सोच क्यों नहीं बदलती

सुभाषिणी अली Updated Thu, 24 Oct 2013 06:36 PM IST
विज्ञापन
Why not change thinking

पढ़ें अमर उजाला ई-पेपर
कहीं भी, कभी भी।

*Yearly subscription for just ₹249 + Free Coupon worth ₹200

ख़बर सुनें
बीते दस दिनों में कुछ ऐसी घटनाएं घटी हैं, जिन्होंने देश भर में महिलाओं पर होने वाली हिंसा पर व्यक्त तमाम चिंताओं पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है। ये घटनाएं हमारे समाज की क्रूर सच्चाइयों को भी उजागर करती हैं। यह माना जाता है कि आधुनिकता के साथ दकियानूसी सामंती विचारधाराएं कमजोर पड़ेंगी, लेकिन जब तक समाज में असमानता और शोषण रहेगा, तब तक पुरुष प्रधानता नए रूप धारण करती रहेगी।
विज्ञापन

इसी महीने दिल्ली के अासपास के इलाकों में घटी कुछ घटनाएं इस प्रकार की रही हैं। अक्तूबर के पहले सप्ताह में हरियाणा के रोहतक जिले में धर्मेंदर और निधि ने भागकर शादी कर ली। दोनों एक ही जाति के थे, बालिग थे, पढ़े-लिखे थे, लेकिन उनको इसलिए भागना पड़ा कि वे नहीं भागते, तो मार दिए जाते, क्योंकि दोनों एक ही गांव और एक ही गोत्र के थे और अपनी मर्जी से शादी कर रहे थे। लेकिन भागकर भी वे अपने आपको नहीं बचा पाए। निधि को उसके परिवार के लोगों ने चाकू से गोदकर मार डाला। उसी के घर के पास धर्मेंदर का शव मिला। गांव की बेटी और गांव का बेटा, दोनों की बलि गांव की इज्जत की खातिर चढ़ा दी गई। सब चुप थे, गांव वाले भी, परिवार वाले भी, सरकार में बैठे हुए लोग भी, दिल्ली के नेता भी। निधि और धर्मेंदर का गांव हरियाणा के मुख्यमंत्री के बेटे दीपेंदर सिंह हुड्डा के विधानसभा क्षेत्र में पड़ता है। वह भी चुप ही रहे।
इस इलाके में, और इससे लगे राजस्थान, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के इलाकों में अपनी ही जाति में अपनी मर्जी से शादी करने पर मृत्युदंड दे दिया जाता है। हजारों की तादाद में पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, बिहार, झारखंड और केरल तक से लाई गई लड़कियों का 'ब्याह' स्थानीय लड़कों से हो चुका है। प्रक्रिया जारी है। ये ब्याह कितने वैधानिक हैं, यह किसी को भी नहीं पता, क्योंकि इनमें से कई लड़कियों का ब्याह एक ही परिवार के कई भाइयों से कर दिया जाता है। इन लड़कियों का ब्याह एक के बाद दूसरे से भी कर दिया जाता है, और दू्ल्हे की उम्र सत्तर भी हो सकती है। इन लड़कियों की जाति क्या है, इसका किसी को पता नहीं। इस विचित्र ब्याह पद्धति का संबंध प्रगतिशील जाति-तोड़क मानसिकता से नहीं, बल्कि घोर पुरुष प्रधानता के परिणाम से है। इस इलाके में लड़कियों की जबर्दस्त कमी है। कन्या भ्रूणहत्या तो यहां की परंपरा ही बन गई है।
धर्मेंदर और निधि की हत्या के कुछ ही दिन बाद दो स्थानीय खाप पंचायतों की बैठकें हुईं। बैठक में भाग लेने वाले चिंतित थे, क्योंकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की संख्या बढ़ने के संकेत मिल रहे थे। पंचायतों में तय किया गया कि एक तरफ मर्दों की टुकड़ियां तैयार की जाएंगी, जो स्कूल और कॉलेज जाने वाली लड़कियों पर नजर रखेंगी, दूसरी तरफ खाप पंचायतों के सदस्य स्कूलों में जाकर लड़कियों को अपने ही हित में नियम न तोड़ने की चेतावनी देंगे। वे स्कूल प्रशासन से यह अनुरोध भी करेंगे कि लड़कों और लड़कियों के लिए अलग बसों का इंतजाम करें। उन्होंने ये फरमान भी जारी किए कि लड़कियां केवल सलवार-कुर्ता पहनेंगी और मोबाइल फोन नहीं रखेंगी।

मीना हरियाणा के एक गांव से गुड़गांव आती है काम करने। वह कहती है कि बहुत सहमकर चलना पड़ता है। कमला अपनी गाड़ी खुद चलाकर कॉलेज में पढ़ाने जाती है। जब तक वह कॉलेज नहीं पहुंच जाती, तब तक अपने मुंह पर दुपट्टा ओढ़े रहती है। रोहतक के कॉलेज में पढ़ने वाली लड़कियां बताती हैं कि पता नहीं, उनकी कितनी सहेलियां गायब हो चुकी हैं। स्कूल से निकालकर उनकी शादियां कर दी गई हैं। जब किसी मां-बाप को पता चलता है कि उनकी लड़की थोड़ा-सा घूम-फिर रही है, तो वे उसे घर ले जाते हैं। या तो उसकी शादी कर देते हैं या फिर उसे मार डालते हैं।

खाप पंचायतें गैरकानूनी हैं, लेकिन 18 अक्तूबर को दिल्ली के द्वारिका स्थित बलात्कार के मामले के शीघ्र निपटारे के लिए स्थापित फास्ट ट्रैक अदालत के न्यायाधीश न्यायमूर्ति वीरेंद्र भट्ट ने एक मामले में अपना फैसला सुनाते हुए कहा, विवाह से पहले लड़कियों का किसी से लैंगिक संबंध स्थापित करना नैतिकता और सामाजिक नियंत्रण की अवहेलना है। यदि वे ऐसा करती हैं, तो फिर उनकी शामत आएगी और बाद में उनको रोकर नहीं कहना चाहिए कि उनके साथ बलात्कार हुआ है। यह कहकर उन्होंने बलात्कार के आरोपी को बरी कर दिया। चुनाव के मौसम में पुरुष प्रधानता और उसकी गिरफ्त में कैद जातियों के वोट से लोहा कौन ले सकता है? इस चुप्पी को कुछ दिलेरों ने तोड़ने की दिलेरी दिखाई है। धर्मेंदर और निधि की हत्या का विरोध और हत्यारों की गिरफ्तारी की मांग माकपा की हरियाणा इकाई ने उठाई, खाप पंचायतों की तानाशाही को जनवादी महिला समिति ने चुनौती दी, और न्यायमू्र्ति भट्ट की टिप्पणियों की निंदा सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व प्रधान न्यायाधीश खरे साहब ने की।

ऐसे माहौल में यह आश्चर्यजनक नहीं कि गुजरात पुलिस अपनी हिरासत में कैद आसाराम बापू को 18 अक्तूबर की शाम अपने कार्यालय की दूसरी मंजिल पर ले गई और एक खिड़की के सामने बिठा दिया, ताकि उनके अनुयायी उनके दर्शन कर सकें। पुलिस ने उनके अनुयायियों को सड़क पर अवरोध पैदा कर, लाउडस्पीकर लगाकर आसाराम बापू की शान में भजन गाने की अनुमति भी दी। नौ दिन पहले इसी गुजरात की इसी पुलिस ने उन दो छात्रों के पिताओं को गिरफ्तार किया था, जो आसाराम बापू के गुरुकुल के छात्र थे और जिनकी लाशें उनके आश्रम के पास 2008 में मिली थीं।

वाह रे पुरुष प्रधानता! आधुनिक भारत की असमानता पर टिकी आधुनिकता से तुम्हें कोई खतरा नहीं है।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Spotlight

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
Election
  • Downloads

Follow Us