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शिक्षा का राष्ट्रीयकरण क्यों नहीं

Sun, 16 Jun 2019 06:29 AM IST
mahipal महिपाल
Updated Sun, 16 Jun 2019 06:29 AM IST
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Why not nationalize education
डेमो - फोटो : डेमो
नई सरकार के आते ही नई शिक्षा नीति का मसौदा देश के सामने है। मसौदे में विभिन्न पहलुओं पर चर्चा तो की गई है, पर विजन, मिशन एवं उद्देश्यों में तारतम्य की कमी है। ऐसा लगता है कि विभिन्न एजेंसियों से जो टिप्पणियां आईं, उनको समन्वयक ने बस एक साथ रख दिया है। त्रिभाषा फॉर्मूले का विरोध दक्षिण भारत एवं पश्चिम बंगाल में हुआ है। ऐसा लगता है कि जनता एवं उनके नुमाइंदे भाषा में ही उलझ गए। जबकि इसके बजाय जमीनी स्तर पर शिक्षा व्यवस्था, खासकर इंटरमीडिएट स्तर तक, किस तरह चल रही है और शिक्षा प्रणाली में किस तरह सुधार लाया जा सकता है, जिससे कि सामाजिक एवं आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के बच्चों को उचित शिक्षा मिले, इस ओर ध्यान देना ज्यादा जरूरी है।

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नई सरकार के आते ही नई शिक्षा नीति का मसौदा देश के सामने है। मसौदे में विभिन्न पहलुओं पर चर्चा तो की गई है, पर विजन, मिशन एवं उद्देश्यों में तारतम्य की कमी है। ऐसा लगता है कि विभिन्न एजेंसियों से जो टिप्पणियां आईं, उनको समन्वयक ने बस एक साथ रख दिया है। त्रिभाषा फॉर्मूले का विरोध दक्षिण भारत एवं पश्चिम बंगाल में हुआ है। ऐसा लगता है कि जनता एवं उनके नुमाइंदे भाषा में ही उलझ गए। जबकि इसके बजाय जमीनी स्तर पर शिक्षा व्यवस्था, खासकर इंटरमीडिएट स्तर तक, किस तरह चल रही है और शिक्षा प्रणाली में किस तरह सुधार लाया जा सकता है, जिससे कि सामाजिक एवं आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के बच्चों को उचित शिक्षा मिले, इस ओर ध्यान देना ज्यादा जरूरी है।

ज्योतिबा फुले का कहना था कि शिक्षा ऐसी होनी चाहिए, जो मस्तिक को सशक्त कर, नैतिक मूल्यों को खत्म किए बिना उसे उसके परंपरागत धंधों से बाहर निकलकर पैसा कमाने योग्य बनाए। शिक्षा ऐसी हो, जो जाति व्यवस्था पर प्रहार कर उसमें फंसी विभिन्न जातियों के लोगों को गतिशील करे। इसमें दोराय नहीं कि संविधान के अनुच्छेद 45 के अनुसार, शिक्षा को संविधान का अंग और 2009 में संविधान में सशोधन कर शिक्षा को मौलिक अधिकार का दर्जा दिया गया। देश में साक्षरता बढ़ी है। लेकिन महिलाओं की साक्षरता दर पुरुषों से कम है। 

सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे बच्चों को उचित शिक्षा नहीं मिल रही। इस तरह के स्कूलों में न पर्याप्त अध्यापक हैं, न जरूरी संरचनात्मक सुविधाएं। इस तरह की व्यवस्था को अति शुद्र वाली शिक्षा व्यवस्था कहेंगे। सरकारी मॉडल स्कूलों में पढ़ रहे बच्चों को सामान्य सरकारी स्कूल से ज्यादा सुविधाएं हैं और वहां अध्यापक भी अधिक हैं। इस तरह की शिक्षा व्यवस्था को शुद्रवादी शिक्षा व्यवस्था कहेंगे। नगर पंचायतों या बड़े गांवों के पब्लिक स्कूलों में ढांचागत सुविधाएं भी हैं और अध्यापक भी होते हैं। 

इस शिक्षा व्यवस्था को वैश्य वाली शिक्षा व्यवस्था कहेंगे। शहरों के पब्लिक स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को सुविधाएं मिलती हैं और वहां अंग्रेजी भाषा का बोलबाला होता है। इस तरह की शिक्षा को क्षत्रियवादी शिक्षा व्यवस्था कहेंगे। बड़े-बड़े नगरों के पब्लिक स्कूलों में वे तमाम सुविधाएं होती है, जो शिक्षा के लिए जरूरी हैं। इस व्यवस्था को ब्राह्मणवादी शिक्षा कहेंगे।

यह शिक्षा व्यवस्था न तो समान अवसर प्रदान करती है, न सभी को बराबर की हिस्सेदारी देती है। गांव के अतिशुद्ध और शुद्र समाज (जो या तो किसान/कारीगर व मजदूर हैं) के बच्चे अच्छी शिक्षा नहीं ले पाते। वैश्वीकरण के इस दौर में जिसे अच्छी शिक्षा मिलेगी, वह आगे बढ़ेगा और जिसे अच्छी शिक्षा नहीं मिलेगी, वह या तो चौकीदार बनेगा या चाट-पकौड़े बेचेगा।

इस असमान शिक्षा व्यवस्था को दूर करने के लिए कुछ सुझाव दिए जा सकते हैं। पहला यह कि वर्तमान में हिंदी को लेकर कुछ राज्यों में परेशानी है। ऐसे में, त्रिभाषा फॉर्मूले  की जगह द्विभाषा फॉर्मूला हो, पर हिंदी व अन्य भाषाएं वैकल्पिक रूप से हों, जिन्हें बच्चा खेल-खेल में सीखे। इससे वर्तमान में अंग्रेजी भाषा की जगह, जो विभिन्न राज्यों में संवाद की भाषा है, अन्य भाषाएं हो सकेंगी।

दूसरा सुझाव यह कि सभी जगह एक तरह की वर्दी व एक तरह की प्रार्थना होनी चाहिए। इससे बच्चों में देश की एकता एवं अखंडता के बारे में प्रवति बढ़ेगी। तीसरा सुझाव यह कि स्कूलों में एक ही तरह का पाठयक्रम होना चाहिए, क्योंकि अलग-अलग पाठ्यक्रम होने पर सभी बच्चों को एक तरह की शिक्षा नहीं दी जा सकती। इसी तरह अध्यापकों के लिए भी एक तरह का प्रशिक्षण पाठ्यक्रम होना चाहिए। चौथा, गांव एवं नगरों में पंचायतों एवं नगरपालिकाओं की जिम्मेदारी होनी चाहिए कि वे छह से 14 वर्ष के बच्चों को स्कूलों में भर्ती कराएं। 

पांचवें, चिकित्सा शिक्षा की तरह सामान्य शिक्षा भी व्यावहारिकता पर आधारित होनी चाहिए। प्रसिद्ध अमेरिकी शिक्षार्थी बुकर टी वाशिगंटन ने शिक्षा की व्यावहारिकता को अमल में लाने की जरूरत पर बल दिया था। उन्होंने 'ट्रिपल एच' अर्थात हैंड, हेड, एवं हार्ट का उदाहरण देकर बताया था कि बच्चों की शिक्षा ऐसी होनी चाहिए कि वह बच्चों के हाथों, दिमाग एवं हृदय, तीनों का विकास करे। जो बच्चों गरीब परिवारों से हैं, उनके लिए सुविधा होनी चाहिए कि वे पढ़ते समय कुछ कमाई करें, जिससे उनकी फीस एवं पढ़ाई के अन्य खर्च भी पुरे होते रहें। 

वाशिंगटन द्वारा चलाए गए स्कूलों में बच्चों से विभिन्न शारीरिक कार्य कराए गए। इस तरह का उदाहरण एक प्रयोग के रूप में अपनाया जा सकता है, जिसे बाद में बृहद स्तर पर लागू किया जा सकता है। और छठा सुझाव यह कि अध्यापक एवं अभिभावकों का संबंध स्थापित करने वाली पीटीएम (पैरेंट-टीचर मीटिंग) व्यवस्था को भी प्रभावी बनाने की जरूरत है। अध्ययन बताते हैं कि जहां पर पीटीएम प्रभावी रही है, वहां पर छात्रों का विकास अधिक हुआ है।

शिक्षा व्यवस्था को प्रभावी बनाने के लिए शिक्षा व्यवस्था क्षमता के विकास पर ध्यान देना जरूरी है। इस संदर्भ में चौदह राज्यों के ’ब्लॉक रिसोर्स सेंटर’, एवं ’कलस्टर्स रिसोर्स सेंटर’ का अध्ययन बताता है कि इन राज्यों में अध्यापकों के पास जरूरत से ज्यादा काम है, उचित शिक्षा संरचना की कमी है, समन्वयक उचित तरह से प्रशिक्षित नहीं है, यातायात के साधनों की कमी है, अध्ययन में नवाचार की कमी है। अतः अध्यापकों की कमी को भी ध्यान में रखना जरूरी है।

वर्तमान शिक्षा प्रणाली को ध्यान में रखते हुए एवं उसमें विभिन्न सुधार लाने के लिए शिक्षा का राष्ट्रीयकरण करना एक वैकल्पिक नीतिगत सुझाव प्रतीत होता है।      
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