{"_id":"615a9424-dcb1-11e2-8462-d4ae52bc57c2","slug":"who-was-listening-to-bell-of-danger","type":"story","status":"publish","title_hn":"खतरे की घंटी सुन कौन रहा था!","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया ","slug":"opinion"}}
खतरे की घंटी सुन कौन रहा था!
पुष्पेश पंत
Updated Mon, 24 Jun 2013 03:05 PM IST
विज्ञापन
उत्तराखंड पर जिस तरह प्रकृति के कोप का कहर टूटा है, उसने सारे देश को स्तब्ध और शोक-संतप्त कर दिया है। इस सदमे से उबरने में पहाड़ी राज्य को बहुत समय लगेगा। दर्दभरी यादें हताहतों की आने वाली पीढ़ियों को सालती रहेंगी। जान बचाने, राहत और पुनर्वास के अभियान महीनों तक प्राथमिकता में बने रहेंगे।
विज्ञापन
तब तक मीडिया की नजर अन्य ‘विस्फोटक’ सुर्खी की तरफ मुड़ चुकी होगी और इस हादसे की जिम्मेदारी-जवाबदेही के सवाल हाशिये से परे धकेले जा चुके होंगे। ऐसे में जरूरी है कि इस मातमी घड़ी में भी हम बिना आपा खोये, उन लोगों का गिरेबान पकड़ लें और उन्हें मुंह छिपाने का मौका न दें, जो खुद को हमारा नेता कहते सीना चौड़ा करते फिरते हैं और इस सिद्धांत का प्रतिपादन करते रहे हैं कि जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि सर्वशक्तिमान-संप्रभु होते हैं, उनसे कुछ पूछने का अधिकार जनता को नहीं है।
विज्ञापन
मौजूदा मुख्यमंत्री ने संवेदनहीनता तथा वाणी के संयम या पद की मर्यादा के निर्वाह में असमर्थता के नए कीर्तिमान स्थापित कर दिए हैं। जब बख्शीश में जागीर हाथ लगी हो या सल्तनत-ए-मुगलिया के खस्ताहाल दिनों की तरह परगना नीलामी में हथियाया गया हो, तब यह उम्मीद करना बेकार है कि नीति निर्धारण जनहित में होगा। पर व्यक्ति विशेष को दोष देना व्यर्थ है।
विज्ञापन
विडंबना यह है कि इस जल प्रलय के पहले कांग्रेस और भाजपा के नेता कंधे से कंधा मिला यह मांग कर रहे थे कि गंगोत्री-गोमुख वाले क्षेत्र को अति संवेदनशील पारिस्थितिकी वाला घोषित कर वहां विकास कार्य को प्रतिबंधित करने वाले पर्यावरण मंत्रालय के आदेश को निरस्त किया जाए! आज भी बहुगुणा हों या खंडूरी, यह तोतारटंत जारी रखे हैं कि वे पर्यावरण के विरुद्ध नहीं हैं, पर विकास रोका नहीं जा सकता।
अंग्रेजी के एक चालू मुहावरे को उधार लें, तो यह समझने के लिए रॉकेट वैज्ञानिक होना जरूरी नहीं कि केदारनाथ और चारधाम यात्रा के अन्य मुकामों की तबाही अंधाधुंध तीर्थाटन-पर्यटन व्यवसाय के विस्तार से जुड़ी है। प्रदेश के मुख्यमंत्री का कहना है कि इन इलाकों में रहने वाले पहाड़ियों की रोजी-रोटी का यही एक जरिया है। जो जमीनी हकीकत से परिचित है, वह जानता है कि इस व्यवसाय से मालामाल होने वाले कौन हैं।
मैदानी टूर ऑपरेटर ही मलाई से ले कर छांछ तक चट कर जाते हैं। यदि इसका सहस्रांश भी उत्तराखंडवासियों के हिस्से पड़ रहा होता, तो ये इलाके पलायन से वीरान न होते। ‘जनतांत्रिक’ राजनीतिक दबाव में विकास को पर्याय बना दिया गया है अनियोजित नगरीकरण का, अपने समर्थक ठेकेदारों को लाभ पहुंचाने के लिए भवन-पुल-सड़क-बांध निर्माण का। पिछले दशक में रुद्रप्रयाग, गुप्तकाशी, चमोली, उत्तरकाशी जैसे खूबसूरत गांवनुमा कस्बे शहर बनने की होड़ में कचरे का ढेर बन सड़कों पर जाम लगाने लगे हैं।
अधिक दूर जाने की जरूरत नहीं, श्रीनगर में एसएसबी का भव्य भवन जो इस बाढ़ की बलि चढ़ गया है, जाने किस अक्लमंद ने रोमन प्रासादों की नकल में नदी की गोदी में बना डाला था। यह बात छिपाई नहीं जा सकती कि जिस विकास को ढाल बना मुख्यमंत्री अपनी लापरवाही पर पर्दा डालना चाहते हैं, उसका लाभ किसे मिला है।
पहाड़ के नाम पर जो विशेष पैकेज खसोटे जाते हैं या रियायतें हासिल की जाती हैं, उनका फायदा देहरादून, हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर तथा नैनीताल के तराई वाले खुशहाल सुगम भूभाग तक ही सीमित रहा है। सड़क यातायात हो या दूर संपर्क अथवा प्राथमिक चिकित्सा सेवाएं, दूर-दराज के इलाकों में इस राज्य के गठन के एक दशक बाद भी सपना ही हैं। यदि ऐसा न होता, तो हजारों हताहत यात्रियों-पर्यटकों को दवा मलहम के लिए सेना तथा अर्धसैनिक दस्तों की दिलेरी पर ही निर्भर नहीं रहना पड़ता।
यह कहना बेमानी है कि यह आपदा अभूतपूर्व थी, इसकी कोई पूर्व सूचना नहीं थी और कोई भी मनुष्य इसका सामना नहीं कर सकता। 1974-75 से निरंतर यह भूभाग, जो देवभूमि कहलाता है, किसी न किसी प्राकृतिक आपदा की चपेट में घायल होता रहा है। अलकनंदा की बाढ़, उत्तरकाशी का भूकंप हो, मालपा में बादल फटना, वर्णावत पर्वत का खिसकना, 2010-11 वाले मानसून की तबाही, ये सब खतरे की घंटिया थीं, जिन्हें अनसुना कर दिया गया।
यह याद दिलाने की जरूरत है कि 2007 में इस राज्य ने जिस आपदा प्रबंधन आयोग का गठन किया था, उसकी शायद एक भी बैठक उद्घाटन के बाद नहीं हुई! इसी राज्य ने सबसे पहले आपदा प्रबंधन मंत्रालय का गठन किया था। निश्चय ही इस बार भी आगामी आपदा से मुकाबला करने के लिए विदेशी अनुभव से सीखने मंत्री-सचिव आदि तत्पर होंगे- सेमिनारों का आयोजन होगा।
यह बात निर्विवाद रूप से सामने आ चुकी है कि मौसम विभाग ने मूसलाधार बारिश की भविष्यवाणी तीन दिन पहले ही कर दी थी। मगर सुनने के लिए कौन था? खुद मुख्यमंत्री उस समय अपने सहयोगी विधायकों की बगावत से उठे बवंडर को शांत करने में व्यस्त थे। हमारा मानना है कि जिस तरह प्लेग की महामारी के बाद आग लगने से लंदन शहर की गंदगी दूर की जा सकी थी, और उस शहर को नई जिंदगी मिली थी, वैसा ही अवसर इस त्रासदी ने उत्तराखंड को दिया है।
खुदगर्ज, कुनबापरस्त, दरबारी राजनेताओं से निजात पाने का, मैदानी भ्रष्टाचारी विकास की मरीचिका से अपना पिंड छुड़ाने का और उस सपने को पुनर्जीवित करने का, जो उत्तराखंड राज्य की स्थापना के वक्त देखा गया था। चुनौती मरम्मत की नहीं, बुनियाद से पुनर्निर्माण की है।