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रोजगार के लिए मोदी पर दोष क्यों?
बिंदु डालमिया
Updated Wed, 29 Aug 2018 06:40 PM IST
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रियल एस्टेट
मतदाताओं को लुभाने का मौसम आ चुका है। आरोप लगाया जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वायदे के अनुसार हर वर्ष दो करोड़ नौकरियां नहीं दीं। लिहाजा वह अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरे। वर्ष 2019 के चुनावों में रोजगार सृजन बड़ा चुनावी मुद्दा बनने जा रहा है। जबकि हकीकत यह है कि मोदी लगातार इसके लिए कोशिश करते रहे। अब जबकि वह अर्थव्यवस्था को काफी हद तक पटरी पर ले आए हैं। नौकरियों की बहार आनी भी तय है।
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यूपीए का दावा है कि उसने एनडीए के लिए फली-फूली अर्थव्यवस्था छोड़ी थी, जो पहले 8.87 फीसदी से बढ़कर 9.5 फीसदी तक पहुंच चुकी थी। हालांकि यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि यह उछाल 2004 से 2008 के बीच आया था। यह वैश्विक मंदी से पहले का समय था। चीन इस दौरान दुनिया में सर्वाधिक 10.5 फीसदी की दर हासिल कर चकित कर रहा था। फिर वर्ष 2007-08 में आई जबरदस्त मंदी ने इस गुब्बारे को फोड़ दिया। हर देश पर असर पड़ा। भारत भी अछूता नहीं रहा। एनएससी ने पिछले दिनों जो रिपोर्ट जारी की है, उसके परिप्रेक्ष्य में नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार कहते हैं, '2009-2011 और इससे पहले के साल में उच्च विकास दर दरअसल एक छलावा थी, जो देश को वित्तीय घाटे और जमकर कर्जे बांटकर हासिल की गई थी।'
वैसे नीति निर्धारक एक सीमा तक ही अर्थव्यवस्था को माइक्रो मैनेज कर सकते हैं। अभी जो हालात दुनिया भर में हैं, उसका असर रोजगार पर भी पड़ा है। ट्रंप की संरक्षणवादी नीतियों के चलते कच्चे तेल के दाम बढ़े। भूराजनीतिक तनाव बढ़ा। साथ ही सुप्रीम कोर्ट के लगातार दखल ने बाजार की सेहत पर असर डाला, जिसका असर रोजगार सृजन पर पड़ा।
दो वर्ष पहले जो संरचनात्मक सुधार लागू किए गए, उससे बहुत मुश्किल से मोदी की सरकार कठिन हालात से सामान्य स्थिति की ओर लौटी है। अब स्थितियां सुधर रही हैं। नोटबंदी के चलते आखिरकार टैक्स बढ़ा। आयकर रिटर्न भरने वालों की संख्या 2013-14 के 3.79 करोड़ से बढ़कर 2017-18 में 6.86 करोड़ हो गई। हालांकि जीडीपी में एक फीसदी की कमी का असर इस दौरान रोजगार सृजन पर भी पड़ा।
कोई भी सरकार इतनी समर्थ नहीं होती कि हर किसी के लिए नौकरियां सृजित कर सके, जबकि मौजूदा सरकार ने हर संभव कोशिश की। पूंजीवादी देशों में रोजगार देने का काम निजी क्षेत्र करता है, जबकि हमारी सरकार ने स्टार्टअप और स्वरोजगार में मदद देकर काफी काम किया। ईपीएफओ के आंकड़े कहते हैं कि पिछले छह महीने में छह लाख नौकरियां सृजित हुईं। औपचारिक सेक्टर में 70 लाख रोजगार बने, जो कुल नौकरियों का 80 फीसदी है।
आइए, कुछ उन क्षेत्रों की ओर देखते हैं, जो सबसे ज्यादा रोजगार देते रहे हैं। रियल एस्टेट सेक्टर असल में विकास और रोजगार का असली वाहक है। यह कम से कम दो सौ उद्योगों को ऑक्सीजन देता है। एक दशक पहले वैश्विक अर्थव्यवस्था के संकट में आने और नोटबंदी के बाद इस उद्योग को पटरी पर लौटना है। बड़े पैमाने पर बिल्डर्स का कहना है कि वे खुद कर्ज में डूबे हैं, जिससे उनके तमाम प्रोजेक्ट लटके हुए हैं। उनके पास इतने फंड नहीं हैं और न ही बैंक लोन दे रहे हैं। हालांकि सरकार और निजी क्षेत्र द्वारा बनाए जा रहे अफोर्डेबल हाउसिंग क्षेत्र में जबरदस्त सफलता नजर आ रही है। उम्मीद है यह सेक्टर 2019 के वित्तीय वर्ष से गति पकड़ेगा।
अब उड्डयन सेक्टर की बात। बेशक इस सेक्टर में यात्रियों का ट्रैफिक 21 फीसदी बढ़ा है। लेकिन जबरदस्त प्रतिस्पर्धा से यह सेक्टर किराया नहीं बढ़ा पा रहा। सरकारी एयर इंडिया करीब 52,000 करोड़ रुपये के घाटे में है। कोई इसे खरीदने को तैयार नहीं। देश की दूसरी सबसे बड़ी प्राइवेट एयरलाइंस जेट एयरवेज फिलहाल 1,040 करोड़ रुपये के घाटे में है। इंडिगो का मार्केट शेयर 40 फीसदी है, लेकिन उसका मुनाफा भी सिकुड़ रहा है। भारतीय उड्डयन सेक्टर 2.2 लाख लोगों को सीधे रोजगार देता है, इसके अलावा उन लाखों लोगों को अप्रत्यक्ष रोजगार देता है, जो उद्योग इससे जुड़े हैं। अगर एयरलाइंस को घाटा होता है, तो इस अप्रत्यक्ष रोजगार पर भी असर दिखने लगता है।
टेलीकॉम सेक्टर पर भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं। एयरटेल, वोडाफोन और आइडिया जैसे पुराने खिलाड़ी रिलायंस जियो के चलते दाम घटाने पर मजबूर हैं। मार्च 2018 तक ये ऑपरेटर 4.8 खरब रुपये के घाटे में हैं। टेलीकॉम सेक्टर देश की जीडीपी में सात फीसदी का योगदान करता है। देश के 40 लाख लोगों को रोजगार देता है। राजस्व कम होने से यहां भी असर पड़ रहा है। आधा दर्जन बिजली कंपनियां 55,000 करोड़ रुपये के घाटे में हैं। बैंकों की हालत पतली है। अगर नीतियों में बदलाव नहीं आया, तो इन सेक्टर्स में भी नौकरियों पर बड़े पैमाने पर असर होगा। राष्ट्रीयकृत बैंक सबसे ज्यादा रोजगार सृजित करते हैं, लेकिन यूपीए सरकार के समय में छोड़े गए एनपीए घाटे से 19 राष्ट्रीयकृत बैंकों को पिछले वित्तीय वर्ष में 33 फीसदी नुकसान हुआ है।
हालांकि इस खस्ताहाल जॉब मार्केट के बीच सीईओ पोल ने सुनिश्चित किया कि भारतीय उद्योग जगत का भरोसा अब भी मोदी सरकार पर है। 50 फीसदी लोग अब तक हुए आर्थिक विकास को बेहतर मान रहे हैं। इससे निष्कर्ष निकलता है कि चुनाव से ठीक एक साल पहले लोगों का विश्वास फिर मोदी सरकार के साथ है। जीडीपी विकास दर 7.5 फीसदी के साथ फिर पटरी पर लौट आई है। मांग बढ़ने लगी है। विनिर्माण, खुदरा, आटो, एफएमसीजी, मीडिया और मनोरंजन, कम लागत वाले आवास, शिक्षा, हॉस्पिटैलिटी और आईटी के साथ नॉलेज सेक्टर में फिर से भर्तियां शुरू हो गई हैं। अंदाजा है कि ये सेक्टर्स 2018-22 के बीच 1.30 करोड़ लोगों को रोजगार देंगे। मोदी को मालूम है कि रोजगार के लिए क्या करना है। उन्होंने वर्ष 2014 में एक कठिन लक्ष्य खुद के लिए तय किया था। अब वह उस ओर बढ़ रहे हैं।