सरकार ने क्यों पीछे खींचे कदम
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भूमि अधिग्रहण कानून के मुद्दे पर बहुत ही व्यावहारिक रुख अपनाते हुए राज्यों को यह छूट दे दी है कि वे चाहें, तो यूपीए सरकार द्वारा वर्ष 2013 में पारित केंद्रीय भूमि अधिग्रहण कानून के व्यापक ढांचे के भीतर भूमि अधिग्रहण के लिए अपना कानून बना सकते हैं। राजनीतिक पर्यवेक्षक भाजपा के अपने रुख से पीछे हटने को आगामी बिहार विधानसभा चुनाव से जोड़कर देखते हैं। बहरहाल इससे भाजपा और विपक्ष के बीच जारी तनाव कुछ कम होना चाहिए, जिन्होंने भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को किसान विरोधी और बड़े उद्योगों का हितैषी बताकर खारिज कर दिया था।
संभवतः यह पहली बार था, जब मोदी ने अपने रेडियो कार्यक्रम मन की बात में राजनीति पर खुलकर बोलने का फैसला किया और घोषणा की कि भूमि अधिग्रहण अध्यादेश (जिसे भाजपा ने उद्योग जगत और किसान, दोनों के हितैषी होने का दावा किया था) वापस लिया जा रहा है। अब भाजपा इस वापसी को राजनीतिक रूप से कैसे जायज ठहराएगी? अध्यादेश किसान हितैषी है, और उस अध्यादेश की वापसी भी किसान हितैषी है! दोनों तो सच नहीं हो सकता। बेहतर होगा कि भाजपा ईमानदारी से लोगों को बताए कि उसने पहले जो रुख अपनाया था, उसने किसानों के बीच व्यापक असुरक्षा की भावना पैदा की, इसलिए पार्टी ने भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया को और ज्यादा लोकतांत्रिक बनाने के लिए अपने रुख में बदलाव किया। और जो भी हो, इससे लोगों की नजरों में पार्टी की साख बढ़ेगी ही।
इसके बजाय, राजग ने राजनीतिक लाभ हासिल करने के लिए एक कार्यकारी आदेश जारी किया है, जो राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम, विद्युत अधिनियम, रेलवे अधिनियम, खनन अधिनियम जैसे 13 स्वतंत्र कानूनों के तहत अधिगृहीत जमीन के लिए वर्ष 2013 के कानून के मुआवजे के प्रावधानों का विस्तार करना चाहता है। इन कानूनों के तहत राज्य ऐतिहासिक रूप से अपने मुआवजा प्रावधानों के अनुसार भूमि अधिगृहीत करते थे। यूपीए के भूमि कानून में विशेष रूप से कहा गया था कि ये 13 कानून भी उसी उदार मुआवजा प्रणाली के अधीन आ जाएंगे। इस प्रक्रिया को दिसंबर, 2014 तक पूरा किया जाना था। ऐसा नहीं हुआ, क्योंकि राजग अलग रास्ता अपनाते हुए अध्यादेश ले आया, जिसके लिए 2013 के कानून में पूरी तरह से फेरबदल की जरूरत थी।
अब भाजपा कार्यकारी आदेश जारी करके इन तेरह स्वतंत्र कानूनों के तहत अधिगृहीत होने वाली जमीन के मुआवजे के विस्तार का श्रेय लेना चाहती है, जिसकी व्यवस्था 2013 के कानून में पहले से ही है। कांग्रेस ने एक तकनीकी बिंदु उठाया है कि जब तक इन तेरह कानूनों को अलग से संसद से संशोधित नहीं किया जाता कि इनके तहत अधिगृहीत की जाने वाली भूमि के लिए भी 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून की मुआवजा व्यवस्था का विस्तार किया जा रहा है, तब तक ऐसा नहीं हो सकता। जाहिर है, राजग ने बिहार के मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए जल्दबाजी में कार्यकारी आदेश जारी किया है।
मूल बात यह है कि इसके जरिये भाजपा इस बात से लोगों का ध्यान हटाने की कोशिश कर रही है कि कैसे राजग अपने मूल अध्यादेश के जरिये 70 से 80 फीसदी किसानों से अनिवार्य सहमति और विस्तृत सामाजिक प्रभाव आकलन से संबंधित महत्वपूर्ण प्रावधानों को कमजोर करना चाहता था। वास्तव में अध्यादेश के इन दोनों विवादित मुद्दों में कई बदलाव भी हुए और अंत में भाजपा के सदस्यों ने संसद की प्रवर समिति में इन दोनों अहम प्रावधानों के पक्ष में वोट किया। यह वाकई सरकार के लिए शर्मनाक था, जिसने यूपीए के भूमि कानून को विकास विरोधी बताया था। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कई बार कहा था कि 2013 के कानून से ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क, बिजली, सिंचाई ढांचों के लिए जमीन अधिग्रहण संभव नहीं है। लेकिन अब उसी कानून को स्वीकार कर राजग ने जेटली के रुख को पलट दिया है।
भले ही भाजपा इसके लिए कई कारण गिनाए, लेकिन तथ्य यह है कि प्रधानमंत्री मोदी अब राजनीतिक रूप से काफी सजग दिख रहे हैं। हालांकि यह बात गले नहीं उतरती कि सरकार ने ऐसा सिर्फ नीतिगत कारणों से किया। मोदी और जेटली के लिए भूमि अध्यादेश 'करो या मरो' का विषय बन गया था। इसका कारण था, नरेंद्र मोदी के प्रति अनुराग रखने वाला वैश्विक निवेशक समुदाय हमेशा चाहता है कि तीन बड़े सुधार कार्यक्रमों को गति दी जाए। ये सुधार कार्यक्रम हैं, उद्योगों के लिए आसान और सस्ता भूमि अधिग्रहण, श्रम सुधार और वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी)। इनमें से पहले दो की तो निकट भविष्य में संभावना नहीं है। जीएसटी से संबंधित कानून पारित हो सकता है, पर वह भाजपा और कांग्रेस की कड़वाहट में फंसा हुआ है।
अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी निवेशकों की सामूहिक भावना को प्रदर्शित करती है। याद कीजिए कि मोदी के सत्ता में आने के कुछ महीनों बाद कैसे मूडीज ने भारत की रेटिंग को स्थिर से सकारात्मक दिशा में बढ़ते हुए दिखाया था। राजग के मंत्री इसे अपनी बड़ी उपलब्धि बता रहे थे। अब उसी मूडीज ने संकेत दिया है कि वह भूमि अधिग्रहण विधेयक, श्रम सुधार आदि का भविष्य देखते हुए अपने पिछले वर्ष के आकलन की समीक्षा करेगी। मूडीज ने भी पिछले महीने वर्ष 2015-16 में सात फीसदी विकास दर की भविष्यवाणी की। वह तब सही साबित हुई, जब सरकार की ओर से पिछली तिमाही की आधिकारिक जीडीपी दर सात फीसदी बताई गई। इसका मतलब है कि 2014-15 की तुलना में विकास दर घट रही है।
बहरहाल, नरेंद्र मोदी को एक ओर तो बिहार के मतदाताओं की बुनियादी आकांक्षाओं के साथ सामंजस्य बिठाना है, वहीं दूसरी ओर उन पर वैश्विक निवेशकों का दबाव भी है, जिन पर 'मेक इन इंडिया' और 'स्टार्ट अप इंडिया' जैसे उनके महत्वपूर्ण कार्यक्रम निर्भर हैं। जाहिर है, सबसे बड़ा सवाल उम्मीदों पर खरा उतरने का है। बिहार में जीत हासिल करना मोदी के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे पिछले छह महीने में खोए आत्मविश्वास को हासिल करने में उन्हें मदद मिलेगी।