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नक्सलियों के खिलाफ निर्णायक लड़ाई कब
तवलीन सिंह
Updated Tue, 25 Mar 2014 06:38 PM IST
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फिर देखने को मिले वे दर्दनाक नजारे। वे तिरंगे में लिपटे हुए कच्ची लकड़ी के ताबूत, उन पर रखी गई गेंदे के फूलों की मालाएं...उन बहादुर जवानों को इस देश के लोगों की आखिरी भेंट। फिर सुनने को मिले हमारे गृह मंत्री से वही भाषण, जो हम बहुत बार सुन चुके हैं। हम नहीं बख्शेंगे उनको जिन्होंने ऐसा किया है, हत्यारों को ढूंढेंगे हम और उनको दंडित करेंगे।
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पिछले सप्ताह नक्सलियों ने हमला छत्तीसगढ़ में वहीं किया, जहां पिछले वर्ष किया था और जिसमें मारे गए थे राज्य के कई कांग्रेसी नेता। उस समय यही भाषण सुने हमने। वर्ष 2010 में जब सीआरपीएफ के 76 जवानों को मारा गया था दंतेवाड़ा में, तब भी यही भाषण सुनने को मिले। ऐसा ही होता रहेगा, अगर देश के अगले प्रधानमंत्री नक्सलियों के साथ युद्ध स्तर पर लड़ने का फैसला नहीं करते हैं। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि देश की सुरक्षा को जितना नुकसान सोनिया-मनमोहन के दशक लंबे दौर में हुआ है, शायद ही कभी पहले हुआ हो।
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प्रधानमंत्री जी ने 2005 में कहा था कि राष्ट्रीय सुरक्षा को सबसे बड़ा खतरा नक्सलियों से है। ऐसा कहने के बाद लेकिन अपने डॉक्टर साहिब ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की और न ही गृह मंत्रालय की तरफ से कोई रणनीति हमने देखी। शिवराज पाटिल की जगह गृह मंत्री बने पी चिदंबरम साहिब ने कुछ ठोस कदम उठाने की कोशिश जरूर की, लेकिन फौरन उनके कांग्रेसी साथियों ने हल्ला मचाना शुरू कर दिया। जयराम रमेश और दिग्विजय सिंह जैसे लोगों ने कहना शुरू किया कि नक्सलियों पर हल्ला बोलने से पहले जरूरत है उनका दर्द समझने की। मालूम होता है कि इनको सोनिया गांधी का भी समर्थन था। सो जो लड़ाई लड़ी जानी चाहिए थी नक्सलियों के खिलाफ, रणनीति बनाने से पहले ही रुक गई। नक्सली गुट युद्ध की तैयारियों में लगे रहे छत्तीसगढ़ के जंगलों में और हमारे राजनेता अमन-प्रेम की बातें करते रहे। इनका साथ दिया दिल्ली में बैठे कई बुद्धिजीवियों और अरुंधती राय जैसी लेखिकाओं ने। अरुंधती राय तो इतनी फिदा हैं नक्सलियों पर कि उनके साथ कई दिन बिताने के बाद उन्होंने एक छोटी किताब लिखी, जिसमें इनको फरिश्तों के रूप में पेश किया। वह किताब छपी थी दंतेवाड़ा हमले से कुछ महीने पहले।
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जिन राजनेताओं के दिलों में दर्द है नक्सलियों के लिए, वे कहते फिरते हैं कि गरीबी है मुख्य कारण नक्सली हमलों का। यानी विकास के कार्य ठीक से होते नक्सली क्षेत्रों में, तो शायद नक्सली सोच पैदा ही न होती। यह बात अगर सच होती, तो नक्सली हमले अक्सर वहीं क्यों होते, जहां विकास की कोई कोशिश होती है? क्यों सड़कों और पुलों को उड़ाने का काम करते हैं ये लोग? क्यों स्कूलों और स्वास्थ्य केंद्रों को बनाते हैं अपना निशाना? क्यों अगवा करते हैं आदिवासी नौजवानों को अपनी सेना में जबर्दस्ती भर्ती करने? क्या इसलिए नहीं कि वे लोकतंत्र को मानते ही नहीं? मैंने देखे हैं ऐसे दस्तावेज, जिनमें नक्सली विचारधारा का पूरा ब्योरा दिया गया है और जिसमें स्पष्ट लिखा है कि जब तक लोकशाही को पूरी तरह खत्म नहीं किया जाता, तब तक भारत में माओवादी क्रांति असंभव है। सच तो यह है कि माओवादी सोच और लोकशाही में कोई मेल नहीं हो सकता। दुश्मन मुल्क हमारे इन सिरफिरे नौजवानों का इस्तेमाल कर रहे हैं, ताकि इस देश की गाड़ी आगे कभी न बढ़ सके।
सो, दुआ कीजिए कि अगले प्रधानमंत्री में देश की सुरक्षा को मजबूत बनाने की शक्ति हो। वरना यह वर्षों पुरानी लड़ाई चलती रहेगी भारत के विकसित होने के खिलाफ उन क्षेत्रों में, जहां विकास की सबसे ज्यादा जरूरत है। लड़ाई दो विचारधाराओं की है, अमीरी-गरीबी की नहीं, लेकिन ऐसा लगता है जैसे हमारे बड़े राजनेताओं ने यह बात पूरी तरह भुला दी है।