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जाति की दीवार टूटती क्यों नहीं

Mon, 08 Jun 2015 08:12 PM IST
सुभाष गाताडे
सुभाष गाताडे Updated Mon, 08 Jun 2015 08:12 PM IST
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Why not break wall of caste

सामाजिक तौर पर वंचितों के लिए आरक्षण के जरिये विशेष अवसर उपलब्ध कराने को लेकर अक्सर यह भ्रम फैलाया जाता है कि उससे अर्थव्यवस्था पर बोझ बढ़ेगा, गैरकाबिल लोग पदों पर बैठ जाएंगे, कार्यक्षमता एवं उत्पादकता पर असर पड़ेगा, आदि-आदि। विडंबना यह है कि उदारमना तबके का एक हिस्सा भी निहित स्वार्थी तत्वों द्वारा फैलाए जा रहे इस भ्रम में फंस जाता है।

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दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स और मिशिगन यूनिवर्सिटी के संयुक्त अध्ययन के निष्कर्ष वर्ल्ड डेवलपमेंट जर्नल में प्रकाशित हुए हैं, जो प्रमाणित करते हैं कि ऐसे सकारात्मक कार्यक्रम कई क्षेत्रों में उत्पादकता बढ़ाते हैं। उक्त अध्ययन में सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों में उत्पादकता एवं कार्य क्षमता के पहलू पर अनुसूचित जाति और जनजातियों को प्रदत्त आरक्षण के प्रभाव का अध्ययन किया गया। अध्ययन के केंद्र में सार्वजनिक क्षेत्र की सबसे बड़ी नियोक्ता भारतीय रेल थी। मालूम हो कि भारतीय रेल लगभग 13 से 14 लाख लोगों को चार स्तरों पर रोजगार प्रदान करती है-ग्रुप ए से ग्रुप डी तक, जिसमें ग्रुप ए में सबसे वरिष्ठ कर्मचारी शुमार होते हैं।
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अध्ययन का फोकस ग्रुप ए तथा ग्रुप बी पर ही था, क्योंकि यह स्पष्ट था कि बिना आरक्षण के इन पदों पर अनुसूचित तबकों के प्रत्याशियों का पहुंचना लगभग असंभव था। अध्ययन में उत्पादकता एवं कार्य क्षमता पर आरक्षण का कोई भी नकारात्मक प्रभाव दिखाई नहीं दिया, जबकि कुछ क्षेत्रों में कई सकारात्मक प्रभाव दिखे। अध्ययनकर्ताओं ने पाया कि हाशिये पर पड़े समुदायों से जुड़े लोग जब निर्णय प्रक्रिया के स्थानों और प्रबंधकीय ओहदों पर पहुंचते हैं, तो वे बेहतर करने की कोशिश करते हैं, क्योंकि उन्हें मालूम होता है कि उनके बारे में शेष समाज में पर्याप्त योग्य न होने की धारणा बलवती है, जिसे वे किसी भी कीमत पर झुठलाना चाहते हैं।
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स्पष्ट है कि वंचित-उत्पीड़ित तबकों को शिक्षा एवं रोजगार में विशेष अवसर प्रदान करने की नीति को लेकर अब और अधिक भ्रम फैलाया नहीं जा सकता। ऐसे भ्रमों से मुक्ति इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि पिछले कुछ वर्षों से, जब से निजी क्षेत्र में आरक्षण की मांग उठने लगी है, अक्सर यही बात दोहराई जाती रही है कि इससे कार्य क्षमता पर प्रतिकूल असर पड़ता है, और प्रतिभा को नुकसान पहुंचता है।


आज श्रम और रोजगार नीति के मामले में दलितों-आदिवासियों के साथ भेदभाव एक कड़वी सच्चाई है और सरकारी रोजगार में आरक्षण मिलने के बावजूद स्थितियों में गुणात्मक बदलाव नहीं हुए हैं। जहां तक प्रोफेशनल रोजगार की बात है, तो वहां उनका प्रतिनिधित्व नाममात्र का है। विगत लगभग ढाई दशक से सार्वजनिक क्षेत्र में विनिवेश, निजीकरण आदि की जिन योजनाओं को बढ़ावा दिया जा रहा है, उसके चलते तमाम दलित कर्मचारी बेरोजगार हो चुके हैं। यहीं नहीं, दलितों का बड़ा हिस्सा आज भी जाति आधारित शारीरिक श्रम से जुड़े पेशों या सरकारी नौकरियों की निचली पायदानों पर सिमटा है। वर्ष 2004-2005 में अनुसूचित जाति/जनजातियों का 95 फीसदी हिस्सा असंगठित क्षेत्रों में कार्यरत था, जहां तनख्वाह बेहद कम है और सामाजिक सुरक्षा भी नहीं है। यह दुखद है कि उस स्थिति में बुनियादी बदलाव अब तक नहीं हुआ है।

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