभव बताया था। उसके मुताबिक, जैसे ही लोकल ट्रेन बांद्रा स्टेशन पहुंची, कंपार्टमेंट के चंद उजड्ड छात्रों ने चिल्लाना शुरू किया, कल्लू, नीचे उतरो। कल्लू, नीचे उतरो। 29 साल के उस सूडानी छात्र ने ऐसे तमाम अनुभवों को मुंबई के जीवन का हिस्सा मान लिया है।
रंगभेद पर आधारित यह बदसुलूकी उस मुंबई की सच्चाई है, जिसकी एक कॉस्मोपॉलिटन शहर के तौर पर चारों ओर चर्चा है। उस छात्र ने रुआंसा होते हुए सवाल किया था कि मुझे अपने रंग से क्यों संबोधित किया जाए? मैं उनसे पूछता हूं कि क्या आप अपने आप को भूरा कहकर बुलाते हैं?
विडंबना तो यह है कि भारतीय छात्रों के साथ ऑस्ट्रेलिया में कथित तौर पर नस्लीय भेदभाव को लेकर उत्तेजित होते दिखते विदेश मंत्रालय के अधिकारियों से लेकर सरकारी कर्मचारी तक रंगभेद की भावना से अछूते नहीं हैं। विगत दिसंबर में विदेश सचिव जनाब रंजन मथाई से अफ्रीकी महाद्वीप के कई देशों के राजदूतों ने मुलाकात कर शिकायत दर्ज कराई कि राजदूत होने के उनके विशेषाधिकार का सम्मान करना तो दूर, हवाई अड्डे पर उनके साथ दोहरा व्यवहार किया जाता है और उन्हें आम यात्रियों के साथ लाइन में खड़े होकर उड़ान पकड़नी पड़ती है।
विदेश सचिव से राजदूतों ने यही जानना चाहा था कि क्या यह भारत सरकार का आधिकारिक रुख है कि अश्वेत राजदूतों के साथ दोहरा व्यवहार हो, या इसे स्थानीय अधिकारियों के पूर्वाग्रह के तौर पर देखा जाना चाहिए। दरअसल राजदूतों को इमीग्रेशन काउंटर की औपचारिकताओं से मुक्त रखा गया है। दूसरे देश के प्रति सम्मान दिखाने का यह शिष्ट तरीका है।
भारत के अफ्रीका में बढ़ते निवेश या विभिन्न कंपनियों द्वारा उस महाद्वीप के विभिन्न देशों में किए जा रहे पूंजी निवेश से वाकिफ सचिव महोदय को लगा था कि शायद यह मुलाकात भारत जैसे उपमहाद्वीपीय मुल्क एवं विकास के पथ पर अग्रसर इन देशों के बीच आर्थिक सहयोग की रफ्तार को तेज कराने के रास्ते में आ रही बाधाओं को लेकर होगी। मगर उन्होंने राजदूतों की इन शिकायतों को सुनने के बाद यह आश्वासन दिया कि भविष्य में ऐसी गलती नहीं होगी। लेकिन चंद दिनों बाद क्रिसमस के मौके पर प्रधानमंत्री के यहां राजदूतों को बुलाया गया, तो उनमें केवल पश्चिमी देशों के राजदूत ही थे।
जाहिर है, दिल्ली और मुंबई में पढ़ाई कर रहे अफ्रीकी छात्रों और अफ्रीकी राजदूतों के साथ होते सुलूक कमोबेश एक जैसे हैं। औपनिवेशिक शोषण एवं लूट के साझा इतिहास के बावजूद या गरीबी की विकराल समस्या के बीच भी अश्वेत लोगों के प्रति यहां के लोगों का अहंकारपूर्ण व्यवहार समझ में नहीं आता।
लोग यह इतिहास भी भूल गए कि 1948 में भारत ने दक्षिण अफ्रीका के रंगभेदी शासन की समाप्ति की मांग की थी। क्या इसे उपनिवेशवाद की विरासत के तौर पर देखा जाए- जिसमें एक बड़े हिस्से के मन-मस्तिष्क पर श्वेत चमड़ी का भार दिखाई देता है, या विकास की दौड़ में पिछड़े अफ्रीकी मुल्कों की स्थिति की परिणति माना जाए? या इसे सफेद रंग के प्रति लोगों के सम्मोहन का नतीजा कहा जाए? वजह चाहे जो भी हो, लेकिन इस मानसिकता पर अंकुश लगना चाहिए।