राहुल की छुट्टी पर हंगामा क्यों
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जब सुना कि राहुल गांधी को उनकी माताजी ने छुट्टी दे दी है, तो सोचा कि लंबी छुट्टी होगी। मैंने यह सोचा कि शायद राहुल गांधी कुछ महीनों के लिए अपने सलाहकारों के साथ कांग्रेस के भविष्य की नई रणनीति तैयार करने के वास्ते छुट्टी ले रहे हैं। इसीलिए यह सुनकर बहुत आश्चर्य हुआ, जब यह पता लगा कि उन्होंने छुट्टी सिर्फ पंद्रह दिन के लिए ही ली है। लेकिन उनकी इस छुट्टी को लेकर इतना हंगामा क्यों हुआ? कांग्रेस के वरिष्ठ नेता क्यों सफाई देते फिर रहे हैं टेलीविजन पर? क्यों कमलनाथ जैसे अति वरिष्ठ नेता यह कह रहे हैं कि समय आ गया है कि राहुल जी अपनी विरासत पूरी तरह संभालें, ताकि सफलताओं का श्रेय भी उनको मिले, और नाकामियों की जिम्मेदारी भी उनकी हो। उधर राहुल के करीबी सलाहकार, दिग्विजय सिंह, ऊंची आवाज में कह रहे हैं कि राहुल गांधी अपनी जिम्मेदारियों से भागकर नहीं जा रहे हैं।
मुझे याद हैं वे दिन, जब आम चुनाव के समय गरीब लोग इंदिरा गांधी को देखकर ऐसे हैरान हो जाते थे, जैसे कि किसी देवी के दर्शन हो गए हों। याद हैं मुझे वे आम सभाएं, जिनमें लोग दूर-दूर से पैदल आते थे और घंटों बैठे रहते थे भूखे-प्यासे, सिर्फ इंदिरा जी के दर्शन करने। इंदिरा जी के दौर में गरीबी हटाने के नारे खूब लगे, लेकिन गरीब जनता की गरीबी कम नहीं हुई। इसके बावजूद वोट उनको मिलते रहे। नेहरू-गांधी परिवार का करिश्मा ऐसा था कि राजीव गांधी की हत्या के बाद उनकी पत्नी सोनिया गांधी को कांग्रेस के बड़े नेताओं ने पार्टी अध्यक्ष बनने के लिए आमंत्रित किया। कांग्रेस कार्यसमिति में पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व केंद्रीय मंत्री थे, पर इतना भरोसा था पार्टी को सोनिया गांधी के करिश्मे पर कि बड़े नेताओं ने खुद को सामने करने के बजाय गांधी परिवार पर दांव लगा दिया। फिर अमेठी से चुनाव जीतकर राहुल गांधी सक्रिय राजनीति में आए। तब कहा जा रहा था कि वह कभी भी मनमोहन सिंह की जगह देश के प्रधानमंत्री बन सकते हैं। पर उत्तर प्रदेश और बिहार विधानसभा चुनावों में उनकी सक्रियता के बावजूद कांग्रेस की हार हुई। उस हार पर कांग्रेस ने ईमानदारी से विश्लेषण किया होता, तो उन्हें पता चल जाता कि नेहरू-गांधी परिवार के करिश्मे में अब पहले वाली वह बात नहीं है। उसे यह भी मालूम हो गया होगा कि भारत के मतदाता अपने वोट की अहमियत अच्छी तरह समझ गए हैं और अब उन्हीं को देने लगे हैं, जो उनकी सेवा ईमानदारी से करके दिखाते हैं।
2014 के लोकसभा चुनाव में राहुल जी कांग्रेस के लिए जब सिर्फ चौवालिस सीटें ला पाए, तो पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं ने सारा दोष उन पर डालने की कोशिश की। कहते हैं कि उनमें राजनेता बनने की काबिलियत नहीं है, इसलिए कांग्रेस की यह दुर्दशा है। मगर सच शायद यह है कि करिश्मा का वह जादू अब नहीं रहा, जो कभी था। सच शायद यह भी है कि जनता को परिवर्तन और विकास देखने की इच्छा है। लोकसभा चुनाव मे कांग्रेस ने न कभी परिवर्तन की बात की, न विकास की। गरीबी हटाने का वही पुराना नारा लेकर गए राहुल जी चुनाव में, जो उनकी दादी के जमाने से चला रहा है। जबकि जनता इससे ज्यादा चाहती है।