कांग्रेस को कहां ले जाएगा यह इस्तीफा? विरोधी इसे दिखावा और पूर्व नियोजित रणनीति बताते हैं
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इस्तीफा देने से रोकने के तमाम प्रयासों के बावजूद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने लोकसभा चुनाव में अपनी पार्टी की करारी हार की जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उनके विरोधी इसे दिखावा और पूर्व नियोजित रणनीति बताते हैं कि पार्टी फिलहाल एक कामचलाऊ व्यवस्था बनाना चाहती है और फिर कुछ दिनों के बाद उन्हें पद पर वापस लाया जाएगा। जैसे घटनाक्रम सामने आ रहे हैं, उसमें यह कहना मुश्किल है कि कल क्या होगा। लेकिन आज पद छोड़कर राहुल गांधी ने संसदीय लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण जवाबदेही का सिद्धांत को लागू किया है और लोगों का सम्मान जीता है।
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इस्तीफा देने से रोकने के तमाम प्रयासों के बावजूद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने लोकसभा चुनाव में अपनी पार्टी की करारी हार की जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उनके विरोधी इसे दिखावा और पूर्व नियोजित रणनीति बताते हैं कि पार्टी फिलहाल एक कामचलाऊ व्यवस्था बनाना चाहती है और फिर कुछ दिनों के बाद उन्हें पद पर वापस लाया जाएगा। जैसे घटनाक्रम सामने आ रहे हैं, उसमें यह कहना मुश्किल है कि कल क्या होगा। लेकिन आज पद छोड़कर राहुल गांधी ने संसदीय लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण जवाबदेही का सिद्धांत को लागू किया है और लोगों का सम्मान जीता है।
उन्होंने पार्टी से यह भी कहा कि उनकी जगह पर न तो उनकी बहन और न ही उनकी मां को अध्यक्ष बनाया जाना चाहिए। 2019 का चुनावी नतीजा वंशवाद के खिलाफ था, और युवा मतदाताओं ने नरेंद्र मोदी के नामदार बनाम कामदार के अभियान के पक्ष में वोट दिया, बावजूद इसके कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री मोदी की तुलना में बहुत कम उम्र के हैं।
सोनिया गांधी ने भी कहा है कि पार्टी के अगले अध्यक्ष के चयन में उनकी कोई भूमिका नहीं होगी। कम से कम रिकॉर्ड के लिए, कांग्रेस के पहले परिवार ने पिछली सीट पर बैठने का फैसला किया है, जबकि सोनिया गांधी पार्टी की संसदीय दल की अध्यक्ष और प्रियंका वाड्रा एक महासचिव और पूर्वी उत्तर प्रदेश की प्रभारी हैं।
दशकों से पार्टी के साथ सहजीवी संबंध को देखते हुए कहा जा सकता है कि पार्टी को परिवार की जरूरत है और परिवार को कांग्रेस की। नेहरू-गांधी खानदान के साथ कांग्रेस का रिश्ता वैसा ही है, जैसा भाजपा का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ है, एक दूसरे के बगैर उनका अस्तित्व नहीं है।
मौजूदा मामले में सबसे वरिष्ठ महासचिव मोतीलाल वोरा हैं, जो परिवार के प्रति निष्ठावान हैं। लेकिन राहुल गांधी की जगह 90 वर्षीय बुजुर्ग को लाना ठीक नहीं होगा, क्योंकि नरेंद्र मोदी से उनकी तुलना नहीं की जा सकती। वह पार्टी को पुनर्जीवित नहीं कर पाएंगे।
सुशील कुमार शिंदे, मल्लिकार्जुन खड़गे और अशोक गहलोत के नाम पर भी विचार किया जा रहा है। जबकि सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य सिंधिया और मुकुल वासनिक जैसे युवा नाम को पार्टी के वरिष्ठ नेता स्वीकार नहीं करेंगे। अखिल भारतीय अपील वाले और पार्टी के बड़े तबके द्वारा स्वीकार्य नामों की पार्टी में कमी है, जो वर्षों से पार्टी के नेतृत्व के पतन का प्रमाण है। कांग्रेस नेताओं ने एक-दूसरे की तुलना में नेतृत्व की भूमिका में नेहरू-गांधी परिवार के सदस्य को ही स्वीकार किया है। लेकिन मौजूदा स्थिति में वैसे करिश्माई चेहरे की जरूरत नहीं है, जो पानी में आग लगा सके।
अभी किसी ऐसे व्यक्ति की जरूरत है, जिसके पास ऊर्जा, गति, विचार, आंतरिक बल और पार्टी को राज्य, जिला और इकाई स्तर पर एकजुट करने का श्रमसाध्य अनुभव हो। कांग्रेस का तात्कालिक कार्य आगामी चुनावी संघर्ष के लिए, जो इस वर्ष अक्तूबर में महाराष्ट्र, झारखंड तथा हरियाणा में होने वाले हैं, पार्टी इकाई को तैयार करना, और जहां जरूरी हों, वहां गठबंधन करना है। चुनावी जीत किसी भी पार्टी के शिथिल मनोबल को बढ़ाती है।
उदाहरण के लिए, शशि थरूर की युवाओं, मध्यवर्ग, महिलाओं, बुद्धिजीवियों के एक वर्ग के बीच अपील है, और वह हिंदी के साथ-साथ अंग्रेजी भी अच्छी तरह बोलते हैं। संसद में नेतृत्वकारी भूमिका में उनका उपयोग किया जाना चाहिए। इसी तरह मनीष तिवारी हैं। इन नामों का उदाहरण दिया जा रहा है। लेकिन अधीर रंजन चौधरी को लोकसभा में पार्टी का नेता बनाया गया, जिनसे ममता बनर्जी चिढ़ती है, जो भाजपा के खिलाफ लड़ाई में कांग्रेस की बेहूद महत्वपूर्ण सहयोगी की भूमिका निभा सकती हैं।
नेहरू को छोड़कर भाजपा ने राष्ट्रीय आंदोलन के सभी नेताओं को तेजी से अपनाया है। दूसरी ओर कांग्रेस के पास न तो गांधी की 150वीं जयंती और न ही स्वतंत्रता की 75वीं वर्षगांठ मनाने के लिए कोई योजना या तैयारी है। भविष्य के प्रति दृष्टिकोण के अलावा भाजपा-संघ परिवार के विचार का विरोध करने के लिए कांग्रेस को भारत के संबंध में अपने विचार को सामने रखने की जरूरत है।
कांग्रेस फैसले लेने की अपनी प्रक्रिया को लोकतांत्रिक स्वरूप दे सकती हैं और एक नए पार्टी अध्यक्ष को चुनने के साथ कांग्रेस कार्यसमिति तथा शीर्ष निर्णय लेने वाली इकाई का वास्तविक चुनाव कर सकती है। पार्टी अध्यक्ष के चुनाव के लिए अगर प्रतिस्पर्धा हो, तो बेहतर होगा। यह एक लोकतांत्रिक कार्य प्रणाली है, जो मरणासन्न पार्टी में नई ऊर्जा भर सकती है और पार्टी को जमीनी स्तर का एक नया नेतृत्व दे सकती है।