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सच क्यों नहीं बोलते राहुल

Sun, 15 Jan 2017 07:51 PM IST
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Updated Sun, 15 Jan 2017 07:51 PM IST
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Why Rahul does not speak the truth
तवलीन सिंह

पिछले सप्ताह विदेश से छुट्टियां बनाकर लौटे कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने आते ही प्रधानमंत्री पर आक्रमण किया। विदेशों की जलवायु कांग्रेस उपाध्यक्ष को इतना सूट करती है कि जब भी वतन लौटकर आते हैं, उनमें नई ऊर्जा दिखती है। दो वर्ष पहले जब लंबी छुट्टी मनाने के बाद लौटे थे, तो लोकसभा में दाखिल होते ही उन्होंने ऐसा जबरदस्त भाषण दिया कि देश भर में चर्चा फैल गई नरेंद्र मोदी की ‘सूट-बूट सरकार’ की।

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इस बार उन्होंने कांग्रेस कार्यकर्ताओं की एक सभा को दिल्ली में संबोधित करते हुए कहा कि भारत के प्रधानमंत्री का दुनियावाले आजकल मजाक उड़ा रहे हैं। एक भी ऐसा अंतरराष्ट्रीय अर्थशास्त्री नहीं है, जो नोटबंदी को बेकार और बेवकूफी भरा कदम नहीं कह रहा है। अब हम-आप को तो मालूम नहीं है कि राहुल जी कहां गए थे, क्योंकि इस बार भी उनकी यात्रा का राज राज ही रहा है अब तक। लेकिन इतना कह सकती हूं कि राहुल जी स्वयं बहुत पहले मजाक न बन गए होते, तो शायद उनकी बात को गंभीरता से लिया जाता।
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दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में जब भी राहुल जी की बातें होती हैं, तो लोग मुस्करा कर कहते हैं कि राहुल जब भी मुंह खोलते हैं, तो मोदी की मदद ही करते हैं, नुकसान नहीं। एक राजनीतिक पंडित के शब्दों में, नोटबंदी से वास्तव में लोगों को तकलीफ हुई है, लेकिन राहुल गांधी जो बातें कर रहे हैं, उनसे मोदी को फायदा होगा, नुकसान नहीं।
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अपने कार्यकर्ताओं को राहुल जी ने बताया कि मोदी ने गरीबों का पैसा हजम कर लिया है नोटबंदी के बहाने। अपने संबोधन में बहुत अच्छा फिल्मी डायलॉग बोले राहुल जी, लेकिन नोटबंदी से जिन्हें तकलीफ हुई, बैंकों के सामने घंटों खड़ा होने के बाद भी वे मोदी के लिए ऐसा नहीं कह रहे हैं। इसके बजाय ज्यादातर लोग यह मानकर नोटबंदी का स्वागत कर रहे हैं कि प्रधानमंत्री के इरादे नेक हैं और कम से कम भ्रष्टाचार रोकने की कोशिश तो कर रहे हैं। एक पत्रिका के हाल ही में किए गए एक सर्वे के मुताबिक 76 फीसदी लोग समर्थन कर रहे हैं नोटबंदी का। सो मोदी का मजाक अगर वास्तव में दुनियावाले उड़ा रहे हैं, तो इसका कोई असर भारतवासियों पर नहीं दिख रहा है।

राहुल जी ने यह भी कहा कि जिन लोकतांत्रिक संस्थानों को कांग्रेस ने 70 वर्षों से सुरक्षित रखा था, उन्हें मोदी ने दो वर्ष में ही खत्म कर दिया। यह सुनकर ऐसा लगा कि उन्हें इतिहास का अध्ययन करने की जरूरत है। आपातकाल के समय वह बच्चे थे, शायद इसलिए उन्हें याद नहीं कि उनकी प्रिय दादी जी ने कैसे हर लोकतांत्रिक संस्था को कुचल कर रखा था। संसद में केवल कांग्रेसी सांसद ही बचे थे, विपक्ष के तमाम राजनेता जेल में चक्कियां पीस रहे थे। कई वरिष्ठ पत्रकार भी उनके साथ थे।

राहुल जी ने यह भी कहा कि डर के मारे पत्रकार मोदी सरकार के खिलाफ आवाज नहीं उठा रहे हैं। तो मैं उनसे पूछना चाहूंगी कि नोटबंदी के खिलाफ फिर इतने लेख कैसे छपे अखबारों में और टीवी चर्चाओं में मोदी के इस कदम का इतना विरोध कैसे हुआ? उनकी दादी ने आपातकाल के दौरान ऐसी कड़ी सेंसरशिप लगाई थी कि अखबारों ने आपातकाल के खिलाफ एक शब्द भी नहीं बोला।

सो मैं राहुल जी को विनम्रता के साथ नसीहत देना चाहूंगी कि आप बेशक मोदी का विरोध करते रहें, यह आपका अधिकार भी है और धर्म भी, लेकिन जिस दिन से झूठ बोलना बंद कर देंगे, उसी दिन से आपको लोग गंभीरता से लेना शुरू कर देंगे। सच बोलने की कोशिश तो करके दिखाएं।

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