फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   When Government be sensitive towards women

महिलाओं के प्रति कब संवेदनशील होगी सरकार

Fri, 14 Nov 2014 08:09 PM IST
सुभाषिनी सहगल अली
सुभाषिनी सहगल अली Updated Fri, 14 Nov 2014 08:09 PM IST
विज्ञापन
When Government be sensitive towards women

हाल ही में एक रिपोर्ट आई है कि दुनिया के किस देश में सबसे अधिक लोग भूख के शिकार हैं। इससे पता चलता है कि भारत में इस दिशा में कुछ प्रगति हुई है। फिर भी आबादी का 25 फीसदी हिस्सा भूख से पीड़ित है।

विज्ञापन


एक अन्य रिपोर्ट आई है कि दुनिया में महिला-पुरुष समानता का स्तर क्या है। इसके मुताबिक, पिछले साल के मुकाबले भारत का स्तर काफी गिरा है। पिछले साल भारत का स्थान 142 देशों में 101वां था, जो अब खिसककर 114वें पर पहुंच गया है। यह रिपोर्ट किसी वामपंथी संस्था ने नहीं, विश्व आर्थिक फोरम ने तैयार की है। रोजगार, शिक्षा, लिंगानुपात, आय-इन तमाम क्षेत्रों में महिलाओं की स्थिति बिगड़ी है। नतीजे यह भी दर्शाते हैं कि उन्हीं देशों में महिला-पुरुषों के बीच समानता बढ़ी है, जहां की सरकारों ने गरीबों के लिए लाभकारी योजनाओं में सरकारी खर्च और हस्तक्षेप बढ़ाया है। लेकिन हमारे देश की केंद्र और राज्य सरकारें ठीक विपरीत दिशा में चलने की ठान चुकी हैं।
विज्ञापन


एक और रिपोर्ट सामने आई है, जिसका नाम है-मर्दानगी, पुत्र लालसा और करीबी संबंधों में हिंसा। रिपोर्ट के नतीजे बताते हैं कि आक्रामक मर्दानगी का एहसास और सोच जिन पुरुषों की मानसिकता पर हावी होती है, वे पुत्र लालसा से प्रेरित होकर कन्या भ्रूणहत्या के लिए दबाव बनाते हैं और पत्नियों, बेटियों और बहनों को हिंसा का शिकार बनाते हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तर प्रदेश की हालत सबसे गंभीर है। जितने पुरुषों से पूछताछ की गई, उसका 64 फीसदी हिस्सा यह मानता है कि मर्दानगी का मतलब होता है, दबंगई का व्यवहार करना, व्यक्तिगत रिश्तों में अपनी तरफ से नियम तय करना और सबसे बड़ी बात, महिलाओं को नियंत्रित रखना। आश्चर्य नहीं कि उत्तर प्रदेश के 75 फीसदी परिवारों में आत्मीय रिश्तेदारों के बीच हिंसा मौजूद है। अधिकतर पुरुषों ने भी माना कि उन्होंने अपने सर्वाधिक आत्मीय रिश्ते के साथ हिंसक बर्ताव किया है। महिलाएं घरेलू हिंसा की बात नकारती नहीं हैं, पर इसके खिलाफ बोलती भी नहीं हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन


इस रिपोर्ट से बहुत ही परेशान करने वाली तस्वीर उभरकर सामने आती है। लाखों घरों के दरवाजे के पीछे कितना अन्याय, कितनी पीड़ा और कलह छिपी हुई है, कितनी चीखें अनसुनी रह जाती हैं, कितनी आकांक्षाओं का गला घोंटा जा रहा है, इसका अनुमान लगाना भी मुश्किल है।

महिलाओं को रोजगार और शिक्षा उपलब्ध कराने में उत्तर प्रदेश का रिकॉर्ड बहुत ही दयनीय रहा है। पुरुषों के हिंसात्मक रवैये को नियंत्रित करने के लिए सरकार को आगे आना होगा। उसे सख्ती से यह संदेश देना होगा कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा बर्दाश्त नहीं की जाएगी। साथ ही, उसे महिलाओं को भी यह आश्वासन देना होगा कि उनकी शिकायत सुनी जाएगी और उन्हें न्याय दिलाने में सरकार पूरी मदद करेगी। क्या मौजूदा सरकार ऐसा कर रही है?

बीते अगस्त में एक महिला सब-इंस्पेक्टर द्वारा डीआईजी देवी प्रसाद श्रीवास्तव के खिलाफ लगाए कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के आरोप की जांच एडीजीपी सुतपा सान्याल की अध्यक्षता में हुई। जांच में कमेटी ने उन्हें दोषी पाया और सरकार को उचित कार्रवाई करने की सिफारिश भेज दी। सरकार ने आज तक दोषी अधिकारी को किसी प्रकार का दंड नहीं दिया, बल्कि उसकी पोस्टिंग कर दी। उधर वह महिला सब-इंस्पेक्टर न्याय के लिए भटक रही है।


यदि सरकार महिला उत्पीड़न के जुर्म के लिए जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कुछ भी करने को तैयार नहीं होगी, तो अपराधियों के दिल में सजा पाने का डर कैसे पैदा होगा? जनवादी विचार के लोगों को संगठित होकर सरकार पर दबाव बनाना होगा, ताकि वह अपना रवैया बदले।

(लेखिका माकपा की पूर्व सांसद हैं)

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed