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संघर्ष विराम से किसे फायदा
मारूफ रजा, सामरिक मामलों के जानकार
Updated Sun, 27 May 2018 07:11 PM IST
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कश्मीर के हालात
रमजान के दौरान किए गए 'संघर्ष विराम' से काफी उम्मीदें जताई गई हैं, लेकिन जम्मू के नजदीक नियंत्रण रेखा और अंतरराष्ट्रीय सीमा रेखा पर पाकिस्तान की ओर से गोलाबारी में आई तेजी से किसी तरह का भ्रम नहीं होना चाहिए। इस मोर्चे पर पारंपरिक फायरिंग और सुरक्षा बलों द्वारा की जाने वाली जवाबी कार्रवाई को लेकर कोई 'संघर्ष विराम' नहीं है। संघर्ष विराम की घोषणा घाटी के लिए की गई है।
इसके साथ ही यह समझ लेना चाहिए कि कश्मीर में संघर्ष विराम से आशय अनिवार्यतया 'नीको' (नॉन इनिसिएशन ऑफ कांबेट ऑपरेशन) यानी किसी भी तरह का सैन्य ऑपरेशन शुरू न करने से है। सैन्य शब्दावलियों के उलझाव से बचने के लिए संघर्ष विराम शब्द का प्रयोग किया गया है, ठीक वैसे ही जैसे कश्मीर से संबंधित संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव में जनमत संग्रह शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है, लेकिन कश्मीर मसले पर होने वाले विमर्श में यह बना हुआ है। दरअसल रमजान के महीने में कश्मीर घाटी में की गई यह ताजा पहल दिल्ली और श्रीनगर के राजनीतिक नेतृत्व द्वारा घाटी को अपने नियंत्रण में लेने की शायद एक और कोशिश है। हालांकि ऐसे अनेक कारण नजर आते हैं, जिनसे यह पहल दोषपूर्ण लगती है।
जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने जब इसकी घोषणा तो की, शुरुआत में दिल्ली में इसे लेकर हिचक थी। कश्मीर घाटी के हालात पर नजर रखने वाले किसी भी पर्यवेक्षक के समक्ष स्थिति एकदम साफ थी। मुख्यमंत्री महबूबा और उनकी पार्टी रमजान के महीने में स्थानीय लोगों के प्रति सद्भावना जताना चाहती थी, इसलिए ही उन्होंने 'संघर्ष विराम' की इच्छा जताई, लेकिन रक्षा मंत्री ने 13 मई को आए इस सुझाव को खारिज कर दिया था और कुछ दिन बाद ही इसका समर्थन किया। साफ है कि दिल्ली के नेतृत्व ने अंततः जम्मू-कश्मीर में अपनी सहयोगी पीडीपी के इस राजनीतिक गठबंधन को जीवित रखने के प्रयासों को अनमने ढंग से ही सही तवज्जो दी और संघर्ष विराम पर सहमति जताई। लेकिन इसका नतीजा क्या होगा, इसका अंदाजा कोई भी लगा सकता है।
पाकिस्तान से संचालित युनाइटेड जेहाद काउंसिल के सरगना सैयद सलाहुद्दीन ने, जोकि अब अमेरिका की ओर से घोषित आतंकवादी भी है, बिना संवाद घोषित किए गए संघर्ष विराम और जेलों से कई सौ कश्मीरियों की रिहाई को 'क्रूर मजाक' करार दिया। इससे साफ समझा जा सकता है कि पाकिस्तान इस पहल का मखौल उड़ाने के लिए अपने मोहरों के जरिये घाटी में भ़ड़काने वाली कार्रवाई करेगा। अतीत में ऐसी पहल नाकाम हो चुकी है। वाजपेयी की अगुआई वाली सरकार ने वर्ष 2000 में दो बार ऐसी पहल की थी, लेकिन वह कारगर नहीं रही। पहली बार जुलाई, 2000 में ऐसी कोशिश तब नाकाम हो गई थी, जब हिजबुल मुजाहिदीन ने दिल्ली से संवाद नहीं होने के कारण संघर्ष विराम तोड़ दिया था। इसके बाद नवंबर, 2000 में आतंकवादी गुटों ने इस विचार को तवज्जो नहीं दी और इसके कारण सुरक्षा बलों को नुकसान उठाना पड़ा, क्योंकि उनके हाथ बंधे हुए थे।
हालात पर सुरक्षा बलों की पकड़ काफी मजबूत है, इसलिए वहां आतंकवादियों की उम्र पहले के कुछ वर्ष की तुलना में अब कुछ महीने ही रह गई है, ऐसे में लगता है कि दिल्ली और श्रीनगर, दोनों विचार के मामले में तंग हैं कि आखिर कश्मीर में राजनीतिक स्थिति मजबूत करने के लिए कैसा कदम उठाना चाहिए। अनिवार्य रूप से यह राजनीतिक-सैन्य समस्या है और विगत 25 वर्षों से बार-बार ऐसा हो रहा है कि किसी स्तर पर विचार या फिर घाटी में शांति स्थापित करने के लिए दीर्घकालीन ब्लूप्रिंट का अभाव नजर आता है।
सेना की भूमिका हालात को नियंत्रित करने और राजनीतिक पहलों के अमल तथा सुशासन के लिए आधार बनाने की है। लेकिन राजनेता बार-बार ऐसा करने में नाकाम रहे हैं। दरअसल कश्मीर में जेहाद के मजबूत धार्मिक कथानक को चुनौती देने की कोई कोशिश भी नजर नहीं आती।
घाटी में आज वहाबी इस्लाम का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है। इस्लाम के पवित्र रमजान के महीने में तथाकथित जेहादियों की ओर से जेहाद के नाम पर हिंसक घटनाएं बढ़ सकती हैं। रमजान के संघर्ष विराम का उनके लिए कोई खास मतलब नहीं है। और एक बार भी वे सुरक्षा बलों पर हमला करते हैं, तो उसका माकूल जवाब भी उन्हें मिलेगा, क्योंकि वहां लागू संघर्ष विराम वास्तव में नॉन इनिसिएशन ऑफ कांबेट ऑपरेशन यानी सुरक्षा बल खुद सैन्य ऑपरेशन शुरू नहीं करेंगे, मगर यदि उन पर हमला हुआ तो उसका जवाब वे दे सकते हैं।
जमीनी स्तर पर सुरक्षा बलों पर निश्चय ही कुछ उदार रहने का दबाव होगा और इससे सिर्फ आतंकी काडर को ही मजबूती मिलेगी और वे इस संघर्ष विराम का उपयोग अपनी ताकत बढ़ाने में करेंगे। इससे जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद से निपटने के संदर्भ में यह सवाल पूछा जा सकता हैः क्या भारत कश्मीर के संदर्भ में उस स्थिति में आ गया है जहां से उसे नहीं सूझ रहा है कि उसे आतंकवादियों से निपटने के लिए क्या करना चाहिए? और रमजान के बाद क्या स्थिति होगी?
दुर्भाग्य से इसका सबसे बड़ा फायदा आतंकवादी उठाएंगे, क्योंकि कश्मीर का नेतृत्व शांति तो चाहता है, लेकिन राज्य से संबंधित बाकी दूसरे मोर्चों पर बुरी तरह नाकाम साबित हुआ है। सुरक्षा बल' नॉन इनिसिएशन ऑफ कांबेट ऑपरेशन' से बंधे हैं, इस वजह से वे आतंकियों के स्थानीय समर्थकों के खिलाफ भी तब तक कोई कार्रवाई नहीं कर सकते, जब तक कि आतंकी उन पर सीधे हमले न करें।
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इसके साथ ही यह समझ लेना चाहिए कि कश्मीर में संघर्ष विराम से आशय अनिवार्यतया 'नीको' (नॉन इनिसिएशन ऑफ कांबेट ऑपरेशन) यानी किसी भी तरह का सैन्य ऑपरेशन शुरू न करने से है। सैन्य शब्दावलियों के उलझाव से बचने के लिए संघर्ष विराम शब्द का प्रयोग किया गया है, ठीक वैसे ही जैसे कश्मीर से संबंधित संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव में जनमत संग्रह शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है, लेकिन कश्मीर मसले पर होने वाले विमर्श में यह बना हुआ है। दरअसल रमजान के महीने में कश्मीर घाटी में की गई यह ताजा पहल दिल्ली और श्रीनगर के राजनीतिक नेतृत्व द्वारा घाटी को अपने नियंत्रण में लेने की शायद एक और कोशिश है। हालांकि ऐसे अनेक कारण नजर आते हैं, जिनसे यह पहल दोषपूर्ण लगती है।
जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने जब इसकी घोषणा तो की, शुरुआत में दिल्ली में इसे लेकर हिचक थी। कश्मीर घाटी के हालात पर नजर रखने वाले किसी भी पर्यवेक्षक के समक्ष स्थिति एकदम साफ थी। मुख्यमंत्री महबूबा और उनकी पार्टी रमजान के महीने में स्थानीय लोगों के प्रति सद्भावना जताना चाहती थी, इसलिए ही उन्होंने 'संघर्ष विराम' की इच्छा जताई, लेकिन रक्षा मंत्री ने 13 मई को आए इस सुझाव को खारिज कर दिया था और कुछ दिन बाद ही इसका समर्थन किया। साफ है कि दिल्ली के नेतृत्व ने अंततः जम्मू-कश्मीर में अपनी सहयोगी पीडीपी के इस राजनीतिक गठबंधन को जीवित रखने के प्रयासों को अनमने ढंग से ही सही तवज्जो दी और संघर्ष विराम पर सहमति जताई। लेकिन इसका नतीजा क्या होगा, इसका अंदाजा कोई भी लगा सकता है।
पाकिस्तान से संचालित युनाइटेड जेहाद काउंसिल के सरगना सैयद सलाहुद्दीन ने, जोकि अब अमेरिका की ओर से घोषित आतंकवादी भी है, बिना संवाद घोषित किए गए संघर्ष विराम और जेलों से कई सौ कश्मीरियों की रिहाई को 'क्रूर मजाक' करार दिया। इससे साफ समझा जा सकता है कि पाकिस्तान इस पहल का मखौल उड़ाने के लिए अपने मोहरों के जरिये घाटी में भ़ड़काने वाली कार्रवाई करेगा। अतीत में ऐसी पहल नाकाम हो चुकी है। वाजपेयी की अगुआई वाली सरकार ने वर्ष 2000 में दो बार ऐसी पहल की थी, लेकिन वह कारगर नहीं रही। पहली बार जुलाई, 2000 में ऐसी कोशिश तब नाकाम हो गई थी, जब हिजबुल मुजाहिदीन ने दिल्ली से संवाद नहीं होने के कारण संघर्ष विराम तोड़ दिया था। इसके बाद नवंबर, 2000 में आतंकवादी गुटों ने इस विचार को तवज्जो नहीं दी और इसके कारण सुरक्षा बलों को नुकसान उठाना पड़ा, क्योंकि उनके हाथ बंधे हुए थे।
हालात पर सुरक्षा बलों की पकड़ काफी मजबूत है, इसलिए वहां आतंकवादियों की उम्र पहले के कुछ वर्ष की तुलना में अब कुछ महीने ही रह गई है, ऐसे में लगता है कि दिल्ली और श्रीनगर, दोनों विचार के मामले में तंग हैं कि आखिर कश्मीर में राजनीतिक स्थिति मजबूत करने के लिए कैसा कदम उठाना चाहिए। अनिवार्य रूप से यह राजनीतिक-सैन्य समस्या है और विगत 25 वर्षों से बार-बार ऐसा हो रहा है कि किसी स्तर पर विचार या फिर घाटी में शांति स्थापित करने के लिए दीर्घकालीन ब्लूप्रिंट का अभाव नजर आता है।
सेना की भूमिका हालात को नियंत्रित करने और राजनीतिक पहलों के अमल तथा सुशासन के लिए आधार बनाने की है। लेकिन राजनेता बार-बार ऐसा करने में नाकाम रहे हैं। दरअसल कश्मीर में जेहाद के मजबूत धार्मिक कथानक को चुनौती देने की कोई कोशिश भी नजर नहीं आती।
घाटी में आज वहाबी इस्लाम का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है। इस्लाम के पवित्र रमजान के महीने में तथाकथित जेहादियों की ओर से जेहाद के नाम पर हिंसक घटनाएं बढ़ सकती हैं। रमजान के संघर्ष विराम का उनके लिए कोई खास मतलब नहीं है। और एक बार भी वे सुरक्षा बलों पर हमला करते हैं, तो उसका माकूल जवाब भी उन्हें मिलेगा, क्योंकि वहां लागू संघर्ष विराम वास्तव में नॉन इनिसिएशन ऑफ कांबेट ऑपरेशन यानी सुरक्षा बल खुद सैन्य ऑपरेशन शुरू नहीं करेंगे, मगर यदि उन पर हमला हुआ तो उसका जवाब वे दे सकते हैं।
जमीनी स्तर पर सुरक्षा बलों पर निश्चय ही कुछ उदार रहने का दबाव होगा और इससे सिर्फ आतंकी काडर को ही मजबूती मिलेगी और वे इस संघर्ष विराम का उपयोग अपनी ताकत बढ़ाने में करेंगे। इससे जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद से निपटने के संदर्भ में यह सवाल पूछा जा सकता हैः क्या भारत कश्मीर के संदर्भ में उस स्थिति में आ गया है जहां से उसे नहीं सूझ रहा है कि उसे आतंकवादियों से निपटने के लिए क्या करना चाहिए? और रमजान के बाद क्या स्थिति होगी?
दुर्भाग्य से इसका सबसे बड़ा फायदा आतंकवादी उठाएंगे, क्योंकि कश्मीर का नेतृत्व शांति तो चाहता है, लेकिन राज्य से संबंधित बाकी दूसरे मोर्चों पर बुरी तरह नाकाम साबित हुआ है। सुरक्षा बल' नॉन इनिसिएशन ऑफ कांबेट ऑपरेशन' से बंधे हैं, इस वजह से वे आतंकियों के स्थानीय समर्थकों के खिलाफ भी तब तक कोई कार्रवाई नहीं कर सकते, जब तक कि आतंकी उन पर सीधे हमले न करें।