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पाठकों तक क्यों नहीं पहुंचती किताबें

Wed, 10 Jan 2018 07:36 PM IST
उमेश चतुर्वेदी
उमेश चतुर्वेदी Updated Wed, 10 Jan 2018 07:36 PM IST
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Why not Books reach to readers
उमेश चतुर्वेदी

उन्नीसवीं सदी के एक्टिविस्ट विचारक और राजनेता होरेस मैन ने अमेरिकी समाज में सार्वजनिक शिक्षण व्यवस्था को स्थापित करने की जद्दोजहद के बीच किताबों की अहमियत को स्थापित करने की दिशा में कहा था, ‘किताबों के बगैर घर, खिड़कियों के बिना कमरे के समान है।’ दिल्ली में जारी पुस्तक मेले के बीच उनके इस कथन की याद आना स्वाभाविक है।


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पुस्तक मेला साल-दर-साल लगातार अपनी सशक्त मौजूदगी दिखा रहा है। 26 साल से जारी दिल्ली विश्व पुस्तक मेले के अलावा कोलकाता और पटना के पुस्तक मेले भी अपनी तरह से उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। लेकिन हिंदी के कथित मुख्यधारा के प्रकाशन में इन मेलों की वजह से कोई सार्थक बदलाव नजर नहीं आ रहा है। पुस्तकें निश्चित तौर पर मानव मन की खिड़कियों को खोलती हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या हिंदी के प्रकाशक हकीकत में मानव मनों के करीब पहुंचने की कोशिश कर रहे है? निश्चित तौर पर इसका जवाब न में ही है। पुस्तक मेले का मकसद पुस्तकों की पहुंच उस आम आदमी तक सुनिश्चित करना था, जिन तक किताबों की पहुंच नहीं बन पाई है। लेकिन हकीकत यह है कि अब भी प्रकाशकों का फोकस पाठकों पर कम, पुस्तकालयों के लिए खरीद पर ज्यादा है। अस्सी के दशक में शुरू हुई यह प्रवृत्ति हिंदी प्रकाशकों के बीच साल-दर-साल पुस्तक मेले में देखी जा सकती है। जब हिंदी के अखबार रोजाना दस लाख के प्रसार को पार कर गए हों, ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक, देश के दस सबसे ज्यादा प्रसार वाले अखबारों में हर साल पांच-छह अखबार हिंदी के ही रहते हों, प्राथमिक और द्वितीय भाषा के तौर पर जिस हिंदी को बोलने-पढ़ने वाले लोगों की संख्या करीब 80 करोड़ हो, उस हिंदी के पारंपरिक प्रकाशक हिंदी की किताबों को कुछ सौ छापते हों, तो निश्चित तौर पर सवाल प्रकाशकों पर ही उठेंगे।

अस्सी के दशक के पहले तक हिंदी प्रकाशन कर्म का उद्देश्य पाठकों तक किताब को पहुंचाना रहता था। लेकिन अब प्रकाशकों का उद्देश्य पुस्तकालयों और सरकारी खरीद में किताबों को खपाना रह गया है। सांसद निधि के तहत किताबों की खरीद का नियम किताबों के प्रसार की दिशा में अच्छा कदम है। अब प्रकाशक सांसदों के आगे-पीछे घूमने लगे हैं। जिस तरह विगत में अफसरों और उनकी पत्नियां सरकारी खरीद की ताकत के दम पर बड़े लेखक-लेखिकाएं बन गए, उसी तरह आने वाले दिनों में अगर सांसद निधि के दम पर तमाम नेता भी लेखक बनते दिखने लगें, तो हैरत नहीं होनी चाहिए। सरकारी खरीद पर केंद्रित प्रकाशन व्यवस्था ने ऐसे लेखकों की पौध भी तैयार कर दी, जिन्हें पाठक पढ़ना तो दूर, देखना तक पसंद न करें। जिस हिंदी में प्रकाशन के जनपदीय केंद्र रहे हों, पाठकों तक पुस्तक पहुंचाने के लिए बिहार के लहेरिया सराय से लेकर छत्तीसगढ़ के रायपुर और मध्य प्रदेश के खंडवा तक में प्रकाशन संस्थाएं काम करती रही हों, उस हिंदी के प्रकाशन तंत्र की मौजूदा स्थिति शोचनीय ही कही जाएगी। हालांकि बाजार की वजह से बदलाव आने लगा है। इस बार पुस्तक मेले के अतिथि यूरोपीय संघ के भारत में राजदूत टॉमस कोजलॉस्की ने भी माना कि भारतीय पाठकों का विशाल बाजार यूरोपीय संघ के देशों के प्रकाशकों की निगाह में है। जिस तरह बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने भारतीय बाजार को बदल दिया है, उसी तरह आने वाले दिनों में बहुराष्ट्रीय प्रकाशक भी भारतीय प्रकाशन क्षेत्र और पाठकों को बदलकर रख देंगे। इसकी शुरुआत हो चुकी है।

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