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विपक्ष पर क्यों भारी मोदी

नीरजा चौधरी Updated Wed, 12 Sep 2018 07:37 PM IST
आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के साथ मोदी
आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के साथ मोदी
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इसकी दो वजहें हैं कि क्यों नरेंद्र मोदी लगातार विपक्ष पर भारी पड़ते हैं, हालांकि विपक्ष के पास भाजपा को घेरने के लिए तरकश में कई तीर (मुद्दे) हैं, जिनकी भाजपा को चिंता करनी चाहिए। और वे मुद्दे सर्वविदित हैं-दलितों का आक्रोश बढ़ रहा है, न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि के बावजूद किसानों के संकट का समाधान नहीं हुआ है, नोटबंदी के कारण अनौपचारिक क्षेत्र में रोजगार का नुकसान हुआ है, बिना तैयारी के जीएसटी लागू करने से व्यापारी परेशान हैं, राफेल सौदा, जिसने कई लोगों के मन में सवाल खड़े कर दिए हैं। इसके अलावा आजादी का क्षरण और संस्थानों की स्वायत्तता का उन्मूलन का भी बड़ा मुद्दा है। पर सबसे अधिक कीमतों में वृद्धि आम लोगों को परेशान कर रही है। पेट्रोल, डीजल के अंतरराष्ट्रीय मूल्य में वृद्धि को देखते हुए यह सरकार के लिए परेशानी की वजह बन सकती है। इसके अलावा रुपये की कीमत लगातार घट रही है।
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फिर भी मोदी का आकर्षण कायम है और अमित शाह घोषणा करते हैं कि भाजपा अगले पचास वर्षों तक सत्ता में रहेगी। इसे कुछ लोग 'अहंकार' कहेंगे, लेकिन इसे वह 'आत्मविश्वास' कह सकते हैं। इससे कोई मतलब नहीं कि कांग्रेस के 'चंगू-मंगू' क्या कहते हैं। इसकी वजहें हैं, मोदी थकते नहीं हैं, और वक्तृत्व कला में माहिर हैं। दो दिन पहले उन्होंने आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के साथ सीधा संवाद किया था। प्रौद्योगिकी की सहायता से ज्यादातर राज्यों की आशा एवं एएनएम कार्यकर्ता ने उनसे सीधे बात की और मोदी ने उनमें से किसी को भी रोके बिना उनकी चुनौतियों के बारे में उनकी बातें सुनीं। मोदी ने उन्हें देश का गर्व बताया, क्योंकि वे लाखों माताओं एवं बच्चों का जीवन बचाती हैं, इसके लिए उन्होंने उनसे कहा कि मैं आपको नमन करता हूं। और इस प्रक्रिया में उन्होंने उनकी मदद का भरोसा दिया। हर समूह के लिए उनके पास कहने को अलग-अलग बातें थीं। एक बड़ी अवधारणा बनाने के लिए उन्होंने सबसे जुड़ाव बनाया और उनकी कहानियां सुनीं। जिस समय नंदुरबार समूह स्क्रीन पर आया, उन्होंने पूछा, क्या अब भी चौधरी वहां रहते हैं, जहां वह आते थे और चाय पीते थे। उन्होंने समवेत स्वर में उत्साही होकर हां में जवाब दिया। उन्होंने उन सभी कार्यकर्ताओं से बात की, जिन्होंने अपना पहला नाम बताया। यह एक ऐसा अनुभव था, जिन्हें वे कभी भुला नहीं पाएंगी।

 उन्होंने कहा कि वे भारत के बचपन को मजबूत बनाती हंै, जो कुपोषण मुक्त भारत के लिए बहुत जरूरी है, उसके बिना देश का कोई भविष्य नहीं है। उनकी पंचलाइन सबसे अंत में सामने आई, कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं, सहायक और आशाओं का मानदेय एक अक्तूबर, 2018 से बढ़ जाएगा। उन्होंने कहा कि यह पैसा केंद्र सरकार के खजाने से आएगा, जो उनके 'राष्ट्र निर्माण के कार्य' को मान्यता प्रदान करता है।
 
नरेंद्र मोदी का संदेश सही दिशा में था। दशकों से फील्ड में काम कर रहे विकास पेशेवर कहते हैं कि उन्होंने मुद्दों की पूरी समझ प्रदर्शित की और जमीनी स्तर पर काम करने वाली कार्यकर्ताओं से आसानी से संवाद किया, जबकि इस चुनौती को भी सामने रखा कि अगर देश के भविष्य को बचाना है, तो इस दिशा में भी काम करना होगा। लेकिन क्रियान्वयन में गड़बड़ी का राजनीतिक नुकसान भी हो सकता है। एक ही बार में वह देश के 34 लाख जमीनी कार्यकर्ताओं तक पहुंच गए। उन लोगों के साथ उनकी बातचीत की प्रकृति को देखते हुए कहा जा सकता है कि इसका सकारात्मक प्रभाव जरूर पड़ेगा। पहले ही कई ने अपनी खुशी जाहिर की कि उन्हें प्रधानमंत्री से सीधे बातचीत करने का मौका मिला और उन्होंने उनकी बातें ध्यान से सुनीं।
 
मान लीजिए कि हरेक कार्यकर्ता औसतन 250 परिवारों को प्रभावित करता है, दूसरे शब्दों में कहें, तो एक हजार लोगों को प्रभावित करता है। तो इस एक कदम के साथ मोदी ने 34 करोड़ लोगों तक पहुंच बनाई। उन्होंने ग्रामीण महिलाओं को अपना वोट बैंक बनाने की दिशा में भी छलांग लगाई है। मोदी ने जो किया, वैसा करने पर 2013 में विचार हो रहा था, जब यूपीए सत्ता में था, लेकिन उस समय यूपीए नेतृत्व की प्राथमिकता अलग थी। इसमें दस करोड़ परिवारों को और जोड़ लीजिए, जिन तक 25 सितंबर को आयुष्मान भारत योजना की शुरुआत करते हुए मोदी पहुंचेंगे, जिसमें दस करोड़ परिवारों को पांच लाख रुपये अस्पताल खर्च देने का प्रस्ताव होगा।
 
सिर्फ इन दो पहलों के जरिये मोदी 84 करोड़ लोगों तक पहुंच रहे हैं और अगर आप इनमें से बच्चों को छांट दें, तो करीब 70 करोड़ मतदाताओं को प्रभावित करने की संभावना है।
 
लेकिन इतना ही नहीं है, दो अक्तूबर को प्रधानमंत्री ने अपनी सरकार द्वारा स्वच्छ भारत और खुले में शौच से मुक्ति के लिए उठाए गए कदमों को दर्शाने के लिए दिल्ली में स्वच्छता सम्मेलन का आह्वान किया है। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव और संयुक्त राष्ट्र की अन्य एजेंसियों के प्रमुखों सहित 70 देशों के मंत्रियों के इसमें भाग लेने की संभावना है। गांधी जी ने स्वच्छता के बारे में क्या किया, यह दिखाने के लिए उन्हें साबरमती आश्रम ले जाने की भी उम्मीद है। साफ है कि नरेंद्र मोदी अपनी उपलब्धियों को दुनिया को दिखाने की कोशिश करेंगे, और विश्व समुदाय के जरिये वह घरेलू मतदाताओं को बताएंगे कि वह काम करने वाले हैं और अपने काम को समझते हैं।
 
ऐसा लगता है कि यह विचार कई लोगों की इस अंतर्निहित भावना का इस्तेमाल करना है कि उनकी नीयत साफ है और भले ही उन्होंने गलतियां की है, लेकिन उन्हें एक और मौका दिया जाना चाहिए। नरेंद्र मोदी बार-बार अपना विचार नहीं बदलते हैं। वह बड़ी तस्वीर को ध्यान में रखते हुए अपनी बात रखते हैं।
 
जाहिर है, आज वह लाभ की स्थिति में है, क्योंकि वह यह कहने में सक्षम हैं कि यह किया जाना है और सभी मंत्रालय आदेश की प्रतीक्षा में खड़े हैं और अपना सर्वश्रेष्ठ कदम आगे बढ़ाते हैं। इसलिए उन्होंने जो चुनौती पेश की है, उसे देखते हुए शायद ही ममता बनर्जी बढ़ती महंगाई के खिलाफ राष्ट्रीय विरोध से खुद को दूर रख सकें। या वाम दल या आप उसी दिन एक ही मुद्दे पर कांग्रेस द्वारा आयोजित कार्यक्रम से अगल कार्यक्रम करे। क्या यह विपक्ष के लिए चेतावनी की एक और घंटी है?

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नैतिकता के दायरे में

यह एक अलग तरह का # मी टू है, जहां कर्मचारियों का व्यवहार जांच के दायरे में आ रहा है। इसे कॉरपोरेट बोर्डरूम में नैतिकता की वापसी कहा जा सकता है। फ्लिपकार्ट के बिन्नी बंसल मामले से यह बात उभरी है कि लोगों को अपने व्यवहार के प्रति सचेत होना चाहिए।

16 नवंबर 2018

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