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कट्टरता की गुंजाइश कहां

Sun, 07 Jun 2015 05:56 PM IST
रामचंद्र गुहा
रामचंद्र गुहा Updated Sun, 07 Jun 2015 05:56 PM IST
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Where the scope of radicalization

एक लेखक की पहचान इससे होती है कि उसने कितने दुश्मन तैयार किए। इस लिहाज से दिल्ली के अपने एक मित्र की बात सुनकर मुझे काफी उत्सुकता हुई। उनसे मुझे पता चला कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अंग्रेजी मुखपत्र ऑर्गेनाइजर के संपादकीय में मुझ पर तीखे हमले किए गए। मैंने तुरंत इस संपादकीय का ऑनलाइन संस्करण खंगाला। इसमें कहा गया है, 'रामचंद्र गुहा और रोमिला थापर जैसे लोग बात तो 'बदलाव' की करते हैं, मगर हालात के जस का तस बने रहने का फायदा उठाते हैं। यही वे लोग हैं, जिन्होंने बेहद अपमानजनक ढंग से 'भगवाकरण' शब्द को उछाला है। ऐसे लोगों के दुर्भावनापूर्ण इरादों की परवाह न करते हुए शिक्षा को भारतीय यथार्थ से जोड़ने के मुद्दे पर एक निष्पक्ष नजरिया रखे जाने की जरूरत है।'

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यह पढ़कर मैं हैरत में पड़ गया, क्योंकि भगवाकरण शब्द को उछालने में मेरा कोई योगदान नहीं है। उल्टे मैं तो इसको लेकर काफी सतर्क रहता हूं कि संघ परिवार की विचारधारा को 'भगवा' न कहा जाए। मैं इस मामले में दिवंगत यू आर अनंतमूर्ति का अनुसरण करता हूं। उन्होंने भगवा को एक खूबसूरत रंग बताया था, जो पूरे भारतीय इतिहास में शुद्धता और त्याग का प्रतीक बना रहा। अनंतमूर्ति की तरह मैं भी इस रंग पर आरएसएस की मुहर लगाने की बिल्कुल इच्छा नहीं रखता।
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प्रोफेसर थापर और मुझ पर 'दुर्भावनापूर्ण इरादों' का आरोप लगाने के बाद इस संपादकीय में तर्क दिया गया है, 'हमारी सामाजिक-आर्थिक जड़ों को ध्यान में रखते हुए शिक्षा के स्वदेशीकरण के जरिये ही भारत की आबादी को मानव विकास के केंद्र के तौर पर विकसित किया जा सकता है।' सवाल उठता है कि शिक्षा के 'स्वदेशीकरण' का आखिर मतलब क्या है? जैसा कि शिवराम कारंत ने एक बार उल्लेख किया था, 'अगर भारतीय संस्कृति को अखंड माना जाए, तो इस पर चर्चा ही नहीं हो सकती। इसमें इतनी विविधता है कि इसे एक संस्कृति मानने के बजाय 'संस्कृतियां' कहना ज्यादा मुनासिब होगा। भारतीय संस्कृति की जड़ें पुरातन काल तक फैली हुई हैं। विभिन्न जातियों और लोगों के संपर्क से इसका निरंतर विकास हुआ है। भारतीय संस्कृति के घटक इतने ज्यादा हैं, कि पूरे आश्वासन के साथ यह कहना नामुमकिन है कि कौन यहां का मूल निवासी है, और कौन विदेशी है, कौन-सी चीजें प्रेम के साथ स्वीकारी गई हैं, और कौन-सी जबरन थोपी गई हैं। भारतीय संस्कृति को इस तरह से देखने पर पता चलता है कि यहां कट्टर राष्ट्रवाद की तो कोई गुंजाइश ही नहीं है।'
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आरएसएस की वैश्विक दृष्टि कहती है कि जो भी पश्चिमी है, उसे संदेह की नजर से देखो। ऑर्गेनाइजर का संपादकीय अपने खास अंदाज में कहता है कि पश्चिमी मूल्य और शिक्षा पद्धति भारतीय संस्कृति के अनुरूप नहीं हैं। पश्चिम को लेकर इस डर के मद्देनजर मुझे कारंत से भी महान एक भारतीय लेखक की चेतावनी याद आती है। 1908 में प्रकाशित अपने एक निबंध में रवींद्रनाथ टैगोर लिखते हैं, 'अगर पश्चिम के संपर्क से भारत वंचित रहता है, तो वह अपनी पूर्णता की प्राप्ति के लिए जरूरी एक महत्वपूर्ण घटक को खो देगा। देदीप्यमान यूरोप से कुछ रोशनी लेकर हमें समय के पथ पर एक नई शुरुआत करनी चाहिए। यह सोच बिल्कुल ठीक नहीं है कि इस ब्रह्मांड में जो कुछ भी मूल्यवान था, वह सब कुछ तीन हजार वर्ष पहले हमारे पूर्वज खोज चुके हैं। न तो हम इतने दुर्भाग्यशाली हैं, और न ही यह ब्रह्मांड इतना निर्धन है। 'सौ से भी ज्यादा वर्षों के बाद आज टैगोर के दिनों की तुलना में दुनिया ज्यादा जुड़ गई है। आज भारत को न केवल पश्चिम के साथ बल्कि, चीन, जापान, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के साथ भी मजबूत रिश्तों की जरूरत है। इन आपसी रिश्तों में हमें कुछ उनसे मिलेगा, और उन्हें कुछ हमसे। जैसा कि कभी गांधी जी ने (कुछ हद तक टैगोर को जवाब देने की मुद्रा में) कहा था कि हमें खुद को बचाने के साथ-साथ अपने झरोखे भी खुले रखने चाहिए, ताकि पूरी दुनिया से हवा हम तक पहुंच सके।

भारत में स्कूल और कॉलेज के विद्यार्थियों को बाहर और भीतर, दोनों दिशाओं में देखने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। मैं इस मामले में ऑर्गेनाइजर से बिल्कुल सहमत हूं। हां, इतना जरूर है कि सामाजिक-सांस्कृतिक जड़ों को लेकर इसकी तुलना में मेरी समझ ज्यादा समग्र है। मेरे विचार से शिक्षा के भारतीयकरण का ज्यादा रचनात्मक उपाय यह होगा कि किसी स्कूल के पाठ्यक्रम को उसके स्थानीय या क्षेत्रीय आधार पर तैयार किया जाए। विद्यार्थियों को अपने क्लास-रूम से बाहर निकलकर जिले या राज्य के खेतों, वनस्पतियों, जीव-जंतुओं, वनों, जल निकायों, कृषि और शिल्प पद्धतियों को समझने का मौका मिलना चाहिए। उन्हें अपने जिले के पुराने मंदिरों, मस्जिदों, चर्चों, गुरुद्वारों, किलों और आवासीय स्थलों की सूची तैयार करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

अनियोजित आर्थिक विकास का भयावह नतीजा प्राकृतिक पर्यावरण और ऐतिहासिक इमारतों के क्षय के रूप में सामने आया है। ऐसे में, पर्यावरणीय ज्ञान को स्कूली शिक्षा का अभिन्न अंग बना देने से भारत के युवाओं को इस दिशा में ज्यादा जागरूक बनाने में मदद मिल सकेगी।

स्कूलों के विद्यार्थियों को जहां भारत की असाधारण सांस्कृतिक और प्राकृतिक विविधता को समझने की जरूरत है, वहीं, कॉलेज के विद्यार्थियों को उन राजनीतिक चर्चाओं के विभिन्न पक्षों को समझने की जरूरत है, जिन्होंने हमारे गणराज्य को वर्तमान आकार देने में अहम भूमिका निभाई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कहना सही है कि काफी लंबे समय से आधुनिक भारत के इतिहास को कांग्रेस (स्वतंत्रता संग्राम की सबसे प्रमुख पार्टी) के चश्मे से देखा जाता रहा है। मगर कांग्रेस का जो 'भारत' का विचार है, उसे अपने आइकन, मसलन, विनायक दामोदर सावरकर और माधव सदाशिव गोलवलकर के विचारों से प्रतिस्थापित करना भी उतना ही खतरनाक है। ये विचारक भूलवश (कुछ इसे दुर्भावनावश कहेंगे) भारतीय संस्कृति को अखंड मानते हुए इसे तथाकथित तौर पर मूलतः हिंदू प्रधान कहते हैं। अपनी इस विचारधारा के विश्लेषण को इन विचारकों ने अपना विशेषाधिकार माना, और इनके समर्थकों ने इन विचारों को कट्टरता से लागू करने को अपनी जिम्मेदारी समझी।


अच्छी बात यह रही कि भारत में राजनीतिक मत का फलक भाजपा या कांग्रेस की विचारधारा से कहीं ज्यादा व्यापक रहा है। जरा इस संदर्भ में आईआईटी, मद्रास के विद्यार्थियों के समूह पर लगे प्रतिबंध से उपजे हालिया विवाद पर विचार करें। दरअसल, इस समूह ने 'अंबेडकर-पेरियार स्टडी सर्किल' नाम अपना लिया था। इस प्रतिबंध की वजह से अंबेडकर और पेरियार के नाम पर कई स्टडी ग्रुप बन गए हैं। दिलचस्प बात है कि इन दोनों शख्सियतों का पश्चिमी विचारों के प्रति रवैया बेहद खुला था। इसके अलावा ये दोनों ही भारत की विविधतापूर्ण संस्कृति के हिंदू प्रधान वाली एकल विरासत में तब्दील होने के विचार के विरोधी थे। मैं इस मामले में महान समाजशास्त्री मैक्सवेबर से सहमत हूं, जिनके अनुसार, 'विश्वविद्यालयों को यह अनुमति नहीं होनी चाहिए कि वे विद्यार्थियों के दिमाग को किसी खास राजनीतिक या धार्मिक विचारधारा से बांधने की कोशिश करें।' संस्कृति के ये पहरेदार हमेशा से विविधता के लिए चुनौती बनते आए हैं, फिर चाहे वे कभी विश्वविद्यालयी शिक्षा पर छाए वामपंथी हों, या फिर दक्षिणपंथी, जो अब उनकी जगह लेने की फिराक में हैं।

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