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कठोपनिषद्: नचिकेता ने यमलोक में क्यों बिताईं तीन रातें? इस कथा से भौतिक वस्तुओं के त्याग और आत्मज्ञान की सीख

Sun, 19 May 2024 05:13 AM IST
Ashutosh Garg आशुतोष गर्ग
Updated Sun, 19 May 2024 05:13 AM IST
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सार
आत्मा न तो वेद-प्रवचन से प्राप्त होती है, न बुद्धि से मिलती है और न शास्त्रों के श्रवण से ही मिलती है। वह उन्हीं को प्राप्त होती है, जिनकी वासनाएं शांत हो चुकी हैं, सब कामनाएं मिट गई हैं।
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Why did Nachiketa spend three nights in Yamalok, know the whole story from the pages of culture
नचिकेता ने यमलोक में क्यों बिताईं तीन रातें - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

ऋषि उद्दालक विश्वजित नामक एक महान यज्ञ कर रहे थे। उन्होंने अनुष्ठान में अपनी सारी संपत्ति दान कर दी। ऋषि-ऋत्विजों को दक्षिणा में गायें दी जा रही थीं। पिता के मंगल हेतु राजा के सात वर्षीय पुत्र नचिकेता ने अपने पिता से कहा, 'पिताजी! मैं भी आपका धन हूं, आप मुझे किसे दान में देंगे?’


उद्दालक ने कोई उत्तर नहीं दिया। नचिकेता ने पुनः प्रश्न दोहराया, किंतु उद्दालक इस बार भी चुप रहे। नचिकेता ने फिर पूछा, 'पिताजी! बताइए, मुझे किसे दान में दे रहे हैं?' तीसरी बार वही प्रश्न सुनकर उद्दालक को क्रोध आ गया। उन्होंने चिढ़कर कह दिया, ‘जाओ, मैं तुम्हें मृत्यु को देता हूं!’


यह सुनकर भी बालक नचिकेता विचलित नहीं हुआ। उसने हाथ जोड़कर अपने पिता से कहा, 'पिताजी! शरीर तो नश्वर है, किंतु वचन सर्वोपरि है। आपने मुझे यमलोक जाने का आदेश दिया है, इसलिए अब मुझे जाने की आज्ञा दीजिए।' यह सुनकर सारे ऋषि-मुनि डर गए। नचिकेता को अनेक प्रकार से समझाया गया, किंतु उसने किसी की बात नहीं मानी। आखिर उद्दालक ने नचिकेता की सत्यपरायणता देखकर उसे यमपुरी जाने की आज्ञा दे दी। नचिकेता ने पिता को प्रणाम किया और यमलोक के लिए प्रस्थान कर गया।
बालक नचिकेता जब यमपुरी पहुंचा, तो उसे भीतर जाने की आज्ञा नहीं मिली। नचिकेता ने तीन रात यमपुरी के द्वार पर अन्न-जल ग्रहण किए बिना बिताया। उसकी निष्ठा और उसका संकल्प देखकर यमराज भी कांप उठे। ब्राह्मण का सत्कार न करने के दुष्परिणाम होते हैं। फिर नचिकेता तो तेजस्वी ऋषिकुमार था। यमराज को आखिर नचिकेता से मिलने आना पड़ा। उन्होंने नचिकेता से सम्मानपूर्वक कहा, ‘ब्राह्मणकुमार! आप मेरे अतिथि हैं, फिर भी आपको मेरे द्वार पर तीन रात्रि उपवास करके बितानी पड़ी। मुझसे भारी अपराध हो गया है। आप प्रत्येक रात्रि के लिए मुझसे एक-एक वरदान मांग सकते हैं।'


नचिकेता ने प्रथम वरदान मांगा – ‘हे मृत्यो! मेरे पिता मेरे प्रति शांत, प्रसन्नचित्त और क्रोध रहित हो जाएं और जब मैं आपके यहां से लौटकर घर जाऊं, तब वह मुझसे प्रेमपूर्वक बातचीत करें।' यमराज ने कहा , ‘तथास्तु!’

नचिकेता ने दूसरा वर मांगा, ‘हे देव! मैं अग्नि का स्वरूप जानना चाहता हूं, क्योंकि उसे जानकर ही लोग स्वर्ग में अमृतत्व प्राप्त करते हैं।' इस पर यमराज बोले, ‘यह अग्नि, जगत की प्रतिष्ठा का मूल कारण है। आपकी ज्ञान-पिपासा देखकर मैं आपको वरदान देता हूं कि अग्नि भी आपके नाम से प्रसिद्ध होगी और नचिकेत अग्नि कहलाएगी। अब तीसरा वर मांगिए!’
नचिकेता ने कहा, ‘आप मृत्यु के देवता हैं। आत्मा का प्रत्यक्ष निर्णय नहीं हो पाता। अत: मैं आत्म-ज्ञान पाना चाहता हूं।' यह सुनकर यम थोड़ा झिझके। आत्म-विद्या को प्राप्त करना सरल नहीं होता। यमराज ने नचिकेता को आत्म-ज्ञान की दुरूहता बताकर टालना चाहा, किंतु नचिकेता अपने निश्चय से नहीं डिगा। यम ने नचिकेता को अनेक प्रकार के प्रलोभन दिए, फिर भी बात नहीं बनी। 

आखिरकार, यम ने आत्मा के स्वरूप को समझाते हुए कहा– ‘आत्मा अजन्मी है, नित्य है, शाश्वत है, सनातन है, शरीर के नाश होने पर भी बची रहती है। वह सूक्ष्म से भी सूक्ष्म और महान से भी महान है। 

आत्मा शरीर में रहते हुए भी शरीर से रहित है, अस्थिर पदार्थों में व्याप्त होते हुए भी स्थिर है। वह कण-कण में व्याप्त है। सारा सृष्टिक्रम उसी के आदेश पर चलता है। जो पुरुष मृत्यु आने से पूर्व उसे जान लेता है, वह मुक्त हो जाता है। तथा शोक को जीतकर परमानंद को प्राप्त कर लेता है।'

यम ने आगे कहा, ‘वह आत्मा न तो वेद-प्रवचन से प्राप्त होती है, न बुद्धि से मिलती है और न शास्त्रों के श्रवण से ही मिलती है। वह उन्हीं को प्राप्त होती है, जिनकी वासनाएं शांत हो चुकी हैं, सब कामनाएं मिट गई हैं और जिनके अंतःकरण को मलिनता की छाया स्पर्श नहीं कर पाती तथा जो उसे पाने के लिए व्याकुल रहते हैं।'
नचिकेता की यह कथा मूल रूप से कठोपनिषद् में मिलती है और सिखाती है कि यदि इच्छा हो, तो किसी भी आयु में भौतिक वस्तुओं का त्याग करके आत्मज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।
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