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स्वस्थ बचपन के बिना भविष्य कहां
Wed, 21 Aug 2019 06:04 PM IST
Raman Singh
पत्रलेखा चटर्जी
पत्रलेखा चटर्जी
Published by: Raman Singh
Updated Wed, 21 Aug 2019 06:04 PM IST
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बचपन
- फोटो : a
देश के बच्चे ही देश के भविष्य हैं। लेकिन कटु वास्तविकता यह है कि हम उन पर पर्याप्त निवेश नहीं करते, खासकर उनके प्रारंभिक वर्षों में। जबकि भारत का भविष्य इस बात से जुड़ा है कि हम उनके शुरुआती बचपन के विकास से कैसे निपटते हैं। कनाडाई गायक रफी कैवोकियन कहते हैं, 'जब आप कहानी की शुरुआत पर ध्यान देते हैं, तभी आप पूरी कहानी बदल सकते हैं।'
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प्रारंभिक बचपन का विकास क्या है? सरल शब्दों में कहें, तो यह शिशु के जीवन की शुरुआती अवधि है, खासकर गर्भावस्था से लेकर तीन वर्ष की उम्र तक। यह बेहद महत्वपूर्ण अवधि है। शुरुआती तीन वर्षों के दौरान एक शिशु को न केवल स्वस्थ शारीरिक विकास, बल्कि मस्तिष्क के विकास के लिए भी उचित पोषण, सुरक्षा और प्रोत्साहन की आवश्यकता होती है। बचपन की शुरुआत में पोषण की कमी से न केवल शारीरिक विकास प्रभावित होता है, बल्कि यह बच्चे के मस्तिष्क को भी प्रभावित करता है। एक बच्चे के मस्तिष्क का 80 फीसदी से ज्यादा विकास तीन वर्ष की उम्र में होता है। इसका मतलब है कि बच्चे को शुरुआती तीन साल तक जो पोषण मिलता है, वही उसके मस्तिष्क के विकास और उसके भविष्य के लिए महत्वपूर्ण है। और यही बात मुझे देश के भविष्य के लिए चिंतित करती है कि हम कहां जा रहे हैं।
भारत में पिछले कुछ वर्षों के दौरान हुए कुछ उल्लेखनीय सुधारों के बावजूद उम्र के अनुपात में बौने कद के बच्चे की संख्या बहुत ज्यादा है। ऐसा लंबे समय तक अपर्याप्त पोषक तत्वों के सेवन और बार-बार संक्रमण के कारण होता है। वर्ष 2015-16 में पांच साल से कम उम्र के 38.4 फीसदी बच्चे अपनी उम्र के अनुपात में छोटे कद के थे और 35.8 फीसदी बच्चे कम वजन वाले थे। मानव पूंजी सूचकांक के मामले में भारत 195 देशों की सूची में 158वें पायदान पर है। विश्व बैंक के मुताबिक, 'बचपन में छोटे कद के कारण वयस्क उम्र की ऊंचाई में एक फीसदी की कमी के चलते आर्थिक उत्पादकता में 1.4 फीसदी की कमी आती है।' छोटे कद का भविष्य की पीढ़ियों पर भी असर पड़ता है। वर्ष 2015-16 में देश की आधी से अधिक महिलाओं को एनीमिक (खून की कमी का शिकार) पाया गया। इसका भविष्य में उनके गर्भधारण और बच्चों पर स्थायी प्रभाव पड़ेगा। स्थिति तब और बिगड़ जाती है, जब शिशुओं को ठीक से खाना नहीं दिया जाता है।
भारत की सबसे बड़ी आबादी वाले और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण उत्तर प्रदेश में बाल पोषण की स्थिति क्या है? सच्चाई यह है कि उत्तर प्रदेश बाल कुपोषण की बड़ी चुनौती से जूझ रहा है, जहां करीब 46 फीसदी बच्चे उम्र के अनुपात में छोटे कद के हैं और 40 फीसदी बच्चे कम वजन के हैं। इसके अलावा प्रदेश में सक्रिय आंगनवाड़ी केंद्रों की संख्या भी काफी कम है, जो बच्चों और महिलाओं से संबंधित कुपोषण से निपटने के लिए विभिन्न योजनाओं को लागू करने का काम करते हैं। हाल ही में प्रकाशित एक खबर के मुताबिक, राज्य में कुल स्वीकृत 1.90 लाख आंगनवाड़ी केंद्रों के मुकाबले 1.88 लाख आंगनवाड़ी केंद्र ही सक्रिय हैं और 2,100 से ज्यादा आंगनवाड़ी केंद्र निष्क्रिय हैं।
राज्य सरकार का कहना है कि वह बच्चों से संबंधित बुनियादी ढांचे पर ध्यान केंद्रित कर रही है, लेकिन सरकार ने हाल ही में संसद को यह भी बताया कि उत्तर प्रदेश वर्ष 2017-18 में आंगनवाड़ी केंद्र स्थापित करने के लिए आवंटित धन का लगभग आधा खर्च करने में विफल रहा। वर्ष 2016-17 में 90 करोड़ रुपये खर्च ही नहीं हुए। उत्तर प्रदेश के आठ जिलों में सबसे अधिक बाल कुपोषण है। देश में तीसरे सबसे खराब जिले बदायूं में 52.7 फीसदी बच्चे कम वजन के हैं, जबकि पांचवें स्थान पर शाहजहांपुर जिला है, जहां ऐसे बच्चों की संख्या 51.9 फीसदी है और सातवें नंबर पर जौनपुर जिला है, जहां 51.8 फीसदी बच्चे कम वजन के हैं।
इसका मतलब यह नहीं है कि भविष्य में चीजें बेहतर नहीं हो सकती हैं। इसका मतलब यह है कि चीजें स्वतः बेहतर नहीं होगी। तस्वीर तब तक नहीं बदलेगी, जब तक उत्तर प्रदेश और देश के कहीं के भी अधिकारी यह महसूस न करें कि बच्चों के शुरुआती वर्षों में निवेश करना कितना महत्वपूर्ण है। वस्तुतः बदलाव से संबंधित कोई बड़ी योजना तब तक मूर्त रूप नहीं ले सकती, जब तक मानव संसाधन यानी बच्चों को अपनी पूरी क्षमता का एहसास न हो।
शुरुआती बाल विकास एक वैश्विक मुद्दे के रूप में उभर रहा है। हाल ही में मुझे समोआ में पैसिफिक मीडिया पार्टनरशिप सम्मेलन में बोलने के लिए आमंत्रित किया गया था। वहां खासकर एक सत्र तो बाल विकास के साथ-साथ इसी पर केंद्रित था कि प्रशांत द्वीप समूह के पत्रकारों के लिए इस विषय को कैसे दिलचस्प बनाया जा सकता है। इस छोटे से द्वीप समूह के बहुत से बच्चे छोटे कद के हैं और इसलिए उन्हें जीवन में अपनी पूर्ण क्षमता का एहसास नहीं है।
यह प्रशांत द्वीप की मेरी पहली यात्रा थी। हालांकि भौगोलिक भूभाग बिल्कुल अलग था, लेकिन मैं वहां की कई चुनौतियों, जैसे छोटे कद की समस्या से खुद को जोड़ सकी, क्योंकि भारत भी इस समस्या से जूझ रहा है। परिवारों और नीति-निर्माताओं को यह समझने की जरूरत है कि बच्चों के मस्तिष्क का विकास केवल पोषण पर ही निर्भर नहीं होता, बल्कि खेल पर भी होता है। महज 15 मिनट के खेल से शिशु के मस्तिष्क में हजारों कनेक्शन जुड़ सकते हैं। इसके अलावा हिंसक अनुशासन भी बाल विकास को प्रभावित करता है। भारत समेत कई देशों में हिंसक अनुशासन गैरकानूनी होने के बावजूद चलन में है।
कोई भी देश सिर्फ बातें करने से महाशक्ति नहीं बन सकता है। इसके लिए बच्चों पर निवेश करना बेहद महत्वपूर्ण है। यह समझने की जरूरत है कि छोटे कद के बच्चों का दिमाग पूर्णतः विकसित नहीं होता। इस स्थिति को बदलना होगा। अगर हम अपने बच्चों, अपने भविष्य को महत्व देते हैं, तो एक भारतीय के रूप में हमें इस बात पर सहमत होना पड़ेगा।