{"_id":"3b413c145837f175cc4a41d1ee59edd8","slug":"while-showing-benefit-left-the-policy-hindi","type":"story","status":"publish","title_hn":"जहां दिखा फायदा, वहां छोड़ा कायदा","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया ","slug":"opinion"}}
जहां दिखा फायदा, वहां छोड़ा कायदा
संजय जोशी
Updated Tue, 23 Sep 2014 07:06 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
सिद्धांत और नैतिकता पर स्वार्थ किस तरह हावी हो गया है, इसे महान लेखक प्रेमचंद इस तरह लिख गए हैं- विचार और व्यवहार में सामंजस्य का न होना ही धूर्तता है, मक्कारी है। जहां दिखा फायदा, वहां छोड़ा कायदा। यह हर काल में नासूर बनकर अपना प्रभाव दिखाता आ रहा है। वर्तमान भी इससे अछूता नहीं है। और रंग बदलने के लिए सिर्फ गिरगिट का उदाहरण देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री करना फैशन-सा हो गया है।
विज्ञापन
रंग बदलने की अति से गिरगिट भी शर्मिंदा होने लगे हैं, उन्हें भी गुस्सा आने लगा है, पर नेताओं को इसका कुछ भी मलाल नहीं है। एक प्रेस कांफ्रेंस में गिरगिट समिति के प्रवक्ता ने बताया कि सिर्फ रंग बदलने के गुण के कारण उनकी तुलना पल-पल रंग बदलने वाले नेताओं से होने लगी है, जो गिरगिट जाति का घोर अपमान है। इसलिए जल्दी ही एक समिति का गठन करके यह सुनिश्चित किया जाएगा कि गिरगिट प्रजाति रंग न बदल कर एकता का परिचय देगी और नेताओं को अपनी गलती का एहसास कराएगी।
विज्ञापन
यह खबर सुनते ही राजनीति में हड़कंप मच गया। गिरगिट प्रजाति अगर ऐसा करेगी, तो नेताओं का अपमान होगा और लोग कहना शुरू कर देंगे, नेता की तरह रंग बदलता है। मगर नेताओं में भी तो एक से एक 'बुद्धिजीवी' भरे पड़े हैं! उनमें से एक, जो इस कला के सूक्ष्म जानकार थे, कहने लगे, यह उनका कॉपीराइट थोड़े ही है। अरे समझो, राजनीति का यह सिद्धांत है कि जिधर हवा का रुख हो, उसी तरफ चलने से मंजिल तक पहुंचने में आसानी होती है। इस प्रतिस्पर्धा के दौर में अपना उल्लू सीधा करने और अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने में महारथ होना जरूरी है।
विज्ञापन
मैं यह सब बेबस होकर सुनता रहा। मुझे लग रहा था कि पूरा वातावरण ही इसकी गिरफ्त में है। दिन दूनी रात चौगुनी की गति से बेईमान फल-फूल रहे हैं। जहां दिखा फायदा, वहां छोड़ा कायदा के अनुयायियों की बड़ी जमात है, जबकि ईमानदार बेचारा खड़ूस की उपाधि पाकर मन मसोसकर अपनी व्यथा के कड़वे घूंट पीने को मजबूर है।