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समाज जब जड़ हो जाता है

Wed, 07 Sep 2016 06:39 PM IST
स्वामी अग्निवेश
स्वामी अग्निवेश Updated Wed, 07 Sep 2016 06:39 PM IST
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When society dead
स्वामी अग्निवेश

अंतिम संस्कार जीवन का अंतिम पथ है। हर व्यक्ति चाहता है कि भले ही जिंदा रहते वह कितनी परेशानियां, झेले पर उसके शव की दुर्गति न हो। परिजन भी मृत व्यक्ति का अंतिम संस्कार पूरे विधि-विधान से करते हैं। यह भारतीय समाज ही है कि जिसमें अपनी उम्र में मरने पर पूरे बैंड-बाजे के साथ अंतिम संस्कार की परंपरा है। यदि ऐसे देश में शवों की दुर्गति होने के मामले सुनने में आएं, तो यह न केवल शासन-प्रशासन, बल्कि हमारे समाज के लिए शर्मसार करने वाली बात है। लावारिश शवों की दुर्गति के मामले तो समय-समय पर सुनने को मिलते रहते हैं, पर आजकल जिस तरह से परिजनों के सामने ही शवों की दुर्गति की जा रही है, वह तो मानवता के लिए एक कलंक है। जो मामले उड़ीसा में देखने को मिले, उनसे भले ही शासन-प्रशासन और संवेदनहीन लोगों पर कोई असर न पड़ा हो, पर संवेदनशील लोगों की रुह जरूर कांप उठी होगी।

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एक आदिवासी का एम्बुलेंस न मिलने पर अपनी पत्नी के शव को अपने कंधे पर डालकर अपने घर की ओर चल देना तथा दस किलोमीटर तक का सफर तय भी कर लेना गरीब आदमी की विवशता और जीवटता के साथ ही विकास के सभी दावों को धता बता गया। एक अन्य मामले में शव को पोस्टमार्टम तक ले जाने के लिए एम्बुलेंस न मिलने पर एक कर्मचारी का महिला के शव को कमर तक तोड़ देना तथा परिजनों की कोई प्रतिक्रिया न होना प्रख्यात लेखक मुंशी प्रेमचंद की कफन कहानी को बयां कर गया। दिल वालों की दिल्ली कहे जाने वाली देश की राजधानी में एक व्यक्ति टैम्पो की चपेट में आकर मर जाता जाता है और लोग उसे देखते हुए चले जाते हैं। एक व्यक्ति तो वापस आकर उसका पर्स और मोबाइल भी चोरी कर जाता है। हर व्यवस्था को अपने हिसाब से चाहने वाला समाज कैसे इस तरह के मामलों को बर्दाश्त करता रहता है। यह दुर्गति शव की नहीं हो रही। यह दुर्गति हो रही है उस व्यक्ति की, जिसे लोकतंत्र में भगवान माना गया है। हमारे समाज में कोई प्रतिक्रिया न करने वाले व्यक्ति को जिंदा लाश कहा जाता है। तो यह माना जाए कि शवों की दुर्गति पर मौन रहने वाले लोग भी किसी लाश से कम नहीं। गो मांस पर हो-हल्ला मचाने वालों को यह नहीं दिखाई दे रहा है कि आदमी का मांस कुत्ते खा रहे हैं। जरा-जरा-सी बातों पर बड़े-बड़े बयान जारी करने वाले नेताओं की इन मामलों पर जुबान तक नहीं खुली। भले ही देश में गरीबों के लिए तरह-तरह की योजनाएं चलाई जा रही हों, गरीबी हटाने के कितने दावे किए जा रहे हों, पर गरीब इस व्यवस्था में ऐसे फंसा दिया गया है कि जिंदा रहते हुए तो उसके साथ मुर्दा जैसा व्यवहार किया जाता है। मुर्दा होने पर उससे भी ज्यादा बेकद्री।
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लोगों को यह देखना होगा कि हर व्यवस्था समाज पर निर्भर करती है। जिस दिन निजी स्वार्थों को त्यागकर लोग देश और समाज की सोचने लगेंगे, मानव जाति के लिए समय निकालने लगेंगे, उस दिन न केवल शासन-प्रशासन ढर्रे पर आ जाएगा, बल्कि समाज की काफी गंदगी भी काफी हद तक दूर हो जाएगी। अपनी जिंदगी का फैसला करने का मौका दूसरों को मत दीजिए। दूसरों की परेशानी को अपनी परेशानी समझो। जैसा व्यवहार आप दूसरों से चाहते हो, वैसा ही व्यवहार दूसरों से करो। जिस दिन लोग ऐसा करने लगेंगे, उस दिन बहुत कुछ सुधर जाएगा। आइए, हम लोग अपना जमीर जगाकर अपनी जिम्मेदारियों को समझें। सरकारों को उनकी जिम्मेदारी के प्रति जवाबदेह बनाने लिए बाध्य करें और समाज में फैल रही गंदगी को दूर करें।

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