जीवन मूल्य कहां से आते हैं?
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हमारे आज के लेखन के मूल में जो सिद्धांत हैं, वे हमारे अपने हैं या पराई वाङ़्मयीन संस्कृति के हैं, इस पर विचार होना चाहिए। अर्थात, क्या वे हमारे अपने साहित्य पर आधारित हैं? उदाहरणार्थ, रोमांटिसिज्म। यह सिद्धांत हमारे कालिदास या गाथासप्तशती पर आधारित है या इंग्लैंड के वर्डस्वर्थ या शेली वगैरह पर आधारित है? मैं समझता हूं कि हमने अपने साहित्य को यूरोप केंद्रित ही बनाए रखा है। इसी कारण हम पराये देश, पराई भाषा और पराये साहित्य में बने मानदंडों को बेहिचक हमारी अपनी भूमि पर निर्मित साहित्य पर चस्पां कर देते हैं। इससे हमारे साहित्य के साथ बहुत बड़ा अन्याय हो रहा है। उपनिवेशवादी प्रवृत्तियों के कारण आज तक हम हमारे अपने ऐसे मानदंड तैयार नहीं कर पाए हैं। इसके लिए आत्मविश्वास की दरकार होती है। अपने देशीय होने का एहसास बुलंद होना आवश्यक होता है।
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हम रियलिज्म, रोमांटिसिज्म से लेकर महाकाव्य तक में उन्हीं के मानदंडों का प्रयोग करते हैं। हम मिल्टन का पैराडाइज लॉस्ट बतौर महाकाव्य पढ़ते हैं। मगर महाभारत पढ़ने के बाद हमें पता चलता है कि असल महाकाव्य होता क्या है। जिस रचना में ऐसे असीम और इतने सारे युग समाते हों, उसी को महाकाव्य का दर्जा देना चाहिए। ऐसे मानदंड हमें स्वयं तैयार करने होंगे। तब जाकर हम दृढ़ता से कह पाएंगे कि अंग्रेजी में महाकाव्य है ही नहीं। असल में दुनिया को महाकाव्य की परिभाषा हम दे सकते हैं। यह अनुचित है कि दुनिया हमें महाकाव्य का सबक दे।
हमारा साहित्य पहले से ही सजग संवेदनाओं से भरा हुआ है। पर हमारे द्वारा उधार ली गई विधाओं के कारण ये संवेदनाएं विकृत हो जाती हैं। आज जब मैं अमीर खुसरो को पढ़ता हूं, तब वह मेरे इतने करीब आता है कि लगता है कि उसमें गहराई में जाने लायक बहुत कुछ है। पर यदि मैं उस पर युरोप केंद्रित सिंबॉलिज्म वगैरह औजारों से सोचता हूं, तो मेरे लिए अपनी सही संवेदनाएं अभिव्यक्त करना भी संभव नहीं होता। खुसरो में हम पूरा युग समय, संस्कृतियां देख सकते हैं। केवल सूफी और भक्ति नहीं, बल्कि इस्लाम का भारतीयता के एक हिस्से के रूप में एकत्रित होना भी अनुभव किया जा सकता है। पर हमारे यहां अमीर खुसरो कभी चर्चा के केंद्र में नहीं होते, क्योंकि हमारी संवेदनाएं ही संकरी हो गई हैं। इसके विपरीत यूरोप केंद्रित लेखक बार-बार चर्चा के केंद्र में आ जाते हैं। यूरोप केंद्रित मानदंडों के कारण हमारा काफी नुकसान हो रहा है।
सरकारी स्कूलों में निचली कक्षाओं में कविता पढ़ाई जाती है : आओ आओ बादल आओ, अपने संग बरखा भी लाओ। यह हमारा एक संस्कृतिपरक मूल्य है, क्योंकि हमारे उष्ण कटिबंधीय प्रदेश में लोगों को बरसात की हमेशा प्रतीक्षा करनी पड़ती है। पर अंग्रेजी स्कूलों में इसके ठीक विपरीत रेन रेन गो अवे पढ़ाया जाता है, क्योंकि युरोप में बारह महीने बरसात ही होती है। इसलिए रेन रेन गो अवे इंग्लैंड के लोग कहें, तो ठीक है, पर हमारे स्कूलों में ऐसा कुछ पढ़ाया जाए, तो उसका असर ठीक नहीं होगा।
संपूर्ण मानव जाति की एक ही मूल्य-व्यवस्था है, ऐसा हम नहीं कह सकते। असम में एक जगह हम लोग गए थे। हमने पाया कि वहां के लोग गाय का दूध नहीं पीते। उनका कहना है कि दूसरे की मां का दूध पीना एक अनिष्ट मूल्य है। हम मुंबई में भैंस का जो दूध पीते हैं, वह नर भैंसों को मारकर ही पीते हैं न! आरे कॉलोनी में नए-नए जन्मे भैंस के बछड़ों को बतौर खाद ट्रकों में भर-भरकर ढोकर ले जाने का ठेका दिया जाता है। अतः गाय-भैंस का दूध पीना पाप है, यह मुझे तब पता चला, जब मैं असम गया था। यह सब देखने के बाद समझ में आता है कि हमारे जो भी मूल्य बने हैं, जरूरी नहीं कि वे सब नैतिक दृष्टि से ठीक ही होंगे। कुछ मूल्य जंगली भी हो सकते हैं। उदाहरणार्थ, राष्ट्रवाद। इसके विपरीत कुछ छोटे-छोटे समाजों के मूल्य अत्यंत मानवतावादी हो सकते हैं।
अंडमान का उदाहरण सटीक है। हमें जितने की जरूरत है, उतना ही लेना वहां के लोगों की प्रकृति है। वहां के लोगों को यदि दो बड़ी और एक छोटी मछली चाहिए होगी, तो दो बड़ी मछलियां मिलने के बाद वे तीसरी बड़ी मछली को नहीं मारेंगे। दिन भर नाव में बैठकर तीसरी छोटी मछली की प्रतीक्षा करेंगे। एक बड़ी मछली बार-बार सामने से गुजरती है, मगर वे उसे मारते नहीं हैं। क्योंकि वह मादा है। उसके पेट में अंडे हैं। गर्भवती मादा को मारना नहीं चाहिए, ऐसा महान विचार हमारी कथित उन्नत संस्कृति में भी नहीं है। हमारे लिए यह विचार अनुकरणीय है। मगर दुर्भाग्य से वे आदिवासी होने के कारण उन्हें पिछड़ा और तुच्छ माना जाता है। संसार के ऐसे कई संस्कृतिपरक मूल्यों की तुलना करने पर हमें दिखाई देगा कि कुछ मूल्य अमानवीय ही होते हैं। पर धार्मिकता, राष्ट्रीयता जैसी फर्जी अवधारणाओं के आधार पर हम उनका ज्यों का त्यों पालन करते हैं। मूल्यों की दृष्टि से हम कुल मिलाकर असहाय हो गए हैं।