'बोडोलैंड' क्यों अहम है भाजपा के लिए, बता रहे हैं संजय हजारिका

Sanjay Hazarika संजय हजारिका Published by: संजय हजारिका
Updated Wed, 24 Feb 2021 06:35 AM IST
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पश्चिम बंगाल को छोड़कर चुनावी बुखार ने उन राज्यों को अभी अपनी चपेट में नहीं लिया होगा, जहां अप्रैल-मई में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं, लेकिन आने वाले दिनों में इसके चरम पर पहुंचने की संभावना है। असम में सत्तारूढ़ भाजपा अपने मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल और वित्त, स्वास्थ्य एवं शिक्षा मंत्री हेमंत विस्व शर्मा के नेतृत्व में सहज दिख रही है। कोई उन्हें राजनीतिक शक्ति का जुड़वा इंजन कह सकता है, जिसमें शर्मा न केवल राज्य के लिए बल्कि इस क्षेत्र के अन्य हिस्सों में भी रणनीतिक गठबंधनों को कुशलता से अंजाम दे रहे हैं। बेशक चुनाव की भविष्यवाणी करने में अनजान तथ्यों का जोखिम जुड़ा होता है। कम से कम कोई यह नहीं कह सकता कि मतदान के दिन कोई व्यक्ति किस तरह वोट डालेगा। लेकिन इसके साथ यह भी स्पष्ट है कि कांग्रेस के दिवंगत पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई जैसे लोकप्रिय चेहरे की राज्य में कमी है, जिन्हें विभिन्न दलों के लोग और विपक्षी समूहों के आम नेता काफी पसंद करते थे। इससे जहां विपक्ष को नुकसान हो रहा है, वहीं सत्तारूढ़ दल भाजपा को मदद मिल रही है।
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राज्य के पश्चिमी हिस्से में बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद (बीटीसी) में भाजपा की मुख्य सहयोगी यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल (यूपीपीएल) है। हालांकि यूपीपीएल नई पार्टी है, इसके नेता प्रमोद बोरो ने छात्र राजनीति से शक्तिशाली ऑल बोडो स्टूडेंट्स यूनियन (एबीएसयू) के प्रमुख के रूप में दिसंबर, 2020 में राजनीति में आकर बीटीसी चुनाव में हिस्सा लिया, जिसमें यूपीपीएल और भाजपा ने मामूली बहुमत से खंडित जनादेश हासिल किया। बीटीसी चुनाव में लड़ाई बहुत कांटे की थी, लेकिन उन्होंने बीटीसी में पहले से राज कर रहे बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ) को बाहर कर दिया, जो कुछ महीने पहले तक भाजपा के साथ गठबंधन में था। वास्तव में, प्रमोद बोरो ने लगातार बीपीएफ और उसके नेता हाग्रामा मोहिलरी के खिलाफ मजबूत विरोध 

प्रदर्शन का नेतृत्व किया था, जिसमें उन पर भ्रष्टाचार और कुशासन का आरोप लगाया गया था।

उनके साहसी तेवर ने यह सुनिश्चित किया कि जब भाजपा बीटीसी चुनावों के लिए अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत कर कर रही थी, तो उसके साथ ही वह इसके बाद होने वाले विधानसभा चुनावों को भी ध्यान में रखे। राज्य के एक प्रमुख नेता कहते हैं, काउंसिल का चुनाव सेमी फाइनल था और फाइनल तो विधानसभा के चुनाव होंगे। यहां 126 सदस्यीय विधानसभा में से कम से कम 13 सीटें दांव पर हैं। सत्तारूढ़ बीपीएफ के खिलाफ बढ़ते विरोधाभास ने भाजपा को युवा प्रमोद बोरो के साथ गठबंधन करने के लिए बाध्य किया। बीपीएफ की राजनीति में दम नहीं है। यह अभी विपक्ष में है, लेकिन जब सत्ता में था, तो कांग्रेस और भाजपा, दोनों के साथ गठबंधन करता रहा है। इसकी स्थिति स्पष्ट थी कि जो भी पार्टी राज्य में सत्ता में रहेगी, वह उसके साथ गठबंधन करेगा। लेकिन बीपीएफ को अपने पुराने साथी भाजपा द्वारा गठबंधन तोड़ दिए जाने का अनुमान नहीं था, जो बीपीएफ के करीब 18 वर्षों के कामकाज और प्रदर्शन के प्रति बढ़ते असंतोष से वाकिफ थी। लोगों की स्मृति छोटी होती है और असम की नई पीढ़ी के मतदाताओं को उनके बारे में बहुत पता नहीं है। 

हिंदी भाषी पाठकों को असम के इस इलाके महत्व के बारे में बताना जरूरी है। रणनीतिक रूप से यह इलाका भारत के लिए महत्वपूर्ण है-मुख्य राजमार्ग और सड़क और तेल / गैस पाइपलाइनें, जो इस क्षेत्र को शेष भारत से जोड़ती हैं, बीटीसी क्षेत्र से गुजरती हैं। यहां से थोड़ी ही दूरी पर भूटान और बांग्लादेश के साथ हमारी अंतरराष्ट्रीय सीमाएं हैं। यह प्रसिद्ध चिकन नेक के किनारे पर है, जिसे सिलीगुड़ी कॉरिडोर के रूप में जाना जाता है, और जो एनईआर को मुख्य भूमि से जोड़ता है और राज्य के चार जिलों में फैला है। काउंसिल की स्थापना असम की सबसे बड़ी जनजाति बोडो समुदाय की आकांक्षाओं की पूर्ति और 
स्वायत्तता के लिए की गई थी। 

इसकी स्थापना लंबे समय से चली आ रही मांग और आकांक्षाओं की पूर्ति करती है। इसके लिए एक सांविधानिक संशोधन की आवश्यकता थी, जिसकी सिफारिश अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा पूर्व प्रधान न्यायाधीश एमएन वेंकटचेलैया की अध्यक्षता में गठित संविधान समीक्षा आयोग ने की थी। मैं उस उप-समिति में शामिल था, जिसने दिवंगत पूर्णो संगमा के नेतृत्व में पूर्वोत्तर में बदलाव के प्रस्तावों को तैयार किया था। हमने छठी अनुसूची के माध्यम से बोडो समुदाय को विशेष सुरक्षा और सुविधाओं के विस्तार की सिफारिश की, जिसे तरुण गोगोई सरकार ने 2001 में सत्ता में आने के तुरंत बाद स्वीकार किया था, हालांकि कांग्रेस पार्टी ने आधिकारिक तौर पर आयोग का बहिष्कार किया था। और इस तरह क्षेत्र में शांति एवं सद्भावना लाने के एक उपाय के रूप में बीटीसी अस्तित्व में आया। लेकिन बीटीसी के अस्तित्व के बावजूद भय, धमकी और हिंसा बहुत व्यापक थी। कई हमलों और हिंसा के बाद वर्ष 2012 में मुस्लिम एवं बोडो समुदाय के करीब चार लाख लोग राहत शिविरों में रह रहे थे, जिनमें से ज्यादातर अब घर लौट चुके हैं। 

अब जमीनी स्तर पर स्थितियां सुधरने लगी हैं। दरअसल, प्रमोद बोरो ने जीत के तुरंत बाद घोषणा की कि परिषद में नए गठबंधन के चुनाव का मतलब है कि हमारी पहली प्राथमिकता बीपीएफ द्वारा पिछले 17 वर्षों में किए गए नुकसान को ठीक करना है। एक अंग्रेजी दैनिक के मुताबिक, नए मुख्य कार्यकारी सदस्य (काउंसिल का शीर्ष पद) ने घोषणा की कि नई सरकार इस क्षेत्र में भय के युग का अंत करेगी और शांति, समृद्धि, मित्रता और भाईचारे के युग में प्रवेश करेगी। उन्होंने यह भी कहा कि इस क्षेत्र में रहने वाले 2.40 लाख बेघरों को पेयजल और अच्छी गुणवत्ता वाली सड़कों के अलावा घर दिए जाएंगे। बीटीसी क्षेत्र में यूपीपीएल द्वारा अच्छा प्रदर्शन इस जटिल और चुनौतीपूर्ण राज्य में भाजपा को बहुमत दिलाने में मददगार होगा।

(-पूर्वोत्तर मामलों के विशेषज्ञ एवं वरिष्ठ पत्रकार) 

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