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जहाजों के लिए पानी कहां है

Mon, 02 Feb 2015 07:30 PM IST
मनोज मिश्र
मनोज मिश्र Updated Mon, 02 Feb 2015 07:30 PM IST
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Where is the water for ships

जिन्होंने इलाहाबाद का संगम तट देखा है और वहां से कुछ किलोमीटर दूर तक गंगा किनारे बनारस की ओर गए हैं, वे जानते हैं कि नदी में कई स्थानों पर पानी खासा छिछला है। सामान्य दिनों में तो नहीं, लेकिन जब गंगा में पानी घट जाता है, तब स्थानीय नाविकों के लिए नावें चलाना भी आसान नहीं रह जाता। हैरानी की बात है कि ऐसे हालात में भी केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी इलाहाबाद से कोलकाता तक गंगा में पानी का जहाज चलाने का सपना देख रहे हैं।

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हालांकि उनका यह सपना सिर्फ इसी मार्ग तक सीमित नहीं है। उनके मुताबिक देश की 101 नदियों में जलमार्ग विकसित करके सामान की ढुलाई का रास्ता तैयार किया जाएगा। गडकरी का तर्क है कि जब अमेरिका और चीन जैसा देश ऐसा कर सकते हैं, तो भारत क्यों नहीं? वह बाकायदा आंकड़े देकर समझाते हैं कि चीन में 44 फीसदी माल की ढुलाई जलमार्ग से होती है, जबकि भारत में यह आंकड़ा महज 3.3 प्रतिशत है। सुनने में बात तो बहुत अच्छी लगती है, मगर इस परियोजना के नतीजों के बारे में सोचें, तो समझ में आता है कि संकट खासा गंभीर है।
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सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि जब सिंचाई के लिए ही पर्याप्त पानी नहीं है, नहरों में पानी न पहुंचने की खबरें अखबारों के स्थानीय पन्नों पर रोज जगह बनाती हैं और राज्य सरकारें इसके लिए पानी की कम उपलब्धता की आड़ लेती हैं, तो फिर नदियों में इतना पानी आएगा कहां से? पानी प्राकृतिक संपदा है, और यह फैक्टरियों में तैयार नहीं होता। जाहिर है, केंद्र सरकार जलमार्ग को सुगम बनाने के लिए नदियों में उपलब्ध मौजूदा पानी का ही नए सिरे से प्रबंधन करेगी। नदियों में जहां पानी कम है, वहां बहाव के लिए पक्के घाट बनाए जाएंगे और पानी का बहाव क्षेत्र घटाकर जलमार्ग के अनुरूप किया जाएगा। लेकिन इसका नतीजा क्या होगा, इसका शायद अभी केंद्र सरकार ने आकलन नहीं किया है।
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भारत में नदियां करोड़ों लोगों के जीवनयापन का साधन भी हैं। जब बहाव क्षेत्र घटेंगे, नए तटबंध बनेंगे, तो इन करोड़ों लोगों के पेट पर लात पड़ना तय है। विडंबना यह है कि नदियों के उद्धार के नाम पर बनाई जा रही परियोजनाएं भी इन्हीं गरीब लोगों के लिए विनाशकारी साबित होने जा रही है। गंगा के जल को स्वच्छ करने का जो अभियान केंद्र सरकार चला रही है, उससे भला किसी को क्या आपत्ति हो सकती है! लेकिन जो प्रचारित किया जा रहा है, उसके मुताबिक, अभियान के अगले चरण में गंगा के तटों पर शानदार होटल, तैरते हुए रेस्टोरेंट और वाटर स्पोर्ट्स पार्क बनाए जाएंगे। मनोरंजन के ये साधन किसके काम आएंगे, बताने की जरूरत नहीं है। लेकिन यह तो देखना ही होगा कि ये रूपहले सपने किस कीमत पर पूरे होंगे।


आज जरूरत जल प्रबंधन के क्षेत्र में ठोस पहल करने की है। एक अनुमान के मुताबिक, भारत में प्रत्येक साल करीब 40 हजार करोड़ क्यूब मीटर (बीसीएम) वर्षा होती है, पर इसमें से 1,123 बीसीएम का भी हम उपयोग नहीं कर पाते। लिहाजा जल के भंडारण और संरक्षण के लिए ठोस प्रबंध करने की जरूरत है। जब तक पर्याप्त मात्रा में अतिरिक्त जल उपलब्ध न होने लगे, तब तक नदियों के व्यावसायिक उपयोग की कोशिश न हो। इसे करोड़ों परंपरागत उपयोगकर्ताओं के लिए ही रहने दिया जाए।

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