चीन के मायाजाल में क्यों फंसें
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दस दिन बाद चीन के तीन दिवसीय दौरे पर जाएंगे। हो सकता है, इस यात्रा के दौरान कुछ बड़े समझौते हों, जिनका जश्न भी मनाया जाए। लेकिन हकीकत यह है कि हर जो चीज चमकती है, उसको सोना नहीं कहते। रक्षा, आंतरिक सुरक्षा, विदेश नीति और सामरिक विषयों के जानकारों का यह कहना है कि भारत धीरे-धीरे चीन के मायाजाल में फंसता जा रहा है। आज से पंद्रह वर्ष पहले वाशिंगटन के एक विचारक ने दक्षिण एशिया के भविष्य को लेकर तीन संभावनाएं व्यक्त की थीं। पहली संभावना यह कि अपने गृहयुद्ध के कारण पाकिस्तान का विघटन हो जाएगा और उसके पड़ोसी देश उसे बांट लेंगे। दूसरी संभावना यह कि भारत अपनी व्यवस्थाओं को इतना मजबूत कर लेगा कि चीन और भारत बराबर की ताकत बनकर अपने-अपने प्रभाव के क्षेत्र बांट लेंगे। और तीसरी यह कि चीन धीरे-धीरे चारों तरफ से भारत को घेरकर उसकी आंतरिक व्यवस्थाओं पर अपनी पकड़ मजबूत कर लेगा और उसके बाद भारत की अर्थव्यवस्था को सोख लेगा। कहने की जरूरत नहीं कि आज यह तीसरी संभावना साकार होती दिखाई दे रही है।
चीन का नेतृत्व एकजुट, केंद्रीयकृत, विपक्षविहीन और दूरदृष्टि वाला है। उसने भारत को जकड़ने की दूरगामी योजना बना रखी है। अरुणाचल प्रदेश की जमीन पर वर्ष 1962 से कब्जा जमाए रखने के बावजूद चीन को किसी भी मौके पर इस इलाके को भारत को वापस करने में गुरेज नहीं होगा। उसने इसके लिए भारत में एक लॉबी पाल भी रखी है, जो इस मुद्दे को गर्माए रहती है। ऐसा करके वह भारत के प्रधानमंत्री को खुश होने का एक बड़ा मौका देगा, लेकिन उसके बदले में हमसे वह बहुत कुछ ले लेगा। ऐसा इसलिए कि उसे सामरिक दृष्टि से इस क्षेत्र में कोई रुचि नहीं है। यह कब्जा तो उसने केवल हमसे सौदेबाजी करने के लिए कर रखा है। उसका असली खेल तो दरअसल तिब्बत, पाक अधिकृत कश्मीर और पाकिस्तान में है, जहां उसने रेल और हाई-वे बनाकर अपनी सामरिक स्थिति भारत के विरुद्ध काफी मजबूत कर ली है। उसके लड़ाकू विमान हमारी सीमा से मात्र पचास किलोमीटर दूर तैनात हैं। जाहिर है कि युद्ध की स्थिति में सड़क और रेल के जरिये रसद पहुंचाना उसके लिए बाएं हाथ का खेल होगा। जबकि ऐसी किसी भी व्यवस्था के अभाव में हम उसके सामने स्वाभाविक ही हल्के पड़ेंगे।
तथ्य यह है कि पिछले एक दशक में ऊर्जा, संचार और पेट्रोलियम जैसे संवेदनशील और अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र में चीन ने भारत में लगभग सारे अंतरराष्ट्रीय ठेके जीते हैं। इससे हमारी धमनियों पर अब उसका शिकंजा कस चुका है। चीन में बने-बनाए टेलीफोन एक्सचेंज भारत में लगाए गए हैं, जिनकी देखभाल भी चीन रिमोट कंट्रोल से करता है, क्योंकि ठेके की यही शर्त थी। नतीजतन अब वह हमारी सारी बातचीत पर निगाह रख सकता है। यहां तक कि हमारी खुफिया जानकारी भी अब उससे बची नहीं है। इस तरह बीजिंग जब चाहे, हमारी संचार व्यवस्था ठप कर सकता है। जिस समय चीन ये ठेके लगातार जीत रहा था, उस समय हमारे गृह और रक्षा मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों ने लिखकर चिंता व्यक्त की थी। लेकिन सरकार ने तब उसकी अनदेखी कर दी।
यह सब जानते हैं कि उद्योगपतियों के लिए मुनाफा देशभक्ति से कहीं बड़ा होता है। चीन ने अपने यहां आधारभूत सुविधाओं का लुभावना तंत्र खड़ा करके भारत के उद्योगपतियों को अपने यहां निवेश के लिए खींचना शुरू कर दिया है। उत्पादन के क्षेत्र में तो वह पहले ही भारत के लघु उद्योगों को खा चुका है। उधर भारत का हर बाजार चीन के माल से पटा पड़ा है। जाहिर तौर पर इससे देश में भारी बेरोजगारी फैल रही है। यह बेरोजगारी भविष्य में भयावह रूप ले सकती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ‘मेक इन इंडिया‘ अभियान बहुत सामयिक और सार्थक है। उसके लिए प्रधानमंत्री दुनिया भर में जा-जाकर मशक्कत भी खूब कर रहे हैं। लेकिन जब तक देश की आंतरिक व्यवस्थाएं, कार्य संस्कृति और आधारभूत ढांचा नहीं सुधरता, तब तक ‘मेक इन इंडिया' अभियान सफल नहीं होगा। इन क्षेत्रों में अभी सुधार के कोई लक्षण दिखाई नहीं दे रहे हैं, जिन पर प्रधानमंत्री को गंभीरता से ध्यान देना होगा। यह एक कटु सच्चाई है कि चीन भारत को चारों तरफ से घेर चुका है। नेपाल, म्यांमार, दक्षिण पूर्व एशियाई देश, श्रीलंका और पाकिस्तान पर तो उसकी पकड़ पहले ही मजबूत हो चुकी थी। पिछले दिनों उसने मालदीव में भारत के जीएमआर ग्रुप से हवाई अड्डा छीन लिया। इस तरह भारत पर चारों तरफ से हमला करने की उसने पूरी तैयारी कर ली है। इसका अर्थ यह नहीं कि भारत पर सैन्य हमला करने की उसकी मंशा है, बल्कि इस तरह दबाव बनाकर वह अपने फायदे के लिए भारत सरकार को ब्लैकमेल तो कर ही सकता है।
इस पूरे परिदृश्य में अब केवल दो ही संभावनाएं बची हैं। एक यह कि भारत अपनी आंतरिक स्थिति मजबूत करे और चीन के बढ़ते प्रभाव को रोके। और दूसरा यह कि चीन में वैसा ही आंतरिक विस्फोट हो, जैसा कभी रूस में हुआ था और चीन की केंद्रीयकृत सत्ता कमजोर पड़ जाए। वैसे में फिर चीन भारत पर हावी नहीं हो पाएगा। लेकिन निकट भविष्य में तो इसकी कोई संभावना नहीं दिखती। ऐसे में चीन से किसी भी तरह का सहयोग या लाभ लेने की अपेक्षा रखना हमारे लिए बहुत बुद्धिमानी का कार्य नहीं होगा। हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दूरदृष्टि वाले व्यक्ति हैं। इसलिए आशा की जानी चाहिए कि चीन से संबंध बनाने की प्रक्रिया में वह इन गंभीर मुद्दों की अनदेखी नहीं करेंगे।