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विचार: भारत लिखने पर आपत्ति क्यों, इंडिया कहने पर कैसा बोध?
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भारत
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विस्तार
इसे अच्छा ही मानना चाहिए कि स्वतंत्रता के अमृत काल में भारत और इंडिया पर तीव्र बहस आरंभ हो गई है। जी-20 के नेताओं के सम्मान में राष्ट्रपति द्वारा भोज के आमंत्रण पत्र पर प्रेसिडेंट ऑफ इंडिया की जगह प्रेसिडेंट ऑफ भारत लिखने के साथ तूफान खड़ा हुआ है। यह दुखद स्थिति है कि प्रेसिडेंट ऑफ इंडिया तो हमें स्वीकार्य है, लेकिन प्रेसिडेंट ऑफ भारत नहीं। संविधान के अनुच्छेद-1 में लिखा है, इंडिया दैट इज भारत। यानी इंडिया, जो भारत है। इस तरह संविधान ने दोनों नामों को मान्यता दी है। तो इंडिया की जगह भारत लिखने पर आपत्ति क्यों?भारत लिखने पर हो रही राजनीति हतप्रभ करने वाली है। समाजवादी धारा की पुरानी मांग है कि देश का नाम इंडिया नहीं, केवल भारत होना चाहिए। डॉ. राम मनोहर लोहिया संपूर्ण जीवन इसके लिए आवाज उठाते रहे। वह अंग्रेजी और अंग्रेजियत के संपूर्ण अवशेषों को समाप्त करने के पक्ष में थे। आज सपा, राजद, जदयू आदि का स्वर क्या है? मुलायम सिंह यादव ने अपने मुख्यमंत्री काल में उत्तर प्रदेश विधानसभा में इंडिया हटाकर केवल भारत नाम रखने के पक्ष में प्रस्ताव पारित कराया था। इन पार्टियों को मुखर होकर इंडिया की जगह केवल भारत नाम रखने के पक्ष में सामने आना चाहिए था। नहीं आ रहे हैं, तो इससे पता चलता है कि वर्तमान राजनीति किस अवस्था में है।
इस देश के कई नाम थे-आर्यावर्त, जंबूद्वीप, हिंदुस्तान, भारतखंड, भारतवर्ष आदि आदि। क्या इंडिया इन्हीं सब नामों का पर्याय है? भारत नाम कब और क्यों पड़ा, इसके इतिहास में न जाएं, तो भी यह प्रश्न तो किया ही जा सकता है कि इंडिया रखे जाने के पूर्व भारत के नाम से यह भूखंड प्रचलित था या नहीं। कहा जा रहा है कि संविधान निर्माताओं ने जब दोनों नाम रख दिया, तो एक पर जोर क्यों? संविधान सभा की बहस देखें, तो अनेक सदस्यों ने 'इंडिया दैट इज भारत' पर आपत्ति उठाई थी। हरि विष्णु कामथ से लेकर सेठ गोविंद दास, कमलापति त्रिपाठी, केवी राव, श्रीराम गुप्ता, हरगोविंद पंत आदि ने भारतीय वांग्मय का उल्लेख करते हुए आग्रह किया था कि भारत नाम हमारे होने का अर्थ स्पष्ट करता है।
इंडिया नाम औपनिवेशिक मानसिकता का द्योतक है। औपनिवेशिक अवशेष खत्म करने पर भारत में आम सहमति होनी चाहिए थी। दुर्भाग्य से हमारी शिक्षा प्रणाली तथा राजनीति में तीखे मतभेद ने इस स्वाभाविक स्थिति को उत्पन्न ही नहीं होने दिया। संविधान सभा में यह बहस आने तक गांधी जी की दुखद हत्या हो चुकी थी। भारत राष्ट्र संबंधी उनके विचारों को देखें, तो साफ लगेगा कि वह इंडिया पर सहमत नहीं होते। हिंद स्वराज में पाठक के प्रश्न पर, कि भारत एक राष्ट्र था ही नहीं, गांधी जी लिखते हैं कि यह आपको अंग्रेजों ने बताया है। जब अंग्रेज नहीं थे, तब भी भारत एक राष्ट्र था और ये नहीं रहेंगे, तब भी रहेगा। यानी उन्होंने राष्ट्र का आधार संस्कृति को माना।
गांधी जी लिखते हैं कि गुलामी के लिए हम अंग्रेजों को दोष दें या अपने पढ़े-लिखे लोगों को? पढ़े-लिखे लोग तो अंग्रेजी सभ्यता के ही गुलाम हो गए हैं। स्वतंत्रता के संघर्ष में भी ऐसे पढ़े-लिखे लोगों की बड़ी संख्या थी, जो अंग्रेजों को तो भागना चाहते थे, लेकिन अंग्रेजियत यानी अंग्रेजी व्यवस्था और सोच से उन्हें समस्या नहीं थी। गांधी जी ने इसलिए कहा था कि राजनीतिक स्वतंत्रता हमें प्राप्त हो गई है, पर सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक स्वतंत्रता के लिए इससे ज्यादा कठिन संघर्ष करना पड़ेगा।
किसी देश या राष्ट्र का नाम अर्थहीन नहीं होता। यह इतिहास और सभ्यता का बोध कराने वाला होता है। लाखों वर्ष पूर्व संस्कृत ग्रंथों में भारत का उल्लेख मिलता है। इंडिया नाम से किस इतिहास और सभ्यता का बोध होता है? भारत केवल भूखंड नहीं, ऐसी सभ्यता-संस्कृति और जीवन दर्शन का नाम था, इस क्षेत्र के लोगों ने जिसे अपनी जीवन शैली के रूप में अपनाया था। यही भारत की पहचान है, जो संपूर्ण सृष्टि के कल्याण का रास्ता दिखाता है। राजनीतिक दलों को आपसी मतभेद भुलाकर औपनिवेशिक सोच वाले नाम इंडिया को खत्म कर केवल भारत रहने देना चाहिए।