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Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   When Vishwamitra bowed at the feet of Vashist

जब विश्वामित्र झुके वसिष्ठ के चरणों में

Thu, 21 May 2015 08:43 PM IST
- बादरायण
- बादरायण Updated Thu, 21 May 2015 08:43 PM IST
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विश्वामित्र विजयी होकर अपने राज्य लौट रहे थे। मार्ग में ब्रह्मा के पुत्र महर्षि वसिष्ठ का आश्रम पड़ा। विश्वामित्र आश्रम में पहुंचे, तो महर्षि वसिष्ठ ने उनका यथोचित सत्कार किया और आतिथ्य स्वीकार करने के लिए कहा।

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विश्वामित्र ने कहा, मेरे साथ एक लाख से अधिक सैनिक और बड़ी संख्या में हाथी-घोड़े हैं। उनके आवास तथा भोजनादि की व्यवस्था में आपको असुविधा होगी। वसिष्ठ ने कहा कि कोई असुविधा नहीं होगी। वसिष्ठ के पास कामधेनु की एक वत्सला थी, नंदिनी। उस गाय की अलौकिक क्षमता से आवश्यकताओं की निर्बाध आपूर्ति हुई।
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वसिष्ठ के आश्रम में मिले सत्कार से अभिभूत विश्वामित्र ने जाते समय वसिष्ठ से कहा, कुछ देने के बदले मैं आपसे कपिला नामक कामधेनु मांगता हूं। वसिष्ठ ने मना किया। विश्वामित्र अपना आग्रह दोहराते रहे और उसे जबर्दस्ती ले जाने का प्रयास किया। वसिष्ठ तो प्रतिरोध न कर सके, पर कपिला गाय ने अपने खुरों से ही सैनिकों को उत्पन्न किया और विश्वामित्र को पराजित होकर लौटना पड़ा।
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इससे निराश विश्वामित्र ने राजपाट त्याग दिया। दीर्घकाल तक घोर तपस्या की। एक दिन संध्या समय ऋषि विश्वामित्र शस्त्र लेकर वसिष्ठ मुनि के आश्रम की ओर चले। आश्रम के निकट पहुंचकर वह ठिठके। वसिष्ठ मुनि की पत्नी कह रही थीं, 'ऋषिवर, आज कितनी स्निग्ध शीतल चांदनी है, चारों ओर उसका प्रकाश फैल रहा है।'


इस पर महर्षि वसिष्ठ ने कहा, 'नहीं प्रिय, यदि प्रकाश देखना है, तो ऋषि विश्वामित्र की तपस्या का प्रकाश देखो, जो तीनों लोकों को प्रकाशमान कर रहा है।' वसिष्ठ जी की इस उपमा को सुनकर विश्वामित्र ने उनके सम्मुख अपना शस्त्र फेंक दिया और उनके चरणों में झुक गए।

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