फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   why furore on ipl spot fixing

हंगामा है क्यों बरपा

Tue, 21 May 2013 09:32 PM IST
अशोक सण्ड
अशोक सण्ड Updated Tue, 21 May 2013 09:32 PM IST
विज्ञापन
why furore on ipl spot fixing

यह कौन नहीं जानता कि वे देश के लिए नहीं, बल्कि उद्योगपतियों और फिल्मी हस्तियों के रोमांच के लिए खेल रहे थे, धन जुटा रहे थे उनके लिए। छटांक भर भी देशद्रोह नहीं किया उन्होंने। फिर उनके खिलाफ यह विद्रोह कैसा! अपनी भौतिक-समृद्धि के उत्कर्ष के लिए ही खुद को नीलाम किया था उन्होंने। वे रेस वाले घोड़े नहीं, इंसान थे।

विज्ञापन


उनके फन, हुनर और कौशल पर जब बड़े-बड़े लोग दांव लगाकर कमाई कर सकते हैं, तब अगर उन्होंने थोड़ी-सी कमाई अलग से कर ली, तो कैसा हंगामा। पापी पेट के लिए ही तो खेल रहे थे वे। बाजार में उनकी नीलामी हुई। वे अपने फन के साथ बाजार में खरीदार के सामने खड़े थे। ऐसे में कुछ अतिरिक्त पैसों के लिए अगर उन्होंने अपना खेल बेच दिया, तो इतना कोहराम! वैसे भी वे जेंटलमैन वाला गेम नहीं, जुआ खेल रहे थे।
विज्ञापन


फटाफट फैसले वाले इस थ्रिल में यदि एक तरफ भगवान टाइप धीर-गंभीर क्रिकेटर शामिल हैं, तो लोभ, क्रोध, उत्तेजना के विराट स्वरूप वाली हस्तियां भी मौजूद हैं। क्रिकेट का यह नया संस्करण व्यवसाय बन चुका है। खिलाड़ी इसके एजेंट। दर्शक भी ऐसे, जिन्हें थ्रिल चाहिए। स्टेडियम में अब होर्डिंग्स नहीं लगतीं।
विज्ञापन
विज्ञापन


खिलाड़ियों की सूरत छोड़ पूरा पहनावा विज्ञापन एजेंसियों का बसेरा। हेलमेट और टोपी से लेकर जूते के फीतों तक में इश्तहार। कौन-सी बनियान पहनें और कौन-सी जांघिया, किस सीमेंट से घर बनाना है, कौन-सा रंग चुपड़ना है, कौन वाला फोन,कौन-सा लैपटॉप, किस ट्रेवल एजेंसी से टिकट बुक कराएं और किस जहाज से यात्रा करें, सब कुछ उनकी रंग-बिरंगी जर्सी पर उपलब्ध।

किस ‘मान्यवर’ से शादी की डिजाइनर शेरवानी बनवाई जा सकती है, यह ठिकाना भी मौजूद। पीठ, पेट, कमर, आजू-बाजू जहां भी कैमरा जाएगा, वहीं चिप्पियां मिलेंगी। तारीफ उस खिलाड़ी की, जिसने अपने मजहब की इज्जत करते हुए एक दारू के इश्तहार पर टेप लगा लिया। दारू की दुकान तक सजी रहती है उनके बदन पर।


एक वह वक्त था, जब साफ-सुथरे कपड़ों में गेंद बाउंडरी हिट करती, तब किसी पान मसाले की पट्टी देख खुद-ब-खुद स्वाद आ जाता। कहां गए वे लोग, जो मैदान में शांत दिखते थे और मैदान के बाहर भी शालीन नजर आते थे। अब तो नाम के पहले श्री वाले श्रीमंत श्री-विहीन हो रहे हैं। वाह क्रिकेट पर आह क्रिकेट क्या करना।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed