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कौन जीतेगा दिल्ली की जंग

Sun, 26 Jul 2015 08:02 PM IST
अभय कुमार दुबे
अभय कुमार दुबे Updated Sun, 26 Jul 2015 08:02 PM IST
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Who will win war of delhi

दिल्ली की राजनीति में फरवरी के महीने से जो हो रहा है, वैसा संभवत: इस देश में पहले कभी नहीं हुआ होगा। सत्तर में से सड़सठ सीटों का जनादेश भी इतना अभूतपूर्व था कि आज भी अवास्तविक जैसा लगता है। यही नहीं, उसके बाद से एक चुनी हुई सरकार और केंद्र द्वारा नियुक्त दो अधिकारियों (उपराज्यपाल और पुलिस कमिश्नर) के बीच चल रही जद्दोजहद भी उतनी ही अवास्तविक और अभूतपूर्व है। केजरीवाल सरकार द्वारा दिल्ली महिला आयोग के अध्यक्ष की नियुक्ति पर आपत्ति करते हुए उपराज्यपाल ने यह दावा कर, कि वही 'दिल्ली की सरकार हैं', इस संघर्ष को एक अकल्पनीय किस्म के मुकाम तक पहुंचा दिया है। क्या उपराज्यपाल केंद्रीय गृह मंत्रालय या प्रधानमंत्री कार्यालय की तरफ से शह न मिलने की स्थिति में ऐसा दावा कर सकते हैं? इस दावे से पहले यह टकराव दिल्ली नामक राष्ट्रीय राजधानी परिक्षेत्र में प्रशासनिक अधिकारों के बंटवारे से जुड़े विवाद के रूप में था, जिसकी कानूनी और सांविधानिक व्याख्याएं की जा रही थीं। लेकिन, अब उपराज्यपाल ने खुद को 'सरकार' कहकर इस मसले को वह राजनीतिक रूप दे दिया है, जिसकी अरविंद केजरीवाल को शुरू से ही प्रतीक्षा थी। एक तरह से उपराज्यपाल अति उत्साह में केजरीवाल के हाथों में खेल गए हैं। इसीलिए उपराज्यपाल का पत्र हाथ में आते ही उन्होंने पत्रकारों से कहा कि भाजपा वालों को पता ही नहीं है कि यह खेल क्या है।

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संसदीय राजनीति की मामूली-सी जानकारी रखने वाला व्यक्ति भी जानता है कि दिल्ली की विधानसभा के अधिकार कितने भी सीमित हों, चुनी हुई सरकार ही शासन का मुख्य चेहरा हो सकती है। एक राज्य के रूप में सीमित होते हुए भी दिल्ली की राजनीतिक अहमियत किसी पूर्ण राज्य से कम नहीं है। दिल्ली भले पूर्ण राज्य न हो, पर अंतत: वह उस व्यापक संघीय प्रणाली का ही एक अहम हिस्सा है, जिसके जरिये केंद्र और राज्यों के संबंध परिभाषित होते हैं। ऐसा न होता, तो दिल्ली के मुख्यमंत्री को पहले की भांति मुख्य कार्यकारी पार्षद ही कहा जाता। दरअसल, दिल्ली की सांविधानिक स्थिति कुछ ऐसी है कि उसमें पूर्ण राज्यों के विपरीत मुख्यमंत्री के ही नहीं, उपराज्यपाल के भी हाथ बंधे हुए हैं। ये दोनों तभी काम कर सकते हैं, जब उनमें परस्पर तालमेल हो। फरवरी के चुनावी नतीजों के बाद यह तालमेल बन सकता था, बशर्ते उपराज्यपाल खुद को सरकार बताने की इच्छा से ग्रस्त न होते। कुछ दिनों तो उन्होंने संयम रखा, पर आखिरकार उनकी यह कामना सामने आ ही गई। परिणामस्वरूप यह संघर्ष अब केंद्र-राज्य संबंधों का विवाद बनने की तरफ बढ़ गया है। जदयू, माकपा और अपनी आलोचना का स्वर कायम रखते हुए कांग्रेस इस मुद्दे पर अरविंद केजरीवाल के साथ खड़ी है। यह एक ऐसा मुद्दा है, जिस पर क्षेत्रीय ताकतें किसी कीमत पर केंद्र सरकार का साथ नहीं दे सकतीं। अगर दिल्ली में केंद्र-राज्य संबंध का यह विवाद और बढ़ता है, तो उसका असर लाजिमी तौर से पूरे देश में पड़ेगा और भाजपा की केंद्र सरकार के प्रति क्षेत्रीय शक्तियां और शंकित हो जाएंगी।
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केजरीवाल की शुरू से रणनीति यह थी कि वह अपने दिए हुए अधिकारों की सीमा में रहते हुए दो लक्ष्य भेदने का प्रयास करेंगे। पहला, उनके पास जो अधिकार हैं, उनके उपभोग में केंद्र और उपराज्यपाल की तरफ से किसी तरह की रोकटोक के अंदेशे को निरस्त करना। वह जानते थे कि दिल्ली के पहले मुख्यमंत्री ब्रह्मप्रकाश समेत मदनलाल खुराना, साहिब सिंह वर्मा और शीला दीक्षित बार-बार गृह मंत्रालय के सामने यह गुहार लेकर जाते रहे हैं कि उपराज्यपाल की संस्था उन्हें सरकार नहीं चलाने दे रही है। केजरीवाल के ऊपर कोई आलाकमान नहीं है। वह अपने आलाकमान स्वयं हैं, और उनकी शख्सियत ऐसी नहीं है कि वह रोज केंद्र के सामने हाथ बांधे खड़े रहें। केजरीवाल की रणनीति का दूसरा पहलू यह था कि अपने अधिकारों की सीमा का कोई प्रकट उल्लंघन किए बिना किसी तरह उनका दायरा अधिकतम रूप से विस्तृत किया जाए। अगर वह ये दोनों काम कर पाते, तो पूर्ण राज्य का दर्जा मिले बिना ही वह दिल्ली के पहले वास्तविक मुख्यमंत्री बन जाते। भाजपा की केंद्र सरकार उनकी इसी उपलब्धि में रोड़े अटका रही है।
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हो सकता है कि केजरीवाल यह लड़ाई पूरी तरह से न जीत पाएं। लेकिन, अभी तक की जो स्थिति है, उसमें वह अपने जनाधार में अपने प्रति हमदर्दी पैदा करने में सफल रहे हैं। उन्हें वोट देने वालों के बहुत बड़े हिस्से को लग रहा है कि चुनी हुई सरकार को काम नहीं करने दिया जा रहा। दिल्ली के बजट में प्रचार-प्रसार के लिए रखी गई 526 करोड़ की भारी रकम कितनी भी आपत्तिजनक क्यों न लगे, और प्रचार में एक व्यक्ति के महिमामंडन की गंध कितनी भी क्यों न आती रहे, केजरीवाल की सरकार देश में अकेली है, जिसने केंद्र के खिलाफ जबर्दस्त मुहिम छेड़ रखी है। ऐसा करके वह भाजपा की सरकार के अंतर्विरोधों को भी छेड़ रहे हैं। वह बताना चाहते हैं कि दिल्ली सरकार को नखदंतविहीन करने के लिए प्रधानमंत्री दफ्तर ने गृह मंत्रालय को भी पीछे कर दिया है।


दिल्ली उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में केंद्रीय गृह मंत्रालय की अधिसूचनाओं के सिलसिले में इस समय दो मामले विचाराधीन हैं। इन पर फैसला अगस्त में आएगा, जिससे तय होगा कि दिल्ली में ऊंट केजरीवाल की तरफ करवट लेगा या उपराज्यपाल की तरफ। क्या तब यह टकराव थमेगा? अगर यह वास्तव में नरेंद्र मोदी बनाम अरविंद केजरीवाल का मुद्दा है, तो यह निश्चय ही थमने के बजाय कोई ऐसा नया रूप ले लेगा, जिसके बारे में आज कोई कयास नहीं लगाया जा सकता।

-लेखक सीएसडीएस में भारतीय भाषा कार्यक्रम के निदेशक हैं

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