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बच्चों की सुरक्षा किसकी जिम्मेदारी?
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अजय सेतिया
केंद्र और राज्य सरकारों की लापरवाही के कारण भारत में बच्चे असुरक्षित हो गए हैं। कोई दिन ऐसा नहीं बीतता, जब कहीं न कहीं से किसी बच्चे के यौन शोषण, हत्या या उनके साथ क्रूरता की खबर न आती हो। भारत सरकार ने संयुक्त राष्ट्र के प्रोटोकाल के अनुरूप कानून भी बनाए हैं, लेकिन उन कानूनों का न तो प्रचार है, न अनुपालन हो रहा है। जिन्हें कानून का अनुपालन करवाना है, वे खुद इससे अनभिज्ञ हैं। सरकार ने पहले वर्ष 2000 में किशोर न्याय अधिनियम बनाया और फिर उसकी खामियां दूर करते हुए 2016 में नया किशोर न्याय अधिनियम बनाया है। जिस तरह की शिकायतें आ रही हैं, वे मुद्दे 2000 के कानून में भी मौजूद थे।
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गुरुग्राम में महंगी फीस वाले रायन स्कूल में सात साल के बच्चे की हत्या ने सारे देश का ध्यान आकृष्ट किया है। बच्चे की हत्या के बाद स्कूल की जो कमियां सामने आई हैं, उसके लिए स्कूल तो जिम्मेदार है ही, राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग और शिक्षा विभाग भी उतने ही जिम्मेदार हैं, जिन्हें बच्चों के लिए सुरक्षित वातावरण बनाने और कमियों को दूर करवाने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा अधिनियम के अंतर्गत यह जिम्मेदारी दी गई थी कि वे स्कूलों का समय-समय पर निरीक्षण करें और कमियों को दूर करवाएं। जैसे, यह कमी सामने आई कि स्कूल का स्टाफ और कर्मचारी उसी वॉशरूम का इस्तेमाल करते हैं, जिसे बच्चे इस्तेमाल करते हैं। सवाल पैदा होता है कि शिक्षा विभाग ने एनओसी जारी करने से पहले इस कमी को क्यों नहीं देखा था।
किशोर न्याय अधिनियम केे तहत केंद्र और राज्यों के बाल अधिकार संरक्षण आयोगों की जिम्मेदारी बनती है कि वे श्रम विभाग, शिक्षा विभाग, समाज कल्याण विभाग, बाल विभाग, स्वास्थ्य विभाग, यातायात विभाग, गृह विभाग, पुलिस के लिए दिशा-निर्देश तैयार करें कि वे बच्चों की सुरक्षा के लिए किस तरह के मानकों का पालन करें। सरकारी स्कूलों और गैर सरकारी स्कूलों में अभिभावक-अध्यापक संस्थाओं का गठन और संचालन करवाया जाए, ताकि वे उन कमियों को स्कूल प्रशासन और शिक्षा विभाग के सामने रख सकें। इसी तरह बाल गृहों की निगरानी की कमेटियां गठित की जाएं। चार साल पहले हरियाणा के ही एक बाल गृह में बच्चियों के शोषण का मामला सामने आया था। हाल ही में छत्तीसगढ़ में भी बाल गृह में बच्चियों के यौन शोषण का मामला सामने आया था।
सुप्रीम कोर्ट ने बच्चे के पिता की याचिका पर केंद्र सरकार, राज्य सरकार, सीबीएसई और सीबीआई को नोटिस जारी कर सुझाव मांगे हैं, लेकिन राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग और राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग को नोटिस नहीं दिया गया। एनडीए सरकार ने राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग को इतना कमजोर बना दिया है कि सुप्रीम कोर्ट तक का ध्यान भी उसकी तरफ नहीं गया।
किशोर न्याय अधिनियम, 2016 की धारा 75 में कहा गया है कि बच्चा जिसके संरक्षण में होगा, उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी उसी संस्था की होगी। जैसे रायन स्कूल में हुई बच्चे की हत्या के मामले में बच्चे की सुरक्षा की जिम्मेदारी स्कूल की थी। राज्य सरकारों को चाहिए कि स्कूलों को एनओसी जारी करते समय जो फार्म भरवाया जाता है, उसमें अन्य शर्तों के साथ किशोर न्याय अधिनियम की इस धारा का भी उल्लेख किया जाए, ताकि स्कूल सुरक्षा की अपनी जिम्मेदारी को समझे।
-लेखक राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग के पूर्व अध्यक्ष हैं