सुधारों का अगला दौर कब
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पच्चीस साल पहले जब भारतीय अर्थव्यवस्था गोते मार रही थी, स्वतंत्र भारत की राजनीति के चाणक्य नरसिंह राव ने आर्थिक सुधारों का बिगुल बजाकर देश को एक नए रास्ते पर ला दिया। उनके विश्वस्त सहयोगी मनमोहन सिंह ने वित्त मंत्रालय को लाइसेंस राज से मुक्त करने का बीड़ा उठाया। वह दौर था उदारीकरण का और उसके बाद जो हुआ, उसकी गवाह दुनिया है। भारतीय अर्थव्यवस्था आज दो खरब डॉलर की है और सबसे तेज रफ्तार से बढ़ रही है। उस समय उद्योगों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने और उन्हें आसानी से अपना काम करने देने की जो प्रक्रिया शुरू हुई, उसकी गूंज सभी दिशाओं में सुनाई दी। इसका ही परिणाम है कि आज भारत को संभावित आर्थिक सुपर पॉवर के रूप में देखा जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) ने तो भारत को इस अंधेरे दौर में रोशनी देने वाला देश माना है। यह कमाल आर्थिक सुधारों और उदारीकरण का है।
लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हो जाती है। अब फिर महसूस किया जा रहा है कि आर्थिक सुधारों की गति धीमी पड़ती जा रही है। नरेंद्र मोदी ने अपने चुनाव प्रचार अभियान के दौरान इन पर बहुत जोर दिया था। उनका कहना था कि सत्ता में आने के बाद उनकी पार्टी सुधारों को जबर्दस्त तरीके से लागू करेगी। उन्होंने शुरुआत की और सबसे पहले सब्सिडी घटाने की दिशा में कदम बढ़ाया। आधार कार्ड के जरिये सब्सिडी देने की व्यवस्था से बड़े पैमाने पर सरकारी पैसे की लूट रुक गई। इसी तरह रसोई गैस पर सब्सिडी कम करने के प्रयास भी रंग लाए। सरकार ने विदेशी निवेश यानी एफडीआई का दायरा बढ़ाने का जो फैसला किया, वह सराहनीय था। अब रक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में भी एफडीआई को मंजूरी मिल चुकी है, जिससे बड़े पैमाने पर विदेशी मुद्रा की बचत तो होगी ही, नए उपकरणों का भारत में ही निर्माण हो सकेगा। इसी तरह बीमा क्षेत्र को खोलने का फैसला भी सराहनीय है। इससे भी देश में बड़े पैमाने पर रोजगार बढ़ने की संभावना है। देश में पुराने श्रम कानूनों को बदलने की मांग काफी समय से हो रही है और एनडीए सरकार ने पांच नए विधेयक लाकर इस दिशा में बड़ा कदम बढ़ाया है। इनके लागू होने के साथ देश में काम करने के परंपरागत तरीके में बदलाव होगा।
लेकिन अभी बड़े पैमाने पर सुधारों की जरूरत है। भूमि अधिग्रहण और जीएसटी (वस्तु एवं सेवा कर) से संबंधित दो महत्वपूर्ण विधेयक अभी अधर में हंै। जीएसटी बिल एक दशक से भी ज्यादा समय से संसद में लंबित है। माना जा रहा है कि यह बिल गेम चेंजर होगा, यानी इससे देश के कारोबार में बढ़ोतरी होगी और व्यापारियों तथा कारखानेदारों को दोहरे कर के बोझ से मुक्ति मिलेगी। इससे अर्थव्यवस्था में पारदर्शिता आएगी और कर चोरी भी रुकेगी। लेकिन यह बिल हमेशा से राजनीति का शिकार रहा है। जिस कांग्रेस ने इसकी परिकल्पना की थी, वही इसे राजनीति का मुद्दा बनाने से बाज नहीं आ रही है। बहरहाल यह मामला निपटता दिख रहा है और स्थिति स्पष्ट होती जा रही है। अगर यह बिल पारित हो जाता है और कानून की शक्ल ले लेगा, तो इससे देश की कर प्रणाली में काफी सुधार आएगा। भारतीय कर व्यवस्था जटिल है और इसमें पारदर्शिता की भी कमी है। दोहरे कराधान से सभी परेशान रहे हैं और ऐसे में जीएसटी बिल बड़ी भूमिका निभा सकता है। यह सुधारों को तेजी देगा, क्योंकि इससे कारोबार में आसानी होगी। माल की आवाजाही का समय भी घटेगा, क्योंकि देश भर में नाके बंद हो जाएंगे।
लेकिन एक और बड़ा तथा महत्वपूर्ण बिल राजनीति की भेंट चढ़ जाएगा। यह है भूमि अधिग्रहण सुधार बिल, जिसके जरिये कारखानों के लिए जमीन लेना आसान हो जाता। कांग्रेस ने सुधारों के तहत यह विधेयक काफी समय पहले बनवाया था, लेकिन भारी विरोध और राहुल गांधी के हस्तक्षेप के बाद उसे रद्द कर दिया गया और एक ऐसा विधेयक पास हुआ, जिसने भूमि अधिग्रहण को लगभग असंभव बना दिया गया। इससे एक अजीबोगरीब स्थिति पैदा हो गई है। उद्यमियों और बिजनेस चैंबर्स का मानना है कि इस तरह के कठोर विधेयक से आर्थिक सुधारों की भावना को चोट पहुंचती है और उनके विस्तार कार्यों में बाधा आएगी। लेकिन इस विधेयक के अब पारित होने की संभावना नहीं है और एनडीए सरकार इसे आगे बढ़ाने के पक्ष में है भी नहीं, क्योंकि कई राज्य भी वोट की राजनीति के कारण इसका विरोध कर रहे हैं।
एक और बड़ा सुधार अभी बाकी है और वह है, बैंकिंग क्षेत्र में बड़े पैमाने पर बदलाव। भारत के बैंकिंग क्षेत्र को चुस्त-दुरुस्त करने की फिलहाल बहुत जरूरत है। हमारे सरकारी बैंक इस समय मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं। उन पर गैर निष्पादित संपत्तियों (एनपीए) का संकट छाया हुआ है। उन्हें अरबों रुपये के कर्ज माफ करने पड़ रहे हैं, क्योंकि लेनदार या तो गायब हो चुके हैं या फिर कर्ज चुकाने की स्थिति में नहीं हैं। ताजा उदाहरण किंगफिशर एयरलाइंस का है, जिसके प्रमोटर विजय माल्या तो देश छोड़कर ही जा चुके हैं। ऐसे कई उदाहरण हैं कि कारोबारियों ने कर्ज तो लिया, लेकिन चुकाने में असमर्थ रहे या उनकी मंशा उसे चुकाने की नहीं रही। ऐसे में बैंकों की हालत खस्ता हो गई है। आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन ने सरकारी बैंकों को अपने तमाम एनपीए इस वित्त वर्ष में ही खत्म करने का निर्देश दिया है। इससे उन्हें झटका लगा है और उनके शेयर बुरी तरह गिर गए हैं। कमजोर बैंकों के निजीकरण की बात तो उठ रही ही है, उन्हें बड़े बैंकों में विलय की भी जरूरत है। रघुराम राजन का मानना है कि स्वस्थ और मजबूत बैंक ही आने वाले समय में बड़ी चुनौतियों का मुकाबला कर सकेंगे और बड़े झटकों को बर्दाश्त कर सकेंगे।
बहरहाल वक्त है, बड़े सुधारों का, ताकि हमारी अर्थव्यवस्था दुनिया की पांच बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो सके और देश में समृद्धि आए। एनडीए सरकार के पास अब वक्त कम है।