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नई जमीन : देश के बहुमुखी विकास के लिए महात्मा गांधी ने गांवों पर जोर क्यों दिया
Sun, 06 Oct 2019 01:14 AM IST
अनिल प्रकाश जोशी
अनिल प्रकाश जोशी
अनिल प्रकाश जोशी
Published by: अनिल प्रकाश जोशी
Updated Sun, 06 Oct 2019 01:14 AM IST
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महात्मा गांधी
- फोटो : फाइल फोटो
गांधी का महत्व आज भी बराबर है। देश को ब्रिटिश राज से मुक्त काने वाले स्वतंत्रता आंदोलन में गांधी को उनके योगदान के लिए हमेशा याद किया जाता रहा है। पर उनसे जुड़े कई और पहलू भी हैं, जिनकी आज ज्यादा आवश्यकता है। आज भी गांधी के विचारों की प्रासंगिकता उतनी ही है, जितनी पहले थी। गांधी विवेकशील होने के साथ-साथ दूरदर्शी भी थे। देश में हो रहे सामाजिक बदलाव के प्रति उनकी समझ गहरी थी। वह व्यवहारों को समझते थे।
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स्वच्छ समाज उनकी कल्पना का हिस्सा था। गांधी ने कहा था कि स्वच्छता से स्वास्थ्य व चरित्र का निर्माण होता है, जो आज के परिप्रेक्ष्य में सटीक बैठता है। रोजाना अगर 15,000 टन कूड़ा पैदा हो रहा है और उसका सीधा कोई निस्तारण न हो, तो जान लीजिए कि तमाम बीमारियों की जड़ यह भी है। हमने उनसे कभी स्वच्छता के नियमों को नहीं सीखा, जो उनके जीवन का हिस्सा हैं। फिर हम गांधी को कितना समझ पाए यह सवाल बराबर बना रहेगा।
आर्थिकी के पहलू पर गांधी की अलग सोच थी। उनका मानना था इसका स्वरूप विकेंद्रित होना चाहिए। विलासिता वाली अर्थव्यवस्था टिकाऊ नहीं होती। यह सच है कि आज मंदी की कितनी भी चर्चा हो, पर हम आर्थिक रूप मे आज भी एक खास स्तर तक स्थिर हैं। इसका कारण यह है कि हम कृषि प्रधान देश है जहां उत्पादकता हर परिस्थिति में बनी रहती है। प्राथमिक उत्पादकता अर्थव्यवस्था का मूल सिद्धांत है, जो खेतों, वनों व नदियों पर निर्भर है।
गांधी ने इसीलिए गांवों पर बल दिया था और बार-बार यह कहने की कोशिश की थी कि गांव की उत्पादकता ही पूरे देश में आर्थिक स्थिरता ला सकती है और इसी उत्पादकता और स्थिरता के आधार पर अन्य आर्थिकी के आयाम तय होते हैं। उदाहरण के तौर पर वेनेजुएला को ही देख लीजिये जहां खेती-बाड़ी छोड़कर बड़ी गलती की गई, बाद में जब तेल की घटती कीमतों के कारण वहां की आर्थिकी गड़बड़ाई, तो लोगों को खाने-पीने तक के लाले पड़ गए।
पर्यावरण और पारिस्थितिकी को लेकर गांधी का मानना था कि प्रकृति को पालक के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि हमारी विलासिता का हिस्सा होना चाहिए। इसके विपरीत हम प्रकृति, पृथ्वी, नदी व वनों का शोषण मात्र अपनी विलासिता के लिए कर रहे हैं। परिणामस्वरूप आज दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन व ग्लोबल वार्मिंग जैसे बड़े मुद्दे हमारे सामने हैं। हम इन सब दुष्परिणामों को देखने के बाद भी प्रकृति को समझने में असफल रहे।
गांधी का मानना था कि वर्तमान शिक्षा में 'संसाधन शिक्षा' का बड़ा हिस्सा होना चाहिए क्योंकि यही हमें संसाधनों पर आर्थिक निर्भरता बढ़ाएगी और उसी से संरक्षण के रास्ते भी निकलेंगे। बेरोजगारी बढ़ाने में वर्तमान शिक्षा की बड़ी भूमिका है। युवा शिक्षा पाने के बाद भटकना शुरू कर देते हैं, जबकि संसाधनों पर आधारित शिक्षा हमें अपने घर, गांव के बीच में ही रोजगार खड़ा करने के लिए प्रेरित करती है।
हालांकिस यह समझना जरूरी है कि जिन बड़े उद्योगों में बेरोजगार लोग नौकरी तलाशते हैं उनके मूल संसाधन गांव में ही पनपते हैं। कुटीर उद्योगों में उत्पादक और उद्योग नजदीक होते हैं इसीलिए संसाधनों का संरक्षण भी होता है। साथ ही एक महत्वपूर्ण बिंदु यह भी है कि जितना ये दूर होंगे उतनी ही पारिस्थितिक व आर्थिक असमानता बढ़ जाती है। इसके कारण ही पलायन भी जोरों में है।
गांधी ने किसी भी कार्य को कभी भी छोटा नहीं समझा और अपने घर गांव की सफाई व हर काम का जिम्मा सीधा उठाया, वह शौच से जुड़ा हो या सड़क से। उनका मानना था कि हमें अपने देश में कारीगरी को सबसे ज्यादा महत्व देना चाहिए जो किसी न किसी श्रम पर आधारित है। इनकी अनदेखी बड़ी असमानता का कारण भी बन सकती है और आज यह साफ दिखाई देता है कि हमने श्रमकर्मियों को उनके हिस्से का न तो सम्मान दिया और न ही लाभ।
गांधी के विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक और महत्वपूर्ण हैं जितना कि स्वतंत्रता आंदोलन के समय थे। हमने अपने विकास का मॉडल पश्चिमी रखा। अजीब है कि वही पश्चिम आज गांधी को गंभीरता से लेता है और संयुक्त राष्ट्रसंघ में हर साल गांधी और उनके विचारों को याद किया जाता है, जबकि हम गांधी के वंशज बस शक्ल पहचानने तक ही गांधी को जानते हैं। हम गांधी और उनके विचारों को पहचानने और समझने में पूरी तरह असफल हुए हैं।
गांधी विकास के पूरे पक्षधर थे पर उनका मानना था कि विकास संतुलित होना चाहिए और जिससे असंतुलन पैदा हो उसे विकास नहीं विनाश कहना चाहिए। अब भी समय है गांधी की इस जनशताब्दी को हम मात्र औपचारिकताओं में ना निपटा दें, बल्कि गांधी को समझने की नए सिरे से तैयारी करें। क्योंकि आज के परिपेक्ष्य में गांधी के विचार व सोच ज्यादा सटीक है। गांधी को समझने का मतलब ही गांधी को सही श्रद्धांजलि देना होगा।