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खाद्य सुरक्षा में किसान कहां हैं

Wed, 28 Aug 2013 07:24 PM IST
महक सिंह
महक सिंह Updated Wed, 28 Aug 2013 07:24 PM IST
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where are farmers in food security bill

लोकसभा चुनाव को देखते हुए यूपीए सरकार ने मतदाताओं को लुभाने के लिए खाद्य सुरक्षा विधेयक को लोकसभा से पारित करवा लिया है। यह कानून बन जाने पर गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन करने वाले को मासिक पांच किलो खाद्यान्न यानी तीन रुपये किलो चावल, दो रुपये किलो गेहूं और एक रुपया किलो मोटा अनाज मिलेगा। इससे खाद्यान्न खरीद की मात्रा मौजूदा 5.5 करोड़ टन से बढ़कर 6.2 करोड़ टन तक हो जाएगी और अनुमान है कि खाद्य सब्सिडी 85,000 करोड़ से बढ़कर 1,30,000 करोड़ रुपये तक पहुंच जाएगी। घटती कृषि योग्य भूमि, किसान की जोत का घटता आकार, ग्लोबल वार्मिंग और वनों के अंधाधुंध कटान के कारण कम होती मानसून की वर्षा और बायो डीजल के लिए खाद्यान्न के बढ़ते उपयोग के कारण बढ़ती आबादी के लिए भविष्य में खाद्यान्न संकट पैदा होने की आशंका जताई जा रही है। ग्लोबल हंगर इंडेक्स, 2010 की रिपोर्ट के अनुसार, 122 विकासशील देशों में भारत का स्थान 67वां है। दुनिया के भूखे लोगों में से एक चौथाई भारत में हैं और 47 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं।

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खाद्य सुरक्षा विधेयक में पहले से ही विकसित जिस सार्वजनिक वितरण प्रणाली को आधार बनाया गया है, वह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़कर पहले ही मृतप्राय हो चुकी है। इस पर जमाखोरों, कालाबाजारियों और बेईमान राशन डीलरों का कब्जा है। नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) की जांच रिपोर्ट में यह पाया गया है कि 40 प्रतिशत जरूरतमंदों के राशन कार्ड नहीं बन पाते और 90 प्रतिशत खाद्य सामग्री नियमित रूप से नहीं मिल पाती। इस समय देश की 35 प्रतिशत जनसंख्या सार्वजनिक प्रणाली के अंतर्गत है। कानून बनने पर 67 फीसदी यानी 82 करोड़ जनसंख्या इसके दायरे में आ जाएगी और दोगुने से अधिक राशन काला बाजार की भेंट चढ़ जाएगा। इस विधेयक को लागू करने के लिए वर्तमान भंडारण क्षमता सात करोड़ टन से बढ़कर 11 करोड़ टन से अधिक करनी होगी। यह भी तभी संभव है, जब खुले में अनाज न सड़े और भंडार गृहों में चूहे अपना पेट न भरें। शरद पवार के लोकसभा में दिए गए बयान के मुताबिक, हर साल 30 हजार करोड़ रुपये से अधिक का अनाज सड़ जाता है। यही नहीं, समर्थन मूल्य पर खरीदे गए गेहूं को सड़ाकर 6.20 रुपये प्रति किलो की दर से शराब कंपनियों को बेच दिया जाता है।
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आजादी के समय खाद्यान्न उत्पादन 500 लाख टन था, जो 2012 में 2,500 लाख टन हो गया। लेकिन 1971 से 2011 के बीच शहरीकरण से 33 लाख हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि का क्षेत्रफल कम हो गया है। 85 प्रतिशत लघु व सीमांत किसान की, जिनके पास केवल 44 प्रतिशत भूमि है, जोत का आकार भी कम होता जा रहा है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण पैदावार घटनी प्रारंभ हो गई है। कृषि मंत्रालय के मुताबिक, जलवायु परिवर्तन के कारण वर्ष 2020 तक समय पर बोए गए गेहूं की छह प्रतिशत और देर से बोए गए गेहूं की उपज 18 प्रतिशत तक कम हो सकती है। बढ़ते रसायनों के प्रयोग से भी भूमि की उर्वरता लगातार घट रही है।
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इसमें दो राय नहीं है कि देश की जनसंख्या को भरपेट भोजन के लिए कृषि व्यवस्था को मजबूत कर खाद्यान्न उत्पादन लगातार बढ़ाया जाए। पर देश की जनसंख्या का 55 प्रतिशत खाद्यान्न उत्पादक किसान भी हैं, जो खाद्य सुरक्षा के केंद्रबिंदु है, लेकिन उनके उत्पादों को लाभकारी मूल्य देने के अधिकार का खाद्य सुरक्षा विधेयक में कोई प्रावधान नहीं किया गया है। खेत मजदूरों की कमी एवं उनकी बढ़ती मजदूरी की लागत तथा डीजल, उर्वरक, कीटनाशक, बीज व बिजली के मूल्यों में वृद्धि से खेती महंगी होती जा रही है। आजादी के समय सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान 50 प्रतिशत था, जो 2012 में घटकर 13.9 प्रतिशत रह गया। वित्त मंत्रालय के सर्वेक्षण के अनुसार, 55 प्रतिशत से अधिक किसान बैंकों और साहूकारों के कर्ज तले डूबे हुए हैं, तो नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के अनुसार, 1995 से 2011 तक 2,90,740 किसान आत्महत्या कर चुके हैं। पिछले एक दशक से सालाना लगभग सात लाख किसान खेती से अलग होकर दूसरा धंधा अपना रहे हैं। इसी अवधि में खेतिहर मजदूरों की संख्या 3.5 प्रतिशत बढ़ी है।

खाद्य सुरक्षा विधेयक किसान विरोधी है। इसमें उनकी उपज का 33 प्रतिशत हिस्सा ही समर्थन मूल्य पर खरीदने का प्रावधान है। विधेयक में यह भी प्रावधान है कि खाद्य सुरक्षा कानून बनने के तीन वर्षों तक समर्थन मूल्य नहीं बढ़ाया जाएगा। कुपोषण से बचाव के लिए अनाज के साथ तेल तथा दाल आदि देने की व्यवस्था भी इस कानून में नहीं की गई, जो आवश्यक थी।


खाद्य सुरक्षा कानून बनने पर देश में खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने का दबाव बनेगा। इसके लिए वर्षा आधारित खेती, फसलों के अवशेषों की रिसाइकिलिंग और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बगैर कम खर्चीली, टिकाऊ जैविक खेती को प्रोत्साहन देना होगा। भंडारण व्यवस्था को सुरक्षित करने के साथ प्रत्येक कार्डधारक को एक महीने के बजाय छह महीने का राशन देने से भंडारण पर कम खर्चा आएगा। बाजार व्यवस्था में बदलाव के साथ किसानों के लिए उसकी फसल का लाभकारी मूल्य भी निश्चित करना पड़ेगा, ताकि किसान खेती से विमुख न हो और सम्मानजनक जीवन निर्वाह कर सके। कृषि क्षेत्र में सुधार और किसान सुरक्षा के बगैर खाद्य सुरक्षा का लक्ष्य पूरा नहीं होगा। सरकार यदि समय रहते नहीं जागती, तो किसान ही इस खाद्य सुरक्षा को ध्वस्त कर देंगे।

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