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पलायन क्यों नहीं बनता मुद्दा
महेंद्र बाबू कुरुवा
Updated Mon, 13 Feb 2017 08:41 PM IST
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महेंद्र बाबू कुरुवा
- फोटो : AU
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बीती 30 जनवरी को एक अग्रणी अखबार में उत्तराखंड में पलायन की वजह से युवा मतदाताओं की संख्या में आई गिरावट से संबंधित एक रिपोर्ट प्रकाशित की गई थी। विधानसभा चुनाव उत्तराखंड के मतदाताओं के लिए एक अवसर लेकर आए हैं, जिससे कि वे सम्मानजनक तरीके से जीने और बुनियादी चीजों को लेकर अपना अधिकार जता सकें, जिनकी सरकारें अनदेखी करती आई हैं और जिनकी वजह से उन्हें पलायन करने को मजबूर होना पड़ता है।
उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है और आम धारणा यह है कि वहां असीम शांति है, मगर हिमालय की गोद में बसे इस राज्य की हकीकत कुछ और है। सिक्के का दूसरा पहलू भयावह है, जहां निर्जन मकान, उजड़े खेत और पनबिजली परियोजना के कारण पानी में आधे डूबे गांव नजर आते हैं। जून, 2013 की भयावह त्रासदी के गवाह रहे लोगों के लिए उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्र में जिंदगी की यह हकीकत अजूबा नहीं है। इस हादसे ने हजारों उत्तराखंडवासियों का जीवन बदल दिया। इस हादसे के कारण पलायन में तेजी अाई।
उत्तराखंड में पलायन कोई नई अवधारणा नहीं है। पहाड़ी इलाकों से मैदानी इलाकों में पलायन बहुत आम है। अलग उत्तराखंड राज्य के निर्माण के पीछे यह एक बड़ी वजह रही है। उत्तराखंड के लोग ऐसा राज्य चाहते थे, जो उनकी जरूरतों का ख्याल रख सके और उन्हें बेहतर जिंदगी की तलाश में दूसरे राज्यों में पलायन करने को मजबूर न होना पड़े। अलग राज्य बनने के 17 वर्षों बाद उत्तराखंड को यही हासिल हुआ है कि यहां पलायन का तौर-तरीका बदल गया है। उत्तराखंड के लोग अब पहाड़ी ग्रामीण इलाकों से दूसरे राज्यों के बजाय राज्य के भीतर ही शहरी इलाकों में पलायन कर रहे हैं।
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यह रुझान राज्य के विरोधाभास को ही रेखांकित कर रहा है। यह विरोधाभास दो एकदम विपरीत तरह के रुझानों से उभरा है। पहला रुझान तो यह है कि उत्तराखंड में जो विकास हो रहा है, वह मैदानी क्षेत्र में हो रहा है और वहीं रोजगार और जीवन यापन के अवसर बन रहे हैं, जैसा कि पहले नहीं था। देहरादून, हल्द्वानी और ऋषिकेश जैसे शहर अंदरूनी पहाड़ी क्षेत्र से पलायन करने वालों को आकर्षित कर रहे हैं। मगर यह रुझान उत्तराखंड के अस्तित्व पर ही सवाल खड़ा करता है, क्योंकि इस राज्य का गठन पहाड़ को ध्यान में रखकर किया गया था। सरकारी मशीनरी इस तथ्य को समझने में नाकाम रही है, लिहाजा पहाड़ी क्षेत्रों में विकास नजर नहीं आता। 2011 की जनगणना के मुताबिक उत्तराखंड के कुल 16,793 गांवों में से 1,053 गांवों में कोई नहीं रहता, जबकि 405 गांवों की आबादी दस फीसदी रह गई है। 2013 के हादसे के बाद स्थिति और भयावह हुई है।
देहरादून में बैठे लोग इसका साधारण-सा समाधान सुझाते हैं। उनके मुताबिक पर्याप्त संख्या में स्कूल और अस्पताल उपलब्ध कराने से पलायन रुकेगा। जबकि नीति नियंताओं को समझना होगा कि स्कूल और कॉलेज सिर्फ कंकरीट के भवन नहीं हैं। ये संस्थाएं हैं, जिनके लिए प्रतिबद्ध लोगों की जरूरत होती है। वहां काम करने के लिए लोग तभी जाएंगे, जब उन्हें उन स्थानों पर दूसरी सुविधाएं भी मिलेंगी। यानी वहां आधारभूत संरचनाओं के साथ ही सामाजिक ढांचे की भी जरूरत है। शिक्षा और स्वास्थ्य के अलावा रोजगार पलायन का एक बड़ा कारण है। प्राकृतिक आपदा, वन्यजीवों के हमले और श्रम बाजार की बदतर हालत के कारण यहां खेती करना बहुत चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है। यह देखना बाकी है कि क्या इस चुनाव में भी उत्तराखंड के लोगों के साथ छलावा तो नहीं होगा।
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उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है और आम धारणा यह है कि वहां असीम शांति है, मगर हिमालय की गोद में बसे इस राज्य की हकीकत कुछ और है। सिक्के का दूसरा पहलू भयावह है, जहां निर्जन मकान, उजड़े खेत और पनबिजली परियोजना के कारण पानी में आधे डूबे गांव नजर आते हैं। जून, 2013 की भयावह त्रासदी के गवाह रहे लोगों के लिए उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्र में जिंदगी की यह हकीकत अजूबा नहीं है। इस हादसे ने हजारों उत्तराखंडवासियों का जीवन बदल दिया। इस हादसे के कारण पलायन में तेजी अाई।
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उत्तराखंड में पलायन कोई नई अवधारणा नहीं है। पहाड़ी इलाकों से मैदानी इलाकों में पलायन बहुत आम है। अलग उत्तराखंड राज्य के निर्माण के पीछे यह एक बड़ी वजह रही है। उत्तराखंड के लोग ऐसा राज्य चाहते थे, जो उनकी जरूरतों का ख्याल रख सके और उन्हें बेहतर जिंदगी की तलाश में दूसरे राज्यों में पलायन करने को मजबूर न होना पड़े। अलग राज्य बनने के 17 वर्षों बाद उत्तराखंड को यही हासिल हुआ है कि यहां पलायन का तौर-तरीका बदल गया है। उत्तराखंड के लोग अब पहाड़ी ग्रामीण इलाकों से दूसरे राज्यों के बजाय राज्य के भीतर ही शहरी इलाकों में पलायन कर रहे हैं।
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यह रुझान राज्य के विरोधाभास को ही रेखांकित कर रहा है। यह विरोधाभास दो एकदम विपरीत तरह के रुझानों से उभरा है। पहला रुझान तो यह है कि उत्तराखंड में जो विकास हो रहा है, वह मैदानी क्षेत्र में हो रहा है और वहीं रोजगार और जीवन यापन के अवसर बन रहे हैं, जैसा कि पहले नहीं था। देहरादून, हल्द्वानी और ऋषिकेश जैसे शहर अंदरूनी पहाड़ी क्षेत्र से पलायन करने वालों को आकर्षित कर रहे हैं। मगर यह रुझान उत्तराखंड के अस्तित्व पर ही सवाल खड़ा करता है, क्योंकि इस राज्य का गठन पहाड़ को ध्यान में रखकर किया गया था। सरकारी मशीनरी इस तथ्य को समझने में नाकाम रही है, लिहाजा पहाड़ी क्षेत्रों में विकास नजर नहीं आता। 2011 की जनगणना के मुताबिक उत्तराखंड के कुल 16,793 गांवों में से 1,053 गांवों में कोई नहीं रहता, जबकि 405 गांवों की आबादी दस फीसदी रह गई है। 2013 के हादसे के बाद स्थिति और भयावह हुई है।
देहरादून में बैठे लोग इसका साधारण-सा समाधान सुझाते हैं। उनके मुताबिक पर्याप्त संख्या में स्कूल और अस्पताल उपलब्ध कराने से पलायन रुकेगा। जबकि नीति नियंताओं को समझना होगा कि स्कूल और कॉलेज सिर्फ कंकरीट के भवन नहीं हैं। ये संस्थाएं हैं, जिनके लिए प्रतिबद्ध लोगों की जरूरत होती है। वहां काम करने के लिए लोग तभी जाएंगे, जब उन्हें उन स्थानों पर दूसरी सुविधाएं भी मिलेंगी। यानी वहां आधारभूत संरचनाओं के साथ ही सामाजिक ढांचे की भी जरूरत है। शिक्षा और स्वास्थ्य के अलावा रोजगार पलायन का एक बड़ा कारण है। प्राकृतिक आपदा, वन्यजीवों के हमले और श्रम बाजार की बदतर हालत के कारण यहां खेती करना बहुत चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है। यह देखना बाकी है कि क्या इस चुनाव में भी उत्तराखंड के लोगों के साथ छलावा तो नहीं होगा।