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क्यों निराश हैं निवेशक

Fri, 01 May 2015 07:48 PM IST
एम के वेणु
एम के वेणु Updated Fri, 01 May 2015 07:48 PM IST
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Why invester in disillusion

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सत्ता में रहते हुए लगभग साल भर ही हुआ है, पर उनका हाव-भाव अब वैसा नहीं रह गया है, जो रोजगार के आकांक्षी युवाओं, किसानों और घरेलू व वैश्विक निवेशकों की भारी उम्मीदों के बीच राजग सरकार की बागडोर संभालने के वक्त नजर आया था। मोदी ने अपने तीव्र चुनाव प्रचार के दौरान इन लोगों से जबर्दस्त आर्थिक पुनरुद्धार और उससे होने वाले लाभ का वायदा किया था। अकेले इस कसौटी पर मोदी सरकार गंभीर रूप से भटकती नजर आ रही है।

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बहुत उत्साह से मोदी का समर्थन करने वाला पूंजीपति वर्ग और विदेशी निवेशक समुदाय का मानो मोहभंग हो गया है। निवेशक समुदाय के मोदी के मुखर समर्थक तक कह रहे हैं कि वे इस बात से घबराए हुए हैं कि अर्थव्यवस्था में बहुत अधिक बदलाव नहीं हुआ है। हालांकि कुछ लोग अब भी मोदी को 'संदेह का लाभ' दे रहे हैं क्योंकि 'उनका इरादा नेक है और वह उद्योगों की मदद करना चाहते हैं'। मोदी से सहानुभूति रखने वाले रतन टाटा जैसे कुछ पूंजीपति निवेशकों से अपील कर रहे हैं कि वे थोड़ा और धैर्य रखें। जबकि एचडीएफसी चेयरमैन दीपक पारेख जैसे कुछ लोगों ने जब खुलेआम सरकार के निर्णय लेने की प्रक्रिया में भटकाव की बात की, तो उन्हें हल्की फटकार मिली।
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लेकिन वैश्विक निवेशक समुदाय में सबसे ज्यादा मुखरता दिखाते हुए अमेरिकी निवेशक जिम रोजर्स ने पिछले हफ्ते कहा कि 'मोदी सिर्फ बातें करते हैं, काम नहीं।' ऐसी भावना विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई) समुदाय के जरिये प्रतिध्वनित हुई है, जिसने वस्तुतः इस वर्ष के अंत तक शेयर बाजार की वृद्धि संबंधी अपने मूल अनुमानों को घटाया है। पहले एफआईआई के प्रतिष्ठित शोध संस्थानों ने अनुमान लगाया था कि बीएसई सेंसेक्स इस वर्ष दिसबंर तक 33,000 की ऊंचाई को छू लेगा, लेकिन अब वे कह रहे हैं कि यह आंकड़ा 28,000 से 29,000 के बीच रहेगा।
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साफ है कि भारत के प्रति विदेशी संस्थागत निवेशकों के उत्साह में इस वर्ष कुछ कमी आई है और उनका ध्यान वापस चीन और अन्य उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं की तरफ लौट रहा है। यह इस वर्ष भारत के शेयर बाजार की तुलना में चीन के शेयर बाजार में आई तेजी (करीब 20 फीसदी की वृद्धि) से परिलक्षित हो रहा है। वित्त मंत्री और प्रधानमंत्री, दोनों ने पिछले वर्ष जुलाई में घोषणा की थी कि अर्थव्यवस्था निर्णायक रूप से रसातल में चली गई थी, लेकिन उसे उबार लिया गया है। जमीनी स्तर पर वास्तविकता सबके सामने है। प्रतिष्ठित कृषि अर्थशास्त्री और नीति आयोग में कृषि प्रकोष्ठ के सदस्य प्रो. अशोक गुलाटी ने हाल ही में लिखा है कि वर्ष 2014-15 में कृषि विकास दर शून्य या नकारात्मक भी रह सकती है। चूंकि कृषि अर्थव्यवस्था का उपभोक्ता उत्पादों की मांग पर बहुत ज्यादा असर पड़ता है, इसलिए औद्योगिक विकास को पटरी पर लौटने में देर लग सकती है। पहले ही ऐसी रिपोर्टें देखने को मिली हैं कि खेतिहर परिवारों के पास इस वर्ष शादी या अन्य सामाजिक उत्सवों में खर्च के लिए पैसे नहीं बचे हैं।

औद्योगिक निवेश ऊपर नहीं उठ रहा है, क्योंकि वहां पहले से ही मांग से ज्यादा उत्पादन हो रहा है। उद्योग इस समय केवल 65 फीसदी क्षमता पर काम कर रहे हैं और उपभोक्ता मांग में इजाफे का अब तक कोई संकेत नहीं है। आम तौर पर उद्योग नए निवेश की योजना तब बनाते हैं, जब मौजूदा उत्पादन क्षमता का उपयोग 85 से 90 फीसदी को पार कर जाता है। मौजूदा उत्पादन क्षमता इससे काफी नीचे है। स्टील, सीमेंट, कोयला, बिजली, कच्चा तेल, प्राकृतिक गैस और ऊर्वरक जैसे प्रमुख क्षेत्र के उत्पादन आंकड़े तो नकारात्मक विकास को दर्शाते हैं। ऐसा पिछले 17 महीनों में पहली बार हुआ है। इस वर्ष अब तक निर्यात की बेहद नकारात्मक विकास दर भी काफी चिंताजनक है।

निवेशक वर्ग मोदी से बुरी तरह निराश है, क्योंकि उन्होंने भूमि अधिग्रहण, श्रम कानूनों और कर कानूनों में बड़े सुधार का वायदा किया था। इन तीनों मुद्दों पर निवेशक निराश हैं, क्योंकि मोदी लगातार उन्हें शांत करने के लिए कहते हैं कि चीजें सुधरेंगी। दमनकारी कर व्यवस्था के मुद्दे पर घरेलू और विदेशी निवेशक संतुष्ट नहीं हैं। भूमि एवं श्रम कानूनों में सुधार के मुद्दे पर मोदी सरकार ने अपनी क्षमता से अधिक कोशिश की। नतीजतन भूमि अधिग्रहण बिल पर भाजपा और विपक्षी दलों के बीच भारी राजनीतिक गतिरोध है। श्रम सुधारों पर राजग सरकार मुकर गई है और इसे भाजपा शासित राज्यों पर आवश्यक कार्रवाई के लिए छोड़ दिया है।

मौजूदा कृषि संकट के बीच में सरकार जिस तरह से भूमि अधिग्रहण अध्यादेश पर दबाव बना रही है, उसका राजनीतिक असर पड़ा है और प्रधानमंत्री की छवि किसान विरोधी बन गई है। इन सबका तनाव अब प्रधानमंत्री पर दिख रहा है। वह इतने रक्षात्मक हो गए हैं कि दस दिन के भीतर उन्होंने दो बार घोषणा की कि वह जमीन छीन नहीं रहे या मुकेश अंबानी के लिए कानून नहीं बना रहे। अब तक किसी भी प्रधानमंत्री ने इतने रक्षात्मक स्वर में अपनी गरीब समर्थक नीतियों के बारे में नहीं बताया। वित्त मंत्रालय के समक्ष दायर एक आरटीआई याचिका के जवाब से खुलासा हुआ है कि भूमि अधिग्रहण की समस्या के कारण मात्र आठ फीसदी निवेश परियोजनाएं लंबित हैं। जबकि सामान्य बाजार के हालात और प्रोमोटरों में दिलचस्पी की कमी परियोजनाओं के लंबित होने के मुख्य कारण हैं। यह भावना मोदी के मेक इन इंडिया को भी प्रभावित कर सकती है।


इसलिए जरूरी है कि अर्थव्यवस्था में निवेश क्यों नहीं हो रहा है, इसका वस्तुगत उपचार किया जाए। मोदी जब विपक्ष में थे, तो यूपीए पर नीतिगत जड़ता का आरोप लगाते थे, पर अब सत्ता में वह स्वयं उन्हीं समस्याओं से जूझ रहे हैं। राजग सरकार को आत्मविश्लेषण करना चाहिए कि तेल मूल्यों में 40 फीसदी से ज्यादा की गिरावट के बावजूद अर्थव्यवस्था क्यों नहीं ऊपर उठ रही है। यहां कई अंतर्निहित एवं अनसुलझे राजनीतिक-आर्थिक संकट हैं, जिसका सावधानीपूर्वक अध्ययन करने की जरूरत है।

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