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नेपाल को कौन भड़का रहा है

Fri, 22 May 2020 07:01 AM IST
Mahendra Ved महेंद्र वेद
Updated Fri, 22 May 2020 07:01 AM IST
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Who is provoking Nepal
india-nepal flag - फोटो : india nepal

समस्याएं-चाहे वे वास्तविक हों या काल्पनिक, नई हों या लंबे समय से उपेक्षित-जटिल हो जाती हैं, तो वे संकट का रूप धर लेती हैं। बयानबाजी करना या आरोप लगाना इनसे निपटने  का तरीका नहीं है। लेकिन भारत-नेपाल रिश्ते में नेपाल के रवैये को देखकर तो यही लगता है।


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भारत को फिलहाल सिक्किम में चीनी सैनिकों के साथ टकराव या उत्तराखंड के सीमावर्ती इलाके पर नेपाल के दावे से निपटने के बजाय कोरोना वायरस से निपटने पर ध्यान केंद्रित करना होगा, लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था का प्रबंधन करना होगा, प्रवासी कामगारों की सुरक्षित घर वापसी सुनिश्चित करने के बारे में सोचना होगा और महामारी से निपटने के लिए दुनिया के साथ जुड़ना होगा।

ऐसे ही, नेपाल को भी बड़े भाई के उकसावे पर भारत से उलझने के बजाय संवेदनशील घरेलू मुद्दों से निपटने पर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए। भारत ने तिब्बत में मानसरोवर जाने वाले तीर्थयात्रियों के लिए छोटे रास्ते के तौर पर एक राजमार्ग का निर्माण किया है। नेपाल का कहना है कि यह सड़क उसके इलाके से गुजरती है।

सिर्फ लिपुलेख और कालापानी ही नहीं, बल्कि काठमांडू की सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे लोगों ने भारत-नेपाल के बीच अन्य विवादित क्षेत्रों का भी हवाला दिया है। इस मुद्दे ने नेपाल के भीतर भारत-विरोधी प्रदर्शनों को तेज कर दिया है। वहां के अखबारों में इससे संबंधित खबरें भरी पड़ी हैं और हिमालयी राष्ट्र में सभी पक्षों द्वारा भारत की तीखी आलोचना की गई है, जिनमें नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी भी शामिल है।

भारत और नेपाल के बीच खुली सीमा है, लेकिन नेपाल में कुछ अतिवादियों ने सीमा पर घेरेबंदी का सुझाव दे डाला है। दोनों देश औपचारिक तौर पर कहते हैं कि वे बात करने के लिए तैयार हैं, पर किसी भी पक्ष ने इसकी तारीख तय नहीं की है।

काफी दिनों तक बचे रहने के बाद अंततः नेपाल में भी कोरोना के 357 पॉजिटिव मामले सामने आए, और दो की मौत हो गई। नेपाल इसके लिए भी भारत को दोषी ठहराया। मई के अंत में उसने कपिलवस्तु जिले की सीमा  सील कर दी। यही नहीं, प्रधानमंत्री के पी ओली ने नेपाल में फैलते संक्रमण के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराया और संसद में कहा कि 'भारत की स्थिति चीन और इटली से भी खतरनाक लगती है।'

ओली ने 'गैरकानूनी तरीके से भारत से आने वाले' स्थानीय प्रतिनिधियों को वायरस फैलाने का जिम्मेदार ठहराया है। और इस तरह उन्होंने घरेलू मुद्दे को भी लपेट लिया। दरअसल काठमांडु कभी भी उन मधेशियों के प्रति सहज नहीं रहा है, जो सीमावर्ती इलाकों में रहते हैं।

ओली ने चाहे चीन का जिक्र भर किया था, लेकिन भारत को मंतव्य समझने में देर न लगी। सेना प्रमुख जनरल एम. एम. नरवाने के नेतृत्व में जिम्मेदार भारतीय पक्ष ने नेपाल पर चीन के इशारे पर सीमा मुद्दे को उछालने का आरोप लगाया है। नेपाल द्वारा जारी 'संशोधित आधिकारिक मानचित्र' का विरोध करते हुए भारत को कहना पड़ा है कि यह 'ऐतिहासिक साक्ष्य और तथ्यों पर आधारित नहीं है।'

दरअसल नेपाल का रवैया सही नहीं। भारत ने 'कूटनीतिक संवाद के लिए सकारात्मक माहौल' बनाने की जिम्मेदारी नेपाल पर डाली है, जबकि नेपाल का कहना है कि नई दिल्ली वार्ता के लिए कोई तारीख तय करने का इच्छुक नहीं है। ओली ने कसम खाई है कि नेपाल 'कालापानी-लिंपियाधुरा-लिपुलेख क्षेत्र' को, जो भारत का हिस्सा है, किसी भी कीमत पर वापस लाएगा।

नेपाल और भारत 1,800 किलोमीटर की खुली सीमा साझा करते हैं। 1816 की सुगौली संधि के आधार पर लिपुलेख दर्रे पर नेपाल अपना दावा जताता है, पर नई दिल्ली इस संधि को अलग तरीके से देखता है। नेपाल लिंपियाधुरा और कालापानी के बेहद रणनीतिक क्षेत्रों पर भी दावा करता है, जबकि भारतीय सैनिक वहां 1962 से ही तैनात हैं। लिपुलेख दर्रा भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह चीन, भारत और नेपाल के त्रिकोणीय जंक्शन पर स्थित भूमि की एक पट्टी है, जहां तीन देशों की सीमाएं मिलती हैं।

यह मुद्दा तब सुर्खियों में आया, जब रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने लिपुलेख दर्रे को मानसरोवर रास्ते से जोड़ने वाली एक नई सड़क का विगत आठ मई को उद्घाटन किया था। नेपाल ने न सिर्फ इसका विरोध किया, बल्कि वह इस क्षेत्र में एक सुरक्षा चौकी स्थापित करने पर भी विचार कर रहा है।

सत्तारूढ़ नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के सांसदों ने 'कालापानी, लिंपियाधुरा, और लिपुलेख' को नेपाल में मिलाने की मांग करते हुए एक विशेष प्रस्ताव पेश किया है। हालांकि काठमांडु में सभी लोग सरकार के रुख से एकमत नहीं हैं। सत्तारूढ़ पार्टी के वरिष्ठ नेता गणेश शाह के मुताबिक, यह कदम भारत और नेपाल के राजनयिक संबंध के लिए एक झटका होगा। फिर भी, उच्चतम स्तर पर भारत के खिलाफ रवैया उग्र है। नेपाल की राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी ने संसद को संबोधित करते हुए दावा किया कि लिंपियाधुरा, कालापानी और लिपुलेख नेपाल के हिस्से हैं' और भारत के साथ मौजूदा विवाद का हल करने के लिए उचित कूटनीतिक उपाय तलाशे जाएंगे।

2016 के बाद से दोनों देशों के संबंधों में कई उतार-चढ़ाव देखने को मिले हैं, जब नेपाल ने भारत पर अपनी निर्भरता कम करनी शुरू कर दी थी। नेपाल पर भारत का लगातार प्रभाव रहा है, पर अब वह तेजी से बीजिंग की तरफ बढ़ रहा है। और यह ओली के कार्यकाल में बढ़ा है।

बेशक यह विवाद नेपाल में भारत-विरोधी भावना को और गहरा करेगा, पर तथ्य यह है कि दोनों देश द्विपक्षीय संबंधों को और नुकसान नहीं पहुंचा सकते। दोनों को सावधानी से आगे बढ़ने की जरूरत है। नेपाल इस बात से नाखुश है कि भारत ने पाम ऑयल के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया है। दुनिया में इसके सबसे बड़े आयातक भारत ने इसे फिर से मलयेशिया से आयात करना शुरू कर दिया है।

हालांकि कुछ समय बाद भारत फिर नेपाल से पाम ऑयल का आयात शुरू कर सकता है। समाधान खोजने के लिए बात करने से बेहतर उपाय नहीं है, हालांकि बातचीत परस्पर सहमति के बिंदुओं पर ही हो सकती है। दोनों देशों में बहुत कुछ समान है : भूगोल, इतिहास, संस्कृति, भाषा और धर्म। फिर भी यदि ये बातचीत से समाधान नहीं निकाल सकते, तो और कौन कर सकता है? (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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