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कौन देगा उन्हें दिलासा

Sun, 21 Dec 2014 05:06 PM IST
ओवैस तौहीद
ओवैस तौहीद Updated Sun, 21 Dec 2014 05:06 PM IST
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Who will gave them console

जाड़े का सूरज अस्त होने की कगार पर था, और जमीन पर बैठा बूढ़ा शख्स सुस्त नजरों से लोगों को निहारता हुआ दुआ में अपने हाथ्ा उठाए इस इंतजार में बैठा था, कि कोई आकर उसे दिलासा दे। आखिर उसका बेटा मरा है।

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आसमान में घिरता अंधेरा उसे यूं मालूम हो रहा था, मानों वह उसकी जिंदगी पर छा रहा हो। आग से निकलती कोयले की राख उसके आंसुओं में मिलकर उसके चेहरे पर उसके दर्द की कहानी बयां कर रही थी। यह बूढ़ा शख्स औरंगजेब है, जिसका पंद्रह साल का बेटा हसन जेब उस खूनी मंगलवार को अपने छोटे भाई मूसा जेब के साथ घर से निकला था आर्मी पब्लिक स्कूल जाने के लिए, मगर लौट कर वापस नहीं आया।
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आवाज में दर्द लिए औरंगजेब कहता है, 'अभी कल की बात लगती है, जब स्कूल के पहले दिन मैं अपने बेटे को छोड़ने गया था, और आज अपने उसी बेटे को अपने हाथों से दफना के आया हूं।' उस खौफनाक दिन सुबह की इबादत के बाद हसन जेब दसवीं कक्षा के अपने साथियों के साथ ऑडिटोरियम और उसका छोटा भाई मूसा अपनी कक्षा में चला गया। यह ऑडिटोरियम ही तालिबान के कहर का गवाह बना, जिसमें 132 विद्यार्थी और नौ स्टाफ के लोग मारे गए। दरवाजों और खिड़कियों पर गोलियों और खून के निशान सारी कहानी बयां कर रहे थे।
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हसन के भाई मूसा ने अपनी कक्षा की खिड़की से तालिबानी आतंकवादियों को स्कूल में दाखिल होते देखा था। वह बताता है, 'कुछ ही सेकेंडों में उन्होंने बंदूकों और हथगोलों की बौछार शुरू कर दी। हमारे टीचर ने चिल्लाकर हमें जमीन पर लेटकर कुरान का उच्चारण करने को बोला। और मैंने ऐसा ही किया। दो घंटे बाद जब मूसा बाहर आया तो उसने पूरे स्कूल को लाशों से पटा हुआ पाया। मूसा बताता है कि 'मुझे नहीं पता था कि मेरा भाई ऑडिटोरियम में था। जब मैं घर आया तो मैंने उसे शांति से लेटा हुआ देखा। उसे स्कूल की यूनिफॉर्म नहीं, बल्कि कफन घेरे था।' आठवीं का एक दूसरा छात्र अनस खान भी ऑडिटोरियम में मौजूद था, हालांकि किस्मत उस पर मेहरबान थी। वह घायल है, और फिलहाल अस्पताल में है। वह बताता है, 'वे चिल्ला रहे थे, 'अल्ला ओ अकबर', और पश्तो में बोल रहे थे कि किसी को बख्शा नहीं जाएगा। मैं डेस्क के नीचे चुपचाप लेट गया। चारों ओर मेरे दोस्तों की लाशें गिर रही थीं, जिनके सिर में गोली मारी जा रही थी। एक गोली मेरी बांह में लगी। मैं दर्द से तड़प गया। मैंने अपनी टाई को अपने मुंह में ठूंस लिया, ताकि आवाज न निकले। '


अब औरंगजेब अपने बेटे की कब्र के पास बैठे रहना चाहता है। हसन की मां उसकी यूनिफॉर्म को सीने से हटा नहीं रही है, और मूसा अपने भाई के प्यारे तोते को खिलाना चाहता है, मगर वह कुछ नहीं खाता। यह सब देख कर मुझे अपने पिता की कब्र याद आ गई। मेरी मां मुझे दिलासा देते हुए कहती थीं कि जो हमसे दूर चले जाते हैं, उन्हें स्वर्ग नसीब होता है, और वे तारे बन जाते हैं। मेरे लिए यह दिलासा तब भी बेअसर था, और आज भी है।
 
डॉन.कॉम के अपने ब्लॉग में

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